संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : उत्तर प्रदेश में प्रियंका गाँधी की कामयाबी असल में भाजपा की कामयाबी रहने जा रही है?
14-Oct-2021 6:11 PM (144)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : उत्तर प्रदेश में प्रियंका गाँधी की कामयाबी असल में भाजपा की कामयाबी रहने जा रही है?

एक योगी कहे जाने वाले आदमी की चलाई जा रही उत्तर प्रदेश सरकार के तहत इस राज्य का हाल ऐसा हो गया है कि देखकर हैरानी होती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कुछ महीने बाद के चुनाव की तैयारी में आज हिंदुस्तान के अधिकतर समाचार चैनलों पर कई-कई मिनट का इश्तहार लेकर मौजूद हैं और यह साबित करने में लगे हुए हैं कि वहां एक रामराज्य चल रहा है। लेकिन हालत यह है कि उत्तर प्रदेश सांप्रदायिक घटनाओं से भरा हुआ है, बलात्कारों से भरा हुआ है, सत्तारूढ़ भाजपा के लोगों की गाडिय़ों से कुचले हुए किसानों की लाशें अभी आंखों के सामने ही हैं. खुद मुख्यमंत्री के गोरखपुर शहर में योगीराज का विकास देखने बाहर से आकर ठहरे हुए एक शरीफ इंसान को पुलिस आधी रात होटल के कमरे से निकालकर पीट-पीटकर मार डाल रही है, और सरकार को उसकी पत्नी को सरकारी नौकरी देनी पड़ रही है। खबरों की किसी भी वेबसाइट को खोलें तो उत्तर प्रदेश के तरह-तरह के जुर्म भरे पड़े रहते हैं। और जुर्म केवल सत्तारूढ़ लोग कर रहे हैं ऐसा भी नहीं है, अयोध्या की खबर सामने है कि दुर्गा पूजा के दौरान फायरिंग, एक मौत, दो बच्चियां गंभीर, एक दूसरी खबर है कि रामलीला के मंच पर अश्लीलता रोकने गए दारोगा, सिपाहियों को भीड़ ने दौड़ाया, इस तरह की खबरें उत्तर प्रदेश से हर दिन दर्जनों की संख्या में आ रही हैं। मतलब यही है कि वहां राजकाज बदहाल है और राम का नाम लेकर जैसे रामराज को गिनाया जा रहा है उसे सुनकर अगर राम कहीं हैं तो वह भी बेहद शर्मिंदा होंगे। अब कहने के लिए यह कहा जा सकता है उत्तर प्रदेश तो हमेशा से ऐसे जुर्म से भरा हुआ राज रहा है, कोई यह भी कह सकते हैं कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के राज में और ज्यादा जुर्म होते थे, कोई यह भी कह सकते हैं कि बसपा की मायावती मुख्यमंत्री थी तब भी जुर्म बहुत होते थे। लेकिन राम का नाम लेकर काम करने वाले, बिना परिवार वाले, अपने-आपको योगी और सन्यासी बताने वाले एक मुख्यमंत्री के राज में भी अगर यही हाल होना है तो फिर क्या बदला है? और यह तो इस राज्य का पांचवां साल चल रहा है, पांचवें साल के आखिरी महीने चल रहे हैं। उत्तर प्रदेश की पुलिस की हरकतें पूरी तरह से सांप्रदायिक भी दिखती हैं, जातिवादी दिखती हैं, और अपार हिंसा वहां की पुलिस के कामकाज में सामने आ रही है। बलात्कार की शिकार कोई लडक़ी या महिला थाने पहुंचे तो उसके साथ और बलात्कार हो जाए, इस किस्म की बातें वहां से आती हैं।

यह उत्तर प्रदेश हिंदुस्तान को सबसे अधिक प्रधानमंत्री देने वाला प्रदेश रहा है, और महज कांग्रेस के प्रधानमंत्री नहीं, कई पार्टियों के प्रधानमंत्री यहां से दिल्ली पहुंचे हैं। ऐसे में यह प्रदेश न केवल पिछड़ा रह गया, न केवल अनपढ़ रह गया, न केवल आबादी अंधाधुंध बढ़ाने वाला रह गया, बल्कि यह प्रदेश देश की सबसे हिंसक पुलिसवाला प्रदेश बन गया है, और देश में सांप्रदायिकता शायद सत्ता की मर्जी से इस हद तक तो किसी और प्रदेश में चलती नहीं दिखती है। रही सही कसर किसान आंदोलन पर केंद्रीय मंत्री के बेटे का कार चढ़ा देना था, तो वह भी हो गया है और उत्तर प्रदेश सरकार से लेकर भारत सरकार तक के लिए एक शर्मिंदगी की बात खड़ी हुई है।

ऐसे उत्तर प्रदेश में इस चुनाव में भाजपा के सामने आज कम से कम तीन पार्टियां तो दिख रही हैं जिनमें समाजवादी पार्टी की संभावनाएं सबसे अधिक बताई जा रही हैं, उसके बाद बसपा की, और उसके बाद कुछ लोगों का कहना है कि कांग्रेस को भी कुछ सीटें मिल सकती हैं। अभी-अभी एक चुनावी सर्वे सामने आया जो कांग्रेस को शायद दो-चार सीटें दे रहा है। चुनावी नतीजे आने के बाद कांग्रेस को कितनी सीटें मिलती हैं, और कितने वोट मिलते हैं, यह साफ होगा। लेकिन आज जब उत्तर प्रदेश में सरकार का इतना खराब हाल है तो कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भाजपा के खिलाफ समाजवादी पार्टी की संभावनाएं बहुत बड़ी हैं। और इसी के साथ-साथ कुछ लोगों का यह भी मानना है कि कांग्रेस वहां पर वोट काटने वाली एक पार्टी बनकर रह गई है, और प्रियंका गांधी को जितनी शोहरत मिलेगी, उतना ही नुकसान समाजवादी पार्टी का होगा। अब इस बात को बंगाल की मिसाल से समझना बेहतर होगा कि जिस बंगाल में भाजपा की संभावनाएं अंधाधुंध देखी जा रही थीं, और ममता को लोग डावांडोल मान रहे थे वहां पर कांग्रेस और वामपंथी जब शून्य पर चले गए, और ममता बनर्जी आसमान पर चली गईं, और भाजपा को बुरी तरह पीछे छोड़ा। अब अगर उत्तर प्रदेश में वैसी ही एक नौबत आनी है, तो यह जाहिर है कि कांग्रेस वहां पर भाजपा के परंपरागत वोटों में तो कोई सेंध लगा पाने से रही, वह समाजवादी पार्टी या बसपा को मिलने जा रहे ऐसे ही कुछ वोटों को कम करके अपनी थोड़ी सी गुंजाइश निकाल सकती है। ऐसे माहौल में लोग अगर भाजपा को हराने की सोच रहे हैं, तो लोगों को यह भी सोचना पड़ेगा कि क्या गैरभाजपा पार्टियां एक दूसरे के मुकाबले उम्मीदवार खड़े करके सचमुच ही भाजपा को हरा पाएंगी?

पिछला विधानसभा चुनाव गैरभाजपा दलों ने सीटों का बंटवारा करके लड़ा था और सबका तजुर्बा एक दूसरे से खराब था। चुनाव के तुरंत बाद ही सपा, बसपा, और कांग्रेस सभी ने यह कह दिया था कि अब साथ में मिलकर कोई चुनाव नहीं लड़ा जाएगा। ऐसे में यह भाजपा के लिए बड़ी सहूलियत की बात है कि उसके मुकाबले कोई एक अकेला ताकतवर उम्मीदवार नहीं रहने वाला है, और दो-तीन उम्मीदवार गैर भाजपा वोटों को बाटेंगे। फिर मानो यह तीन पार्टियां काफी नहीं हैं इसलिए हैदराबाद शहर के एक हिस्से के राष्ट्रीय नेता असदुद्दीन ओवैसी भी मैदान में आ गए हैं, और वे लगातार मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की एक ऐसी हमलावर कोशिश कर रहे हैं कि जिससे मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो या ना हो, हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में जरूर हो जाए। और उनका मकसद भी शायद यही है. ओवैसी चुनाव के पहले से जिस तरह से भाजपा को फायदा पहुंचाने वाला माहौल बनाने लगते हैं, उससे ऐसा लगता है कि वे भाजपा की एडवांस पार्टी हैं जो कि चुनावी राज्य में पहुंचकर भाजपा के लिए शामियाना बांधने का काम करते हैं। इसलिए आज उत्तर प्रदेश चाहे कितना ही बदहाल क्यों ना हो, जुर्म से कितना ही लदा हुआ क्यों ना हो, इस प्रदेश में चुनाव में विपक्ष जिस हद तक बिखरा हुआ है, और एक दूसरे के खिलाफ है, उससे योगीराज को खतरा कम ही दिखाई पड़ता है। आने वाले महीने बताएंगे कि भाजपा उत्तर प्रदेश में कितनी कामयाबी पाती है, लेकिन यह बात है कि अगर विपक्ष टुकड़ा-टुकड़ा रहे, तो फिर सरकार को अधिक मेहनत करने की जरूरत भी नहीं रहती, और सरकार के सारे कुकर्म धरे रह जाते हैं, उसे कोई सजा नहीं मिल पाती।
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