संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मोदी अमरीका में, लेकिन टीवी की ख़बरों पर कुछ और काबिज !
24-Sep-2021 6:06 PM (278)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  मोदी अमरीका में, लेकिन टीवी की ख़बरों पर कुछ और काबिज !

देश की राजधानी दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में पेशी पर लाए गए एक गैंगस्टर को दो हमलावरों ने वकील की पोशाक में आकर जज के सामने ही गोलियां मार दीं, उस गैंगस्टर को लेकर आने वाले हथियारबंद पुलिस वालों ने गोलियां चलाईं, और दोनों हमलावर वहीं मारे गए। बाद में आने वाली खबरें बतलाती हैं कि जब भी इस बड़े गैंगस्टर को पेशी पर लाया जाता था तो उस पर हमले की आशंका रहती थी और पुलिस को पहले से इत्तला की जाती थी कि अतिरिक्त सुरक्षा का इंतजाम किया जाए। इसके बाद भी ये दो हमलावर अदालत के भीतर आकर बैठे थे, और उन्होंने जज के सामने ही, जज के कुछ फीट दूर ही खड़े रहकर इसे गोलियां मार दीं। ऐसी घटनाएं उत्तर प्रदेश और बिहार में समय-समय पर सुनाई पड़ती रही हैं जहां मुजरिमों के गिरोह एक-दूसरे को निपटाने के लिए अदालत में पेशी के दिन और वक्त जानकारी रखते हैं और वहां हिसाब चुकता करते हैं। लेकिन जैसा कि जाहिर है दिल्ली की पुलिस केंद्र सरकार के मातहत काम करती है, और राज्य सरकार का उससे कुछ भी लेना देना नहीं है, ऐसे में केंद्र सरकार की ही जवाबदेही इस वारदात पर बनती है। पर आज महज इसी एक वारदात को लेकर हम यहां पर नहीं लिख रहे हैं, दिल्ली पुलिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कुछ और मामले हाल के महीनों में सामने आए हैं, जिन पर बात की जानी चाहिए, और एक बात दिल्ली से बहुत दूर असम की भी है।

अभी दिल्ली के दंगों को लेकर और कुछ दूसरे मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने यह पाया है कि पुलिस ने बेबुनियाद मामले दर्ज किए, बेकसूर लोगों को पकडक़र जेलों में ठूंस दिया, शायद इसलिए कि वे मुस्लिम थे और देश की राजनीतिक ताकतों को पसंद नहीं थे। कुछ मामलों में तो अदालत ने पाया कि दिल्ली पुलिस को यह भी नहीं मालूम था कि वह किस मामले की जांच कर रही है। अदालत ने बड़ी सख्ती और तल्खी से पुलिस की ऐसी नालायकी, निकम्मेपन और उसकी बदनीयत इन सब पर काफी नाराजगी जाहिर करते हुए खिंचाई की है। यह बात नई नहीं है और केजरीवाल की सरकार आने के पहले से दिल्ली की सरकारें यह मांग करते आई हैं कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए और दिल्ली पुलिस राज्य शासन के अधीन की जाए। सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला जाने के बाद भी वहां से दिल्ली सरकार को कोई अधिकार नहीं मिले और दिल्ली के उपराज्यपाल के मार्फत दिल्ली सरकार के गैर पुलिसिया कामकाज पर भी केंद्र सरकार की पकड़ बनी हुई है। ऐसे में क्योंकि सारे अधिकार केंद्र सरकार के पास हैं इसलिए जिम्मेदारी भी उसी की बनती है। यह एक बड़ा बुरा मौका है जब आज-कल में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका में लोगों से मिल रहे हैं, और उसी वक्त भाजपा के शासन वाले असम में गरीब मुस्लिम परिवारों को पुलिस सरकारी जमीन से बेदखल कर रही है, और पुलिस गोलियों से लोग मारे गए हैं, और वैसे में पुलिस के साथ गया हुआ एक फोटोग्राफर दम तोड़ते हुए एक लहूलुहान आदमी के सीने पर कूद-कूद कर खुशी मना रहा है। ऐसे वीडियो भारतीय मीडिया के उस हिस्से में भी छाए रहे जो मोटे तौर पर केंद्र सरकार या भाजपा की राज्य सरकारों के बारे में कोई आलोचना करते दिखता नहीं है। असम का वह वीडियो अभी तक टीवी की खबरों से हटा नहीं था, और आज दिल्ली की एक अदालत में इस किस्म की गोलीबारी खबरों पर छा गई है। जिस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका में लोगों से मेल-मुलाकात को हिंदुस्तानी टीवी पर एकाधिकार करते देखना चाहते होंगे, उस मौके को असम की भाजपा सरकार की पुलिस ने, और दिल्ली की केंद्र सरकार की पुलिस ने तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब टीवी दर्शकों की बात तो छोड़ ही दें, टीवी समाचार चैनलों की दिलचस्पी भी इन दो गोलीबारी में अधिक हो गई है।

लेकिन हम दिल्ली की अदालत में जज के सामने किए गए इस कत्ल को ही आज का मुद्दा बनाना नहीं चाहते, असम में जो हुआ है उस पर पूरे देश में चर्चा की जरूरत है क्योंकि वहां पर बहुत ही गरीब मुस्लिम लोगों का जिस तरह पुलिस के हाथों मरना हुआ है, और उस पर जिस तरह पुलिस के साथ जड़े हुए फोटोग्राफर ने जख्मी पर कूद-कूद कर खुशी मनाई है, लाठी लिए हुए एक अकेले बेदखल हो रहे गरीब पर जिस तरह दर्जनों पुलिस टूट पड़ी और जाने कितनी ही गोलियां उसे मारी गईं, और मरते हुए या मर चुके कुछ इंसान पर और हमला किया गया, वह सब कुछ वीडियो में बड़ा साफ-साफ दिखता है। देश के राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इसे आदिवासी नस्ल को खत्म करने की एक साजिश करार दिया है। हालांकि असम सरकार ने इस मामले की न्यायिक जांच की घोषणा जरूर की है, लेकिन वह वीडियो लोगों का दिल दहला रहा है कि किस तरह पुलिस के ही साथ घूमने वाला, और शायद पुलिस के लिए ही काम करने वाला फोटोग्राफर, एक जख्मी या मुर्दा गरीब के बदन पर चढक़र कूदता है, हो सकता है कि उसमें उस वक़्त जान बाकी रही हो, और उस पर कूदने से उसकी मौत हुई हो। असम का यह मामला दिल्ली के रोहिणी कोर्ट के मामले के मुकाबले अधिक अमानवीय है, अधिक हिंसक है, और दिल्ली की गोलीबारी की आवाज में असम के गरीबों की आवाज दब नहीं जानी चाहिए। इन दोनों मामलों पर आगे बात तो होगी, लेकिन असम में मुस्लिमों के साथ, आदिवासियों के साथ भेदभाव का सिलसिला पिछले कुछ वर्षों से लगातार चले आ रहा है, और इस ताजा वीडियो के बाद उस भेदभाव की तरफ भी दुनिया का ध्यान जाना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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