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मुझे आज साहिल पे रोने भी दो, कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है- मजाज़ लखनवी
20-Oct-2021 12:18 PM (58)
मुझे आज साहिल पे रोने भी दो, कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है- मजाज़ लखनवी

Urdu Poet Majaz Lakhnavi: सुप्रसिद्ध शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ मजाज़ के बारे में लिखा है- “मजाज़ की क्रांतिवादिता आम शायरों से भिन्न है. मजाज़ क्रांति का प्रचारक नहीं, क्रांति का गायक है. उसके नग़मे में बरसात के दिन की सी आरामदायक शीतलता है और वसंत की रात की सी प्रिय उष्णता की प्रभावात्मकता.”

सही मायनों में कोई क्रांति का गायक ही ये लाइन गुनगुना सकता है-

जिगर और दिल को बचाना भी है
नज़र आप ही से मिलाना भी है

महब्बत का हर भेद पाना भी है
मगर अपना दामन बचाना भी है

ये दुनिया ये उक़्बा कहाँ जाइये
कहीं अह्ले -दिल का ठिकाना भी है?
(उक़्बा- परलोक)

मुझे आज साहिल पे रोने भी दो
कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है

ज़माने से आगे तो बढ़िये ‘मजाज़’
ज़माने को आगे बढ़ाना भी है

मजाज़ लखनवी के नाम से मशहूर असरारुल हक़ मजाज़ उर्दू के प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े रोमानी शायर के रूप में प्रसिद्ध रहे हैं. लखनऊ से जुड़े होने से वे ‘मजाज़ लखनवी’ के नाम से भी प्रसिद्ध हुए. मजाज़ ने कम लिखा लेकिन ऐसा लिखा कि उसे सदियों तक पढ़ा जाएगा.

Majaz Lakhnavi Shayari

मजाज़ लखनवी का जन्म 19 अक्टूबर, 1911 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के रुदौली गांव में हुआ था. हालांकि फ़िराक़ गोरखपुरी समेत कुछ विद्वान उनकी जन्मतिथि 2 फरवरी, 1909 मानते हैं. उनके पिता का नाम चौधरी सिराजुल हक़ था.

मजाज़ आगरा में पले-बढ़े और वहीं तालीम हासिल की. पिता इंजीनियर बनाना चाहते थे. लेकिन मजाज़ तो मुहब्बत और इन्किलाब के लिए पैदा हुए थे.

वे आग़ाज करते हैं-

आओ मिल कर इन्किलाब ताज़ा पैदा करें
दहर पर इस तरह छा जाएं कि सब देखा करें

और निकल पड़े इन्किलाब करने के लिए. साइंस छोड़ दी और फिर से आर्ट लेकर अलीगढ़ से इंटरमीडिएट का इम्तिहान पास किया. 1935 में उन्होंने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से बीए पास किया. शायरी के अलावा मजाज़ को हॉकी के भी अच्छे खिलाड़ी थे.
Majaz Lakhnavi Poetry

उनका व्यक्तित्व और शायरी में ऐसा आकर्षण था कि हर महफिल में छा जाते थे-

तुम कि बन सकती हो हर महफ़िल मैं फिरदौस-ए-नज़र
मुझ को यह दावा कि हर महफ़िल पे छा सकता हूँ मैं

मजाज़ खुद ही नहीं दूसरों को भी क्या से क्या बनाने का तजुर्बा रखते थे-

दिल मैं तुम पैदा करो पहले मेरी सी जुर्रतें
और फिर देखो कि तुमको क्या बना सकता हूँ मैं

असरारुल हक़ मजाज़ ने पहली नौकरी ऑल इंडिया रेडियो में की थी. 1935 में एक साल तक ऑल इंडिया रेडियो की पत्रिका ‘आवाज़’ के सहायक संपादक भी रहे थे. परंतु, अधिक दिनों तक नौकरी नहीं रह सकी. भला कोई दीवाना भी कहीं टिक कर रह सकता है. मजाज़ की शख्सियत में रवानगी थी. वो एक जगह ठहर नहीं सकते थे-

कमाल-ए-इश्क़ है दीवान हो गया हूँ मैं
ये किसके हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं

तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया
बचा सको तो बचा लो, कि डूबता हूँ मैं

ये मेरे इश्क़ मजबूरियाँ मा’ज़ अल्लाह
तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं

इस इक हिजाब पे सौ बेहिजाबियाँ सदक़े
जहाँ से चाहता हूँ तुमको देखता हूँ मैं

बनाने वाले वहीं पर बनाते हैं मंज़िल
हज़ार बार जहाँ से गुज़र चुका हूँ मैं

कभी ये ज़ौम कि तू मुझसे छिप नहीं सकता
कभी ये वहम कि ख़ुद भी छिपा हुआ हूँ मैं

मुझे सुने न कोई मस्त-ए-बाद ए-इशरत
मजाज़ टूटे हुए दिल की इक सदा हूँ मैं

और मजाज़ को दिल्ली में ना नौकरी में सफलता मिली न इश्क में. वे लंबे समय तक बेरोजगार रहे. इस दरम्यिान कई काम किए लेकिन कामयाबी हासिल नहीं हुई. बेरोजगारी और भविष्य की ओर से निराशा ने अंदर ही अंदर उन्हें खोखला कर दिया था.

ख़ूब पहचान लो असरार हूँ मैं,
जिन्स-ए-उल्फ़त का तलबगार हूँ मैं

इश्क़ ही इश्क़ है दुनिया मेरी,फ़ित्नः-ए-अक़्ल से बेज़ार हूँ मैं

ख़्वाब-ए-इशरत में है अरबाब-ए-ख़िरद,
और इक शायर-ए-बेदार हूँ मैं

मजाज़ प्रगतिशील आंदोलन के प्रमुख हस्ती रहे अली सरदार जाफ़री के निकट संपर्क में थे. स्वभाव से रोमानी शायर होने के बावजूद उनके काव्य में प्रगतिशीलता के तत्त्व मौजूद रहे हैं. उपयुक्त शब्दों का चुनाव और भाषा की रवानगी ने उनकी शायरी को लोकप्रिय बनाने में प्रमुख कारक तत्व की भूमिका निभायी है. उन्होंने बहुत कम लिखा, लेकिन जो भी लिखा उससे उन्हें काफी प्रसिद्धि मिली.

कब किया था इस दिल पर हुस्न ने करम इतना
मेहरबाँ और इस दर्जा कब था आसमाँ अपना

तेरे माथे पे ये आँचल तो बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था

(news18.com)

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