संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : इस मंत्री से यह सवाल तो पूछो कि किस सर्वे से यह नतीजा निकाला ?
11-Oct-2021 5:03 PM (212)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  इस मंत्री से यह सवाल तो पूछो कि किस सर्वे से यह नतीजा निकाला ?

नेताओं में जो सत्ता पर सवार हो जाते हैं वे अपने-आपको दुनिया के हर विषय में माहिर, जानकार, और विशेषज्ञ मान लेते हैं। वे बड़े से बड़े तकनीकी फैसले खुद करने लगते हैं उनके सामने इंजीनियरिंग की कोई कीमत नहीं होती है, उनके सामने किसी योजना या विज्ञान की किसी दूसरी ब्रांच की कोई जरूरत नहीं होती है, और वे लड़ाकू विमानों से लेकर अंतरिक्ष यान तक को रास्ता बता सकते हैं। नतीजा यह होता है कि सत्ता सिर चढक़र बोलने लगती है और ऐसे में तानाशाही, मूर्खता, धर्मांधता, और कट्टरता की बातें खुलकर सामने आती हैं। अभी कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. के सुधाकर ने विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर बेंगलुरु में देश के सबसे बड़े मानसिक स्वास्थ्य केंद्र निमहंस में भाषण देते हुए कहा कि भारत की आधुनिक महिलाएं अकेले रहना चाहती हैं, और अगर वे शादी करती भी हैं तो भी वे बच्चे पैदा करना नहीं चाहतीं, और वे सरोगेसी से बच्चे चाहती हैं। उन्होंने अपनी सोच के पीछे के किसी अध्ययन की बात नहीं कही कि उन्होंने यह निष्कर्ष कैसे निकाला है, लेकिन हिंदुस्तानी समाज की साधारण जानकारी रखने वाले लोग भी आसानी से यह बात कह सकते हैं कि मंत्री की कही हुई ये बातें बिल्कुल ही बेबुनियाद और फिजूल की हैं, बेहूदी भी हैं।

आज हिंदुस्तानी समाज में कुछ फ़ीसदी लड़कियां और महिलाएं ही बिना शादी के रहती हैं, और तीन-चौथाई से अधिक आधुनिक महिलाएं भी शादी करती ही हैं. इनमें से भी तकरीबन तमाम महिलाएं बच्चे चाहती हैं, और बच्चे पाने के लिए कोशिश करती हैं। इनका एक बहुत छोटा सा हिस्सा ऐसा हो सकता है जो स्वाभाविक रूप से अपने बच्चे न होने पर सरोगेसी से बच्चे पैदा करने के बारे में सोचें, लेकिन भारत के सरोगेसी कानून के चलते हुए अब यह काम भी आसान नहीं रह गया है। नियम कानून से बचते हुए अघोषित रूप से किराए की कोख जुटाकर, डॉक्टरों का, अस्पताल का, लाखों रुपए का खर्च करके अगर कोई जोड़ा सरोगेसी से बच्चे पाता भी है तो उस पर बहुत आसानी से 15-20 लाख रुपए खर्च होते हैं। कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री को यह अंदाज ही नहीं है हिंदुस्तान में कितने लोग एक बच्चा पाने के लिए इतनी रकम खर्च कर सकते हैं। ऐसी बेबुनियाद बात किसी महिला के बारे में लापरवाही से कहना बहुत से मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की आदत में शुमार हो चुका है. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल जैसे लोग महिलाओं के बारे में ओछी बातें करने का एक मुकाबला चलाते रहते हैं, और उसकी दौड़ में खुद सबसे आगे रहते हैं. कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री की यह बात उसी दर्जे की है। इस बात का जमकर जवाब देना चाहिए और मीडिया को उनसे पूछना चाहिए कि उन्होंने किस सर्वे या किस अध्ययन के आधार पर भारत की महिलाओं के बारे में या भारत की आधुनिक महिलाओं के बारे में ऐसी अच्छी बात कही है।

आज हालत यह है कि मंच, माइक, माला, और महत्व मिलने पर किसी भी सत्तारूढ़ मुंह से ऊटपटांग बात निकलना शुरू हो जाती है। लेकिन मीडिया इन बातों का तर्कसंगत जवाब हासिल करने के बजाए इन बातों को ज्यों का त्यों परोसकर अपना जिम्मा पूरा कर लेता है। जितने भी अखबारों और समाचार माध्यमों में हमने इस खबर को देखा है, किसी में भी मंत्री से कोई सवाल नहीं किया गया है, न तो कार्यक्रम के अंत में, और न बाद में। इसलिए जिस तरह सामाजिक और धार्मिक नेता मनमाने फतवे जारी करते हैं, उसी तरह सत्तारूढ़ मंत्री मनमानी बातें करने लगते हैं, और एक पूरे तबके का अपमान करने पर उतारू रहते हैं। यह मंत्री एक आदमी है और उसे अगर किसी तबके को पहले सुधारना चाहिए तो वह आदमियों के तबके को सुधारना चाहिए, लेकिन वैसी कोई कोशिश करने के बजाय वह जब महिलाओं का अपमान करने पर उतारू दिखता है तो महिला संगठनों को भी नोटिस भेजकर उससे पूछना चाहिए कि उसने यह बात किस आधार पर की है। वैसे तो अगर देश के महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, या प्रदेशों के भी ऐसे आयोग राजनीतिक मनोनयन से नहीं भरे गए होते, तो हो सकता है कि कोई महिला आयोग कर्नाटक के इस मंत्री को नोटिस भेजकर उससे जवाब मांगते।

हिंदुस्तान में धार्मिक पाखंडियों और उनकी मदद से सत्ता पर पहुंचे हुए लोगों ने यह आदत बना ली है कि वह आए दिन किसी न किसी बहाने भारत की लड़कियों और महिलाओं को नीचा दिखाने की कोशिश करें, उनको सीमाओं में बांधने की कोशिश करें, उनसे मोबाइल फोन छीनने की कोशिश करें, और उनके जींस के ऊपर सलवार-कुर्ता पहनाने की कोशिश करें। यह सब करने के साथ-साथ जब इन्हें गर्व करने की जरूरत लगती है तो इन्हें हिंदुस्तान की उन लड़कियों का ही मोहताज होना पड़ता है जो ओलंपिक तक जाकर मेडल लेकर आती हैं। इन्हें अपनी धार्मिक हसरत पूरी करने के लिए देवियों की प्रतिमाएं लगती हैं, और नवरात्रि पर उपवास करना जरूरी लगता है। लेकिन जब जिंदा लड़कियों और महिलाओं के सम्मान की बारी आती है तो इन्हें वह लड़कियां पैदा होने से पहले ही मार डालने के लायक लगती हैं, या नाबालिग रहते हुए शादी के लायक लगती हैं, या शादी के बाद पति के घर से अर्थी उठने तक बंधुआ मजदूर की तरह काम करने लायक लगती हैं। यह तो बात हिंदुस्तान की आम महिलाओं की है, लेकिन इससे परे जो कामकाजी महिलाएं हैं, जो शहरी या आधुनिक महिलाएं हैं, उनका अपमान करने का एक नया रास्ता कर्नाटक के इस मंत्री ने निकाला है, जिसे लोगों को जमकर धिक्कारना चाहिए।
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