संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : आंदोलन कर रहे किसानों को सत्ता की गाड़ी कुचल मारे, ऐसा तो मुल्क में पहले कभी सुना नहीं था !
04-Oct-2021 5:05 PM (120)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  आंदोलन कर रहे किसानों को सत्ता की गाड़ी कुचल मारे, ऐसा तो मुल्क में पहले कभी सुना नहीं था !

देश में लंबे समय से चले आ रहे किसान आंदोलन में कल एक दर्दनाक मोड़ तब आया जब उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले में वहां पहुंच रहे केंद्र और राज्य के भाजपा मंत्रियों का विरोध करने के लिए इक_ा किसानों पर एक केंद्रीय मंत्री के बेटे की गाड़ी चढ़ा दी गई जिसमें 4 किसान कुचलकर मर गए। ऐसी खबर है कि इसके जवाब में कुछ किसानों ने भी हिंसा की और इस पूरे घटनाक्रम के बाद भाजपा के दो कार्यकर्ताओं और दो ड्राइवरों के भी मरने की खबर है। उत्तर प्रदेश में कुछ महीने बाद चुनाव होने जा रहा है और किसान आंदोलन तो पूरे देश में चल ही रहा है। ऐसे में उत्तर प्रदेश की कांग्रेस प्रभारी प्रियंका गांधी तुरंत लखीमपुर के लिए रवाना हुईं, जिन्हें रास्ते में ही रोककर गिरफ्तार कर लिया गया, कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के कुछ दूसरे नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को लखनऊ में विमान उतारने की भी इजाजत नहीं दी गई और वह रायपुर में रवानगी का इंतजार करते रहे. भूपेश बघेल ने यह सवाल उठाया है कि क्या अब उन्हें उत्तर प्रदेश जाने के लिए कोई वीजा लेना पड़ेगा? यह बात इसलिए है कि उनके या पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी के लखनऊ पहुंचने के बाद भी उन्हें आगे बढऩे से रोका जा सकता था, लेकिन एक प्रदेश के मुख्यमंत्री को दुसरे प्रदेश की राजधानी तक पहुंचने की इजाजत भी न मिलना उन्हें एक अलोकतांत्रिक मामला लग रहा है, और जाहिर तौर पर ऐसा दिख भी रहा है। लखीमपुर जिले में जहां पर कि यह घटना हुई है वह नेपाल की सरहद पर बसा हुआ एक गांव है और वहां से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर लखनऊ तक किसी को न उतरने दिया जाए, यह बात थोड़ी अटपटी लगती है। स्थानीय शासन प्रशासन का तो यह अधिकार रहता है कि वे तनावग्रस्त से इलाके में किसी को जाने से रोकें, और वह काम इस डेढ़ सौ किलोमीटर में कहीं भी हो सकता था।

लेकिन यह मुद्दा कांग्रेस के दो मुख्यमंत्रियों के उत्तर प्रदेश पहुंचने से रोके जाने का नहीं है, वह तो इस पूरी घटना का एक छोटा हिस्सा है, बड़ा हिस्सा तो यह है कि देश के कई राज्यों में चल रहे किसान आंदोलन के प्रति देशभर में अधिकांश हिस्सों में चल रही भाजपा की सरकारों का क्या रुख है। केंद्र सरकार के सामने डेरा डाले हुए किसानों को सैकड़ों दिन हो चुके हैं, लेकिन अपने किसान कानूनों को लेकर केंद्र सरकार टस से मस नहीं हो रही। दूसरी तरफ पिछले महीनों में कहीं हरियाणा के किसी मंत्री ने, तो कहीं भाजपा के किसी बड़े नेता-पदाधिकारी ने किसान आंदोलन को नक्सलियों से जुड़ा बताया, किसी ने देशद्रोहियों से जुड़ा हुआ बताया, किसी ने उसका संबंध पाकिस्तान और खालिस्तान से जोड़ा। अभी दो दिन पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने किसान आंदोलन से लाठियों से निपटने की बात लोगों से की, और कुछ वैसी ही बातें उत्तर प्रदेश में भी किसानों के बारे में केंद्र और राज्य के भाजपा-मंत्री करते आए थे। माहौल ऐसा बन गया है कि भाजपा सरकारों के मंत्री और भाजपा के बड़े पदाधिकारी किसान विरोधी दिखने लगे हैं। यह जनधारणा हर लापरवाह बयान के साथ अधिक मजबूत होते चल रही है, और रास्ता रोके आंदोलनकारियों को सत्तारूढ़ गाड़ी से कुचलकर मारने का यह देश का शायद पहला ही मौका है। पता नहीं भाजपा किस तरह देश के पूरे के पूरे किसान तबके को इस हद तक नाराज करने का एक अभियान सा चलाते दिख रही है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जब उत्तर प्रदेश जाने की इजाजत राज्य सरकार ने नहीं दी तो उन्होंने दिल्ली में पार्टी दफ्तर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा, जिनके बेटे की कार ने किसानों को कुचल कर मारा है, उन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए। भूपेश ने इस बात पर भी अफसोस जाहिर किया कि इस तरह की मौतों पर प्रधानमंत्री की तरफ से कोई प्रतिक्रिया तक नहीं आई जो कि बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है. उन्होंने कहा कि यह साधारण घटना नहीं है यह हत्या का मामला है। उन्होंने कहा कि ये लोग अंग्रेजों की राह पर चलने वाले लोग हैं, ये किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। भूपेश बघेल ने आरोप लगाया कि भाजपा को किसान पसंद नहीं है और भाजपा किसानों की आवाज को दबा देना चाहती है, रौंद देना चाहती है। आज प्रियंका गांधी के उत्तर प्रदेश में हिरासत में रहने के बाद भूपेश बघेल वहां जाने की कोशिश कर रहे सबसे बड़े नेता हैं, और कांग्रेस पार्टी ने उन्हें दो दिन पहले ही उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर वरिष्ठ पर्यवेक्षक नियुक्त किया है।

यह बात सच है कि उत्तर प्रदेश के कुछ महीने बाद के चुनावों को लेकर राजनीतिक दल अधिक सक्रिय हुए होंगे, लेकिन पिछले साल भर में भाजपा की केंद्र सरकार, उसकी हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकार ने किसान आंदोलन पर जो रुख दिखाया है, वह एक आम नजरिए से देखने पर किसान विरोधी दिखता है। ऐसा लगता है कि राज्यों और केंद्र के चुनाव जीतने में एक महारत हासिल कर लेने के बाद भाजपा को देश के बहुत से तबकों की परवाह नहीं रह गई है। उसे लगता है कि मोदी के नाम और चेहरे पर वह देश में कहीं भी जीत सकती है। यह सिलसिला चुनावी राजनीति के हिसाब से तो ठीक है, लेकिन हिंदुस्तान में लोकतंत्र की परंपराओं को देखें, तो बातचीत के सिलसिले को खत्म करना कोई अच्छी बात नहीं है। और संसद से लेकर सडक़ तक, मोदी सरकार और भाजपा, बातचीत के सिलसिले को गैरजरूरी साबित करते चल रही हैं। बहुमत की वजह से उनका काम चल सकता है, लेकिन यह उनका काम ही चल रहा है, देश की लोकतांत्रिक परंपराएं नहीं चल रहीं। उत्तर प्रदेश में किसानों की ये मौतें आने वाले चुनाव पर चाहे जो असर करें, हम उसके असर को चुनावों से परे भी देश के किसान आंदोलन और देश के किसान मुद्दों पर देखना चाहेंगे, क्योंकि अभी 2 अक्टूबर को ही तो लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर लोगों ने जय जवान, जय किसान की बात कही, और जिन लोगों को गांधी के मुकाबले भी शास्त्री अधिक पसंद आते हैं, उन्हें भी शास्त्री के जय किसान पसंद नहीं आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में आने वाले दिन देश के किसान आंदोलन की रफ्तार भी तय करेंगे, और इस बारे में कुछ दिन बाद फिर लिखने का मौका आएगा।
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