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पुण्‍यतिथि पर विशेष : महादेवी के निराला भाई: जो न रेखाओं में बंधे न छंद में
15-Oct-2021 5:46 PM (58)
पुण्‍यतिथि पर विशेष : महादेवी के निराला भाई: जो न रेखाओं में बंधे न छंद में

-पंकज शुक्‍ला

पुण्‍यतिथि पर विशेष : महादेवी के निराला भाई: जो न रेखाओं में बंधे न छंद में
हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी का उपनाम ही निराला नहीं था, बल्कि वे वास्‍तव में निराला व्‍यक्तित्‍व ही थे. छायावाद की ही एक अन्‍य स्‍तंभ महादेवी वर्मा के ‘निराला भाई’ न तो रेखाओं में बंधे न छंद में. वे उन्‍मुक्‍त रहें. अखाड़े की पहलवानी देहयष्टि मगर अतुलित सा कोमल ह्रदय. जीवन में ऐसे संघर्ष झेले कि मरू भी भरभरा कर गिर जाए. इतना सरल मन कि जरूरतमंद देखा तो, जो भी पास में था सब दे दिया.

छायावाद के स्‍तंभ कहलाए तो आलोचनाओं की परवाह किए बिना मुक्‍त काव्‍य का मार्ग प्रशस्‍त किया. आज जो आधुनिक कविता है वह असल में निराला के छंद मुक्‍त काव्‍य की भाव धरा पर ही खड़ी है. अनुपम भक्ति काव्‍य लिखने वाली लेखनी ने ही ‘कुकुरमुत्‍ता’ और ‘वह तोड़ती पत्‍थर’ जैसी प्रगतिशील साहित्‍य के लिए अनुकरणीय कविताएं दी हैं.

15 अक्‍टूबर उन्‍हीं निराला की पुण्‍यतिथि है. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म बंगाल की महिषादल रियासत (जिला मेदिनीपुर) में 21 फरवरी 1899 में हुआ था. जीवन का उत्तरार्द्ध इलाहाबाद में बीता. जहां 15 अक्टूबर 1961 को उन्‍होंने देह त्‍यागी. निराला कौन थे, यह जानने के लिए हजार शब्‍दों का एक आलेख, गांधी जी या पंडित नेहरू से‍ भिड़ जाने के किस्‍से, अपना सबकुछ दूसरों को दे देने की संवेदशीलता के उदाहरण, निराला की केवल कविताएं या केवल गद्य को पढ़ने से कुछ न होगा.

निराला को जानना है तो हिन्दी के विख्यात आलोचक रामविलास शर्मा द्वारा रचित जीवनी ‘निराला की साहित्य साधना’ को पढ़ना होगा. ‘निराला की साहित्य साधना’ तीन बड़े खंडों में लिखी हुई आलोचनात्‍मक जीवनी है. इन तीनों खंडों में प्रथम खंड बहुचर्चित रहा है. इस खंड में रामविलास शर्मा ने निराला के जीवन को बहुत निकट से देखा और उसे भावनात्मक रूप से प्रस्‍तुत किया है.

इन बड़े ग्रंथों को न पढ़ा जा सके तो हमें महादेवी वर्मा के संस्‍मरण ‘निराला भाई: जो रेखाएं न कह सकेंगी’ को जरूर पढ़ना चाहिए. यह संस्‍मरण बताता है कि ‘राम की शक्ति पूजा’ जैसी रचना लिखने वाले निराला कितने मानवीय दृष्टिकोणयुक्‍त जीवन को जी गए हैं. इस संस्‍मरण में महादेवी वर्मा लिखती हैं: उस दिन मैं बिना कुछ सोचे हुए ही भाई निराला जी से पूछ बैठी थी, “आप के किसी ने राखी नहीं बांधी?” अवश्य ही उस समय मेरे सामने उनकी बंधन-शून्य कलाई और पीले, कच्चे सूत की ढेरों राखियां लेकर घूमने वाले यजमान-खोजियों का चित्र था.

पर, अपने प्रश्न के उत्तर में मिले प्रश्न ने मुझे क्षण भर के लिए चौंका दिया. ‘कौन बहन हम जैसे भुक्खड़ को भाई बनावेगी?’ में, उत्तर देने वाले के एकाकी जीवन की व्यथा थी या चुनौती यह कहना कठिन है. पर जान पड़ता है किसी अव्यक्त चुनौती के आभास ने ही मुझे उस हाथ के अभिषेक की प्रेरणा दी, जिसने दिव्य वर्ण-गंध-मधु वाले गीत-सुमनों से भारती की अर्चना भी की है और बर्तन मांजने, पानी भरने जैसी कठिन श्रम-साधना से उत्पन्न स्वेद-बिंदुओं से मिट्टी का श्रृंगार भी किया है.’

अपने भाई निराला के औघड़ स्‍वभाव को महादेवी वर्मा ने कुछ यूं याद किया है: ‘उनके अस्त-व्यस्त जीवन को व्यवस्थित करने के असफल प्रयासों का स्मरण कर मुझे आज भी हंसी आ जाती है. एक बार अपनी निर्बंध उदारता की तीव्र आलोचना सुनने के बाद उन्होंने व्यवस्थित रहने का वचन दिया. संयोग से तभी उन्हें कहीं से तीन सौ रुपए मिल गए. वही पूंजी मेरे पास जमा कर के उन्होंने मुझे अपने खर्च का ‘बजट’ बना देने का आदेश दिया.

अस्तु, नमक से लेकर नापित तक और चप्पल से लेकर मकान के किराए तक का जो अनुमान-पत्र मैंने बनाया वह जब निराला जी को पसंद आ गया, तब पहली बार मुझे अपने अर्थशास्त्र के ज्ञान पर गर्व हुआ. पर दूसरे ही दिन से मेरे गर्व की व्यर्थता सिद्ध होने लगी. वे सबेरे ही आ पहुंचे. पचास रुपए चाहिए – किसी विद्यार्थी का परीक्षा-शुल्क जमा करना है, अन्यथा वह परीक्षा में नहीं बैठ सकेगा. संध्या होते-होते किसी साहित्यिक मित्र को साठ देने की आवश्यकता पड़ गई.

दूसरे दिन लखनऊ के किसी तांगे वाले की मां को चालीस मनीआर्डर करना पड़ा. दोपहर को किसी दिवंगत मित्र की भतीजी के विवाह के लिए सौ देना अनिवार्य हो गया. सारांश यह कि तीसरे दिन उनका जमा किया हुआ रुपया समाप्त हो गया और तब उनके व्यवस्थापक के नाते यह दानखाता मेरे हिस्से आ पड़ा. एक सप्ताह में मैंने समझ लिया कि यदि ऐसे अवढर दानी को न रोका जावे तो यह मुझे भी अपनी स्थिति में पहुँचा कर दम लेंगे. तब से फिर कभी उनका ‘बजट’ बनाने का दुस्साहस मैंने नहीं किया.

बड़े प्रयत्न से बनवाई रजाई, कोट जैसी नित्य व्यवहार की वस्तुएँ भी जब दूसरे ही दिन किसी अन्य का कष्ट दूर करने के लिए अंतर्धान हो गईं, तब अर्थ के संबंध में क्या कहा जावे जो साधन मात्र है.

निराला का यह स्‍वभाव तब था जब वे जीवन में अपरिमित संघर्ष और कष्‍ट झेल रहे थे. उनके व्‍यक्तित्‍व का यह अनूठा ही पहलू है कि तमाम कठिन परिस्थितियां उनके संवेदनशील और लड़ाका स्‍वभाव को नहीं बदल पाईं. यह कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का ही व्‍यक्तित्‍व था कि वह महात्‍मा गांधी से जा कर सीधे भीड़ गए थे. किस्‍सा है कि निराला ने बापू से पूछा लिया था कि आपने कहा है कि हिंदी में कोई रवींद्र नाथ टैगौर नहीं है.

बापू बोले- हां ! लिखा तो है. इस पर निराला ने पूछा- क्या आपने निराला को पढ़ा है? बापू ने कहा- पढ़ा नहीं है. आप अपनी किताबें महादेव भाई को भेज दीजिए. बापू ने कहा जरूर लेकिन निराला मन से इसके लिए तैयार नहीं हुए. वे बापू को एक कहानी सुना चले गए.

बकौल महादेवी वर्मा वह किस्सा कुछ यूं था-एक व्यक्ति घोड़े वाले के पास घोड़ा मांगने पहुंचा. घोड़े वाले ने कहा घोड़ा नहीं है. इसी बीच घोड़े के हिनहिनाने की आवाज सुनाई दी. मांगने वाले ने कहा घोड़ा तो हिनहिना रहा है. घोड़े वाले ने कहा आपने घोड़े की आवाज पहचानी पर मेरी नहीं. मैं घोड़ा देना नहीं चाहता हूं. कहानी खत्म करते हुए निराला जी ने कहा- बापू!  मैं आपकी आवाज पहचान गया हूं. आपके घोड़े की आवाज पहचानना नहीं चाहता. यह कहते हुए निराला जी बापू के कमरे से निकल गए.

वीणावादिनी से ‘नव गति, नव लय, ताल-छंद नव’ देने का आह्वान करने वाले निराला ने ही हिंदी कविता को मुक्‍त छंद दिया है. परिमल की भूमिका में वह लिखते हैं, “मनुष्य की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है. मनुष्य की मुक्ति कार्यों के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छंदों के अनुशासन से अलग हो जाना है.” वह कविता के छंद की मुक्ति की परिकल्‍पना करते हैं क्‍योंकि वे सामंती बंधन स्‍वीकार नहीं करते हैं.

वे पहले छंद में सिद्ध हुए फिर अपने काव्‍य को इस बंधन से मुक्‍त कर पाए. प्रख्‍यात ललित निबंधकार डॉ. श्रीराम परिहार इस बारे में लिखते हैं:’ निराला कविता की छंद से मुक्ति कतई नहीं चाहते थे, वरन कविता को मुक्त छंद के नए कलेवर में अपने समय के जीवन को बद्ध करते हैं. नई छंद योजना की दृष्टि से ‘राम की शक्ति पूजा’, ‘तुलसीदास’ और ‘वनबेला’ विशिष्ट हैं. यहाँ तक की ‘कुकुरमुत्ता’ जैसी रचना में भी लय टूटी नहीं और छंद अपना नया रूप पाता है.

निराला ने मुक्त छंद की साधना की और हिंदी कविता को युगांतकारी मोड़ और दिशा दी. वे छंद विशेषकर मुक्त छंद के प्रबल पक्षधर थे और उन्होंने इस साधन पक्ष के माध्यम से भारतीय काव्य शास्त्रीय परंपरा में छांदसिक और भाषाई नए प्रतिमान जोड़े हैं. निराला का प्रभाव परवर्ती काव्य-चिंतन और काव्यशिल्प दोनों स्तरों पर बहुत दूर और बहुत देर तक दिखाई पड़ता है.’

महादेवी वर्मा ने अपने भाई निराला के लिए लिखा है:’ निराला जी अपने शरीर, जीवन, और साहित्य सभी में असाधारण हैं. उनमें विरोधी तत्वों की भी सामंजस्यपूर्ण संधि है. उनका विशाल डीलडौल देखने वाले के हृदय में जो आतंक उत्पन्न कर देता है उसे उनके मुख की सरल आत्मीयता दूर करती चलती है. किसी अन्याय के प्रतिकार के लिए उनका हाथ लेखनी से पहले उठ सकता है अथवा लेखनी हाथ से अधिक कठोर प्रहार कर सकती है, पर उनकी आँखों की स्वच्छता किसी मलिन द्वेष में तरंगायित नहीं होती.‘

ऐसे थे निराला. जिनका सारा रचना कर्म और जीवन भी हम विस्‍मृत कर जाएं तो भी केवल एक कविता ‘तोड़ती पत्थर’ जब तब हमारी संवेदनाओं को छू जाने में सक्षम है. कौन होगा जिसे सड़क किनारे काम करती महिलाओं को देख यह कविता याद नहीं आती होगी? कौन होगा जो आज के साहित्‍यकारों में सत्‍ता से‍ भिड़ जाने वाली निराला सी लेखनी और व्‍यक्तित्‍व की आस न करता होगा?

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

(news18.com)

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