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अब समाज के लिये नहीं बल्कि सत्ता की मजबूती के लिये काम करेगा...
25-Sep-2021 1:27 PM (108)
अब समाज के लिये नहीं बल्कि सत्ता की मजबूती के लिये काम करेगा...

-पुष्य मित्र

किसी का सिविल सेवा के लिये चयनित होना उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि हो सकती है। हद से हद उसके अपने परिवार की उपलब्धि। यह पूरे समाज की उपलब्धि है यह मुझे नहीं लगता।

कल से लोग जिला, राज्य, जाति, समाज के आधार पर सिविल सेवा पास करने वाले लोगों के लिये गौरवान्वित हुए जा रहे हैं। मगर मुझे लगता है कि इस सत्ता ने समाज के बीच से एक सबसे अधिक प्रतिभाशाली व्यक्ति को चुन लिया है, जो अब समाज के लिए नहीं बल्कि सत्ता की मजबूती के लिये काम करेगा।

मेरा नजरिया आपको काफी नकारात्मक लग सकता है। वह शायद इसलिये भी है कि कल दो ब्यूरोक्रेट से मिलकर और उनका रवैया देखकर आया हूं। सौ में से 95 अफसर अमूमन ऐसे ही हैं। उनका काम यह तय करना है कि लोगों के काम को किन सरकारी बहानों से रोका जाये। वे अमूमन वही काम करते हैं, उसी योजना को आगे बढ़ाते हैं जिसमें उनके लिये कुछ आय की या दूसरे किस्म की सफलता की गुंजाईश हो। फिर मंत्रियों को समझाते हैं कि यह योजना उनके लिये कैसे लाभकारी है। फिर उस योजना में जनता की भलाई का रसायन मिलाया जाता है। भ्रम पैदा किया जाता है कि यह तो जनता के हित में है। मगर 75 साल का इतिहास गवाह है कि जनता के हित के नाम से जितनी योजनाएं बनी हैं उससे जनता समृद्ध हुई या नहीं यह तो पता नहीं पर नेता और अफसर हर बार समृद्ध हुए।

पिछले 75 वर्ष से इस देश पर इन सिविल सर्वेंटों की स्थायी सत्ता है। ये पढ़े-लिखे लोग हैं। इन्हें ट्रेन किया जाता है कि ये जनता पर कैसे डोमीनेट करें। इनकी सत्ता हमेशा कायम रहती है। इनकी सरकार कभी नहीं बदलती। मगर पिछले 75 वर्षों में इन्होंने देश को कितना बदला यह जाहिर है। ये लोगों पर रौब डालना जानते हैं। इनके दफ्तर का सेटअप देखिये कितना सामन्ती है। ये नेताओं और मंत्रियों को बेवकूफ बनाना जानते हैं। ये अंग्रेजी राज के बाद देश में छूट गये भारतीय अंग्रेज हैं।

कल अपने प्रिय कवि आलोक धन्वा की कविता जिलाधीश याद आ गई। आप भी पढि़ए-
जिलाधीश
तुम एक पिछड़े हुए वक्ता हो
तुम एक ऐसे विरोध की भाषा में बोलते हो
जैसे राजाओं का विरोध कर रहे हो
एक ऐसे समय की भाषा जब संसद का जन्म नहीं हुआ था
तुम क्या सोचते हो
संसद ने विरोध की भाषा और सामग्री को वैसा ही रहने दिया है
जैसी वह राजाओं के जमाने में थी
यह जो आदमी
मेज की दूसरी ओर सुन रहा है तुम्हें
कितने करीब और ध्यान से
यह राजा नहीं जिलाधीश है !
यह जिलाधीश है
जो राजाओं से आम तौर पर
बहुत ज्यादा शिक्षित है
राजाओं से ज्यादा तत्पर और संलग्न !
यह दूर किसी किले में- ऐश्वर्य की निर्जनता में नहीं
हमारी गलियों में पैदा हुआ एक लडक़ा है
यह हमारी असफलताओं और गलतियों के बीच पला है
यह जानता है हमारे साहस और लालच को
राजाओं से बहुत ज़्यादा धैर्य और चिन्ता है इसके पास
यह ज़्यादा भ्रम पैदा कर सकता है
यह ज़्यादा अच्छी तरह हमें आजादी से दूर रख सकता है
कड़ी
कड़ी निगरानी चाहिए
सरकार के इस बेहतरीन दिमाग पर!
कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है !
मैं मानता हूं, यह पोस्ट काफी नकारात्मक है। कुछ लोग सिविल सेवा की सामन्ती ट्रेनिंग के बाद भी अच्छे बच जाते हैं। मगर यह भी हमने देखा है कि वे फिर पूरी उम्र मिसफिट रह जाते हैं। गलत विभागों में ड्यूटी करते हुए, तबादला झेलते हुए। उनके लिये यह नौकरी अभिशाप हो जाती है। इतनी ऊंची नौकरी है कि वे अमूमन छोडऩे की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते। अपनी लॉबी भी इनके पक्ष में कभी खड़ी नहीं होती। मैं उनकी बात नहीं कर रहा। यह उन लोगों के बारे में है जो बहुसंख्यक हैं। अपनी परम्परा को फॉलो करते हैं। जो संगठित हैं।

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