संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कश्मीर में नागरिकों के चुन-चुनकर कत्ल, एक बड़े खतरे की नौबत
07-Oct-2021 5:19 PM (282)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कश्मीर में नागरिकों के चुन-चुनकर कत्ल, एक बड़े खतरे की नौबत

हिंदुस्तान के कश्मीर से कुछ परेशान करने वाली खबरें आ रही हैं। पिछले एक हफ्ते में आधा दर्जन से अधिक आम नागरिकों को मारा गया है, और ऐसा कहा जा रहा है कि आतंकियों ने चुन-चुन कर यह हत्याएं की हैं, जिनमें अधिकतर गैर-मुस्लिम हिंदू और सिख लोग थे, इनमें मुस्लिम नागरिक भी हैं, जिन्हें भी निशाना बनाकर मारा गया है. पुलिस का यह कहना है कि यह स्थानीय मुस्लिमों को बदनाम करने के लिए की गई साजिश है। वहां के पुलिस प्रमुख ने कहा कि यह कश्मीर के सांप्रदायिक सद्भाव को खत्म करने के लिए किया जा रहा है, और चुन-चुन कर लोगों को मारा जा रहा है, ताकि ऐसा लगे कि गैर-मुस्लिमों की हत्या हो रही है।

कश्मीर से जुड़ा हुआ कोई भी मामला बड़ा ही मुश्किल और उलझा हुआ रहता है। वहां की बहुत सी वारदातें ऐसी रहती हैं जिनमें किसी एक तबके को बदनाम करने की साजिश जुड़ी रहती है। फिर ऐसी साजिश हिंदुस्तान की जमीन से भी कुछ ताकतें कर सकती हैं, और कश्मीर की सरहद से लगे हुए पाकिस्तान के इलाके से भी ऐसा हो सकता है। यह मामला इतना उलझा हुआ है कि यहां पर सामने दिख रही वजहों से परे छुपी हुई वजह कौन सी हैं, यह सोचना कुछ मुश्किल रहता है। और जांच में तो पिछले बरसों में कश्मीर में हुए बहुत से बड़े-बड़े आतंकी हमलों के मुजरिम भी पकड़ में नहीं आए हैं। इस बार तो खबरें बताती हैं कि छोटी पिस्तौल से भी हत्या हुई है, और अगर हत्यारे ऐसे छोटे हथियार लेकर चलेंगे तो उनको पकडऩा तो सरकार के लिए, सुरक्षाबलों के लिए और मुश्किल बात होगी।

कश्मीर अलगाववाद और आतंक के लंबे दौर से गुजरा हुआ राज्य है, शायद गुजर ही रहा है। जबसे वहां केंद्र सरकार ने 370 खत्म करके और राज्य का दर्जा खत्म करके बहुत बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया है, तबसे वहां हिंसा थमी हुई थी, पत्थर चलने बंद हुए थे, और आतंक की घटनाएं भी कम हुई थीं। लेकिन अब जिस तरह छांट-छांटकर लोगों को मारा जा रहा है तो इससे पंजाब के आतंक के दिन याद पड़ रहे हैं जहां पर भिंडरावाले के आतंकियों ने स्वर्ण मंदिर से बाहर निकलकर बसों से मुसाफिरों को निकालकर छांट-छांटकर हिंदुओं की हत्या की थी। अभी जिन लोगों को मारा गया है उनमें कश्मीरी पंडित हैं, सिक्ख हैं, और दूसरे हिंदू हैं। जाहिर है कि इससे एक तनाव खड़ा होगा और पूरे कश्मीर में जगह-जगह बसे हुए गैर मुस्लिमों की हिफाजत करना भी बड़ा मुश्किल काम हो सकता है।

क्या यह किसी विदेशी साजिश के तहत हो रहा है या कश्मीर में ही बसी हुई कुछ हिंदुस्तानी आतंकी ताकतें ऐसा कर रही हैं, इस बारे में कुछ तय करना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह तो तय है कि अगर कोई ताकतें ऐसा तय कर लेती हैं तो ऐसी आतंकी वारदातें बहुत मुश्किल भी नहीं रहेंगी और यह तनाव तो बढ़ते चलेगा। कश्मीर शायद दुनिया का सबसे अधिक फौजी मौजूदगी वाला इलाका है। इसके बहुत बड़े दाम हिंदुस्तान को चुकाने पड़ते हैं, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह माना जाता है कि कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच के विवाद जब तक नहीं निपटेंगे तब तक महज दूसरे मुद्दों पर इन दोनों देशों की बातचीत का बहुत अधिक मतलब नहीं रहेगा। अभी इस बात को याद दिलाने का यह मतलब कहीं नहीं है कि हम इन हमलों के पीछे पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हिंदुस्तान के दूसरे हिस्सों में नक्सल हिंसा से लेकर उत्तर-पूर्व की हिंसा तक कई ऐसे मामले हैं जो पाकिस्तान के बिना भी हो रहे हैं, और जो पूरी तरह हिंदुस्तानी ताकतें कर रही हैं। इसलिए कश्मीर के हमलों को लेकर पाकिस्तान के खिलाफ बयानबाजी तो हो सकती है लेकिन पाकिस्तान से रिश्ते को और अधिक खराब करना समझदारी की बात नहीं होगी। जब तक ऐसे कोई सुबूत नहीं जुटते हैं कि इन हमलों के पीछे पाकिस्तान हैं तब तक जांच एजेंसियों को खुले दिमाग से मुजरिमों को तलाशना चाहिए वरना पाकिस्तान पर तोहमत लगाना तो आसान है और उसके बाद हिंदुस्तान में इसी जमीन के मुजरिमों को ढूंढने की जरूरत भी नहीं रह जाती है. सरकार को ऐसी चूक से बचना चाहिए। हो सकता है कि पाकिस्तान की मदद के बिना भी हिंदुस्तान के कुछ लोग ऐसा कर रहे हों। कश्मीर के ये ताजा हमले बहुत फि़क्र खड़ी करते हैं, और सरकार को जल्द ही मुजरिमों तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 

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