साहित्य/मीडिया

‘नए घर में अम्मा’ के बहाने हिंदी साहित्य में विधवा स्त्रियों के जीवन पर चर्चा
17-Oct-2021 9:55 PM (64)
‘नए घर में अम्मा’ के बहाने हिंदी साहित्य में विधवा स्त्रियों के जीवन पर चर्चा

– जितेन्द्र विसारिया

हिंदी साहित्य में विधवा स्त्रियों के जीवन पर बहुत लिखा गया है. प्रेमचंद-‘बेटों वाली विधवा’, ‘सुभागी’, ‘बूढ़ी काकी’; फणीश्वर नाथ रेणु की ‘संवदिया’; शैवाल-‘दामुल’; शिव प्रसाद की ‘कर्मनाशा की हार’; रांगेय राघव की ‘गदल’; ए. असफ़ल की ‘मनुजी तैने बरन बनाये’ और शिवमूर्ति की ‘कुच्ची का कानून’ मेरे संज्ञान में हिंदी की विधवा स्त्री पर महत्वपूर्ण कहानियां हैं.

इन कहानियों में भारतीय समाज में पति की मृत्यु के बाद समाज में अरक्षित-अकेली पिता-पुत्रों और परिजनों के संरक्षण में संत्रास झेलती स्त्री की मनोदशा का अच्छा-खासा चित्रण है.

इन कहानियों में यूं तो विधवा जीवन से जुड़ी कई समस्याएं हैं पर उनमें प्रमुख समस्या है, विधवा स्त्री के निःसन्तान रहने पर पति या स्वयं की सम्पत्ति के बंटवारे को लेकर पारिवारिक कलह. यह कलह तब कितनी गहरी होती थी कि बंगाल में हिन्दू कानून ‘दायभाग’ के चलते, पति की सम्पत्ति में पत्नी को मिले अधिकार के कारण उन्हें जिंदा ना छोड़ मृत पति के साथ चिता में जिंदा ही झोंक दिया जाता था.

जो बची रहतीं उनके होते उस सम्पत्ति का क्या होता? इसका एक भयावह दृश्य हम फणीश्वर नाथ रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‘संवदिया’ के इस वाक्य से समझ सकते हैं- “भगवान भले आदमी को ही कष्ट देते हैं. नहीं तो एक घंटे की बीमारी में बड़े भैया क्यों मरते? …बड़ी बहुरिया की देह से जवेर खींच-खींच कर बंटवारे की लीला हुई, हरगोबिन ने देखी है अपनी आंखों से द्रौपदी-चीरहरण लीला! बनारसी साड़ी को तीन टुकड़े करके बंटवारा किया था, निर्दयी भाइयों ने। बेचारी बड़ी बहुरिया!”

‘हंस’ मार्च-2021 में प्रकाशित योगिता यादव की ‘नए घर में अम्मा’ कहानी भी लगभग इससे बहुत हटकर नहीं है. अपने पति की मृत्यु के बाद निःसन्तान अम्मा की भी वही हालत है-“बाबा के जाने के बाद उनकी जमीन-जायदाद पर सब कुत्‍तों की तरह टूट पड़े. पर कलह ऐसी मची कि किसी ने न किसी को खेत-खलिहान लेने दिए, न बोने दिए. अम्‍मा ने कुनबे से बाहर वालों को जमीन जोतने-बोने को देनी चाही, तो लठ बज गए. बस तब से ये ऐसी ही खाली पड़ी है. सब की आंखों में चुभती, पर कोख में एक बीज रोपे जाने को तरसती.”

‘नए घर में अम्मा’ की त्रासदी केवल घरेलू सम्पत्ति का बंटवारा ही नहीं है. समाज में अकेली और असहाय पड़ गई स्त्री को किसी के भी भोग लेने की पितृसत्तात्मक पुरुषवादी कुंठा भी यहां हावी है. योगिता यादव ने इस सच को भी बड़े साहस के साथ कहानी में उकेरा है- “रोटी से लेकर बोटी तक सब नोंच डालते ये हैं लड़के, जो कभी अम्‍मा ने गोद खिलाए थे. अब क्‍या इस पर अम्‍मा रो भी नहीं सकतीं. ये लड़के जब जवान हो जाते हैं, तो किसी की परवाह नहीं करते. जिसका जहां दांव लगे, उसी पर हाथ साफ करते चलता बनते हैं.”

विधवा स्त्रियों के यौन शोषण की यह बात साहित्य और समाज में नई नहीं है. ‘दामुल’ की ‘महात्माइन’ जहां अपने जेठ माधो पांडेय के यौन शोषण का शिकार होती हैं. गर्भ रहने पर तीर्थ यात्रा के बहाने गर्भ गिराकर घर लौट आती है. अंततः घर और सर ख़ुद अपने सिर उठाने के चक्कर में मारी जाती हैं. तो ए. असफल की ‘मनुजी तैने बरन बनाये’ कहानी की दलित विधवा लीला भी सहानुभूति के नाम पर अहीर युवक अजान के यौन शोषण का शिकार होती है.

हां, शिवमूर्ति की कहानी ‘कुच्ची का का कानून’ की ‘कुच्ची’ अवश्य खुदमुख्तार महिला है जो अपनी कोख पर अपना हक़ समझती है. वह समाज में कुत्सित रूप से प्रचलित संतान के जायज़ और नाज़ायज होने की परिभाषा ही बदल देती है. वह स्त्री की कोख पर स्त्री के ही हक़दार होने की हामी है.

योगिता यादव की कहानी ‘नए घर मे अम्मा’ की स्थिति दयनीय है, वह विधवा होने के साथ-साथ बूढ़ी भी है. वह किसी का प्रतिरोध नहीं कर सकती. बस बात-बात पर रोने लगती है और इस भरी दुनिया में उनकी बस एक भोली इच्छा इतनी भर है कि उनके टूटे और बिना छान वाले घर पर कैसे भी छत गिर जाए.

गांव में भर चौमासे बिना छान बरसात में टपकने वाले घर और उस घर में अकेली स्त्री की चिंता, बहुत बड़ी है. यह चिंता हमें मध्यकालीन सूफ़ी जायसी के यहां भी दिखाई पड़ती है-
बरसै मेह, चुवहिं नैनाहा। छपर छपर होइ रहि बिनु नाहा॥
कोरौं कहाँ ठाट नव साजा। तुम बिनु कंत न छाजन छाजा॥

अब जायसी की बात पुरानी हुई. देश में अब लोकतंत्र है. जन हितैषी संविधान है. उसके आधार पर चलने वाला जैसा-तैसा एक तंत्र भी है. ऐसे में समाज के हाशिये पर पड़ी एक वृद्ध विधवा के घर की टूटी छत और उसकी गृह कलह में बंजर पड़ी ज़मीन में फसल उग सके? जबकि गांव भर में अपने निरन्तर रोते रहने के चलते ‘रोवनहारी अम्मा’ के नाम से चर्चित उस वृद्धा को अब किसी पर भी बिल्कु भरोसा नहीं है-““ऐ मुझ अभागिन को घरैया नाय कर रहे, सरकार कहां करेगी?”

और इसके उलट उच्च शिक्षित और नौकरी करने से पहले पिता की मर्ज़ी से गांव में ब्याह दी गई गांव की पहली महिला प्रधान की चिंता इस तंत्र में एक शोषित विधवा को न्याय दिलाने की है- “अब प्रधाननी को भी अहसास हुआ कि जो वो अखबारों में पढ़ती हैं, वो तो उनके अपने गांव में ही हो रहा है. तो उनके प्रधान बनने का क्‍या फायदा. आजादी के इतने सालों बाद भी अगर एक बूढ़ी बेबस विधवा सिर छुपाने को छत नहीं जुटा पा रही तो लानत है ऐसे लोकतंत्र पर. और बेकार है उनकी पढ़ाई-लिखाई, उनकी प्रधानी, उनके सब संकल्‍प.” (news18.com)

अन्य पोस्ट

Comments