संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बदनसीब की स्मृतियों को ही महज संतानों का कन्धा!
18-Sep-2021 5:45 PM (299)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बदनसीब की स्मृतियों को ही महज संतानों का कन्धा!

बिहार से बड़ी दिलचस्प खबर आ रही है कि रामविलास पासवान की पहली बरसी निपटते ही उनके बेटे चिराग पासवान ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चि_ी लिखकर अनुरोध किया है कि वे केंद्र सरकार से सिफारिश करें कि रामविलास पासवान को भारत रत्न दिया जाए। इसके अलावा उन्होंने यह भी अपील की है कि रामविलास पासवान की जयंती को राजकीय अवकाश घोषित किया जाए। जैसा कि होता है, चिराग पासवान ने अपने पिता को महिमामंडित करते हुए बहुत सी बातें लिखी हैं, और साथ-साथ बहुत सी मांगें भी रखी हैं कि पटना में और हर जिला मुख्यालय में रामविलास पासवान की प्रतिमा स्थापित की जाए। इसके पहले दिल्ली में रामविलास पासवान के जीते जी जो सरकारी बंगला उनके पास था, उसमें चिराग पासवान ने उनकी एक प्रतिमा स्थापित कर ही दी है, और उसके साथ ही उनकी यह हसरत भी दिखती है कि वह बंगला रामविलास पासवान की स्मृति में चिराग पासवान के पास रहने दिया जाए।

यह एक बड़ी ही तकलीफदेह नौबत है जब रामविलास पासवान के गुजरने के बाद उनके नाम का झंडा लेकर अकेले उनके बेटे चल रहे हैं। जिंदगी भर जिसने राजनीति में समय लगाया, उसने अपने जीते-जी अपनी पार्टी की अपनी सारी विरासत अपने बेटे को ही देकर जाना तय किया, और शायद उसी वजह से भी यह नौबत आई है कि किसी और को यह नहीं लग रहा कि उन्हें भी पासवान की स्मृति में कुछ करना चाहिए। ऐसी नौबत किसी की जिंदगी में ना आए वही बेहतर है, कि उनकी स्मृतियों को लेकर उनकी संतानें ही कार्यक्रम करें, उनके नाम पर स्मृति ग्रंथ निकालें, परिवार ही उनकी स्मृति में व्याख्यानमाला रखें, पुरस्कार और सम्मान स्थापित करे। और यह तो एक अलग दर्जे का मामला है जिसमें रामविलास पासवान का बेटा उनके लिए भारत रत्न की मांग कर रहा है। जिंदगी में जो व्यक्ति सचमुच महान होते हैं या कोई महत्वपूर्ण काम छोड़ कर जाते हैं, वे कम से कम अपने समर्थकों, प्रशंसकों, अनुयायियों, और भक्तों का इतना तबका तो छोडक़र जाते हैं कि उनके जाने के बाद परिवार से परे बाहर के कुछ लोग उनके नाम को जप सकें। लेकिन वे लोग सहानुभूति के हकदार रहते हैं, हमदर्दी के हकदार रहते हैं, जिनके नामलेवा उनके कुनबे के लोग ही रह जाते हैं उसके बाहर कोई नहीं रह जाते।

वैसे भी हम तो राजकीय सम्मानों के खिलाफ लिखते आए हैं, और किसी को भी सरकार सम्मानित करे, उसके खिलाफ हम लोगों को समझाते हैं। फिर भारत रत्न जैसी उपाधि तो हमेशा विवादों से घिरी रही है क्योंकि रात-दिन कारोबारी इश्तहार करने वाले सचिन तेंदुलकर जैसे कम उम्र को भारत रत्न मिल गया है, और हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले ओलिंपिक मेडल लेकर आने वाले ध्यानचंद के नाम पर यह सोचा भी नहीं गया। इसलिए जिन लोगों को भारत रत्न सम्मान की बात लगती है, वे अपने मन में किसी हीन भावना के शिकार रहने वाले लोग हैं ताकि उन्हें सरकारी सम्मान अच्छा लगता है। वोटों को पाकर सरकार में आने वाले, और सरकार में रहते हुए आगे वोट पाने की कोशिश करने वाले लोग भला किस तरह से किसी सम्मान का ईमानदार फैसला कर सकते हैं? दुनिया में सम्मान देने का हक सरकारों से परे, राजनीतिक दलों से परे, ऐसे निर्विवाद संगठनों और संस्थाओं का काम होना चाहिए, जो बहुत ही भरोसेमंद निर्णायक मंडल के साथ, बहुत ही पारदर्शी तरीके से इसका फैसला कर सकें। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो नोबेल पुरस्कार को ऐसा ही सम्मानजनक माना जा सकता है जिसे कोई किसी दबाव से हासिल कर ले ऐसा सुना नहीं गया है। फिर एक बात यह भी है कि जब-जब रामविलास पासवान को अधिक महान साबित करने की कोशिश होगी, लोगों को यह भी याद आते रहेगा कि उनको मजाक में भारतीय राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता था, जो कि यह अंदाज लगा लेते थे कि अगली सरकार कौन सी आने वाली है और वे विचारधाराविहीन अंदाज में किसी भी सत्तारूढ़ हो संगठन का हिस्सा बनने के लिए तैयार रहते थे, और तकरीबन तमाम सरकारें उनके साथ ही बनती थीं। किसी के बारे में अगर अप्रिय बातों को शुरू करवाना हो, तो उसके सम्मान की चर्चा छेड़ देनी चाहिए ,और लोग तुरंत इस बात को उधेडऩे लगते हैं कि कौन-कौन सी बातों की वजह से वे व्यक्ति ऐसे सम्मान के हकदार नहीं हैं।

हमारा ख्याल है कि चिराग पासवान, रामविलास पासवान की रही-सही स्मृतियों को बर्बाद कर रहे हैं। वे जिस बिहार के एक सबसे बड़े नेता रहे हैं, उस बिहार में जिला मुख्यालयों में पासवान की प्रतिमा स्थापित करने के लिए अगर सरकार से अपील करने की नौबत आ गई है तो इसका मतलब है कि पासवान ने अपनी कोई विरासत नहीं छोड़ी है, उनके कोई समर्थक नहीं हैं,  और उनके अपने गृह राज्य में भी उनकी कोई जमीन नहीं है। इसी तरह सरकारी बंगले में कब्जा करने की नीयत से पासवान की प्रतिमा स्थापित करना एक खराब नीयत की बात है और चिराग पासवान इससे अपनी भी इज्जत खराब कर रहे हैं। यह भी है कि पिछले चुनाव में जिस नीतीश कुमार के खिलाफ चिराग पासवान ने बहुत ही निचले दर्जे की आग उगली थी। उसी नीतीश कुमार से आज अपने पिता की स्मृति को आगे बढ़ाने की अपील करना राजनीतिक रूप से एक नाजायज बात है। कम से कम इतना तो सोचना चाहिए था कि अभी-अभी रामविलास पासवान की बरसी पर नीतीश कुमार को बुलाने के लिए जब चिराग पासवान कोशिश करते रहे तो उनको मुख्यमंत्री से मिलने का समय भी नहीं दिया गया और मुख्यमंत्री इस बरसी पर आए भी नहीं। ऐसे रुख के बाद ऐसी अपील, चिराग पासवान की नासमझी साबित करती है, और यह पूरा सिलसिला बहुत ही बदमजा है।
 
किसी व्यक्ति के गुजरने पर उसका परिवार ही उसकी महानता साबित करने में लगा रहे यह शर्मनाक नौबत है, इससे और चाहे कुछ भी साबित हो जाए, कम से कम यह तो साबित तो हो ही जाता है कि गुजरने वाले व्यक्ति महान नहीं थे, इसीलिए उनकी स्मृतियों को चार कंधा देने के लिए घर के चार लोगों के अलावा और कोई नहीं मिल रहे हैं। ऐसी नौबत से सभी इज्जतदार लोगों को बचना चाहिए लेकिन इज्जतदार हैं कौन यह तो लोग खुद ही साबित करते हैं।
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