विचार / लेख

घर के दरवाजे छोटे पर दिल बड़े थे...
23-Oct-2021 12:31 PM (482)
घर के दरवाजे छोटे पर दिल बड़े थे...

-अपूर्व गर्ग

अब फिज़ा बदल गई। कभी अक्टूबर के आगमन के साथ ठंडी सुबह पर गर्म दोपहर और शामें सुहानी होती थीं। दशहरे में रावणभाटा में पतंगों की रंग-बिरंगी बिदाई के साथ गिल्लियां मैदानों में तैनात हो जातीं। मच्छरदानी के डण्डों, पटियों से शुरूआत हो जाती और उस दौर में बढ़ईपारा की गिल्लियाँ बड़ी ‘लक्सेरियस’ वस्तु मानी जाती थी ।

बढ़ईपारा की गिल्लियों की कद्र वही कर सकता था, जो ‘रेटकुल गिल्ली’ से खेला हो, जिसने ‘खप्पट आरी’ भौरें से दूसरों के भौरों की धज्जियाँ उड़ाई हो, जो ‘लग्घड़ पतंगों’ का शौकीन हो और  पुछनड़ी से शुरू कर अद्धी, चांदतारा, मोढ़ा, तिरंगा, नागिन पतंगे उड़ा चुका हो। ऐसे लोगों की जेबें कंचों से खनखनाती थीं और ये अपने-अपने ‘अड्डो’ में  ‘होड़ा’ ही नहीं ‘गीर’ भी खेलते!

 

24 गुणा 7 टीवी, इंटरनेट फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टा का जब इतिहास लिखा जायेगा तो ये दर्ज होगा कि ये सभ्यता, संस्कृति, मेल-मिलाप के ही नहीं देशी खेलों के भी कातिल हैं।

बड़े-बड़े दानवी विकास ने छोटी-छोटी उन चीजों को छीन लिया या अप्रासंगिक कर दिया जिसमें वो पुराना रायपुर खुशियाँ ढूंढता, जिसमें उसकी मोहब्बत बसी होती। इंसानी सभ्यता ने कब और कैसे इतनी भयानक करवट ली कि इसके तले सर्कस, मीना बाजार क्या नागपंचमी की कुश्ती, पोला के बैल, दशहरे की पतंगें, दिवाली का राउत नाचा सब कुछ दब गया।

कभी रंग-बिरंगी पतंगों से ढंके आकाश को निहारते पलकें नहीं झुकती थीं, आज वही नजरें आभासी दुनिया में टिकी रहती हैं।

कभी ठेलों और गुमटियों के स्वादिष्ट खाने पर लोग जान छिडक़ते थे, आज उपेक्षित से पड़े उन्हीं ठेले और गुमटी वालों की जान पर बन आई है।

जो रिक्शे वाला कभी हमारे परिवार का सदस्य था आज वो अपने रिक्शे से ही नहीं अपने परिवार से दूर कहाँ मजदूरी कर रहा कोई नहीं जानता। सब कुछ मशीनी धुंए में खो चुका।

आज सडक़ों पर 2-4 गाय भैंस दिख जाये तो ट्रैफिक अव्यवस्था वाला फोटो छप जाता है। कभी इन्हीं सडक़ों पर साइकिल-रिक्शे इन मवेशियों के बीच आराम से गुजरते। स्कूल के बाहर ये ऐसे इंतजार करते मानों छुट्टी के इंतज़ार में हों। एक पुराने स्कूल को छेरी कुरिया भी कहा गया पर उसकी प्रतिष्ठा पर आंच न आई। क्योंकि न तो ये शहर बनावटी था न ही तब लोग इतने बनावटी, नाटकीय और मतलबी थे।

रायपुर की अपनी एक अलग विशिष्ट संस्कृति थी। उस रायपुर में घर के दरवाजे छोटे पर दिल बड़े थे।

घर के आंगनों में वो प्यार बरसता, दिल से खातिरदारी होती जो आज चमचमाते ड्राइंग रूम में महसूस भी न हो। गली-मोहल्लों में सब अपने थे, अपनापन था, पर अब सब कुछ बेगाना है, बंट गया-बंटता जा रहा, भाईचारा टूट गया-टूटता जा रहा। चबूतरे सूने हैं। शतरंज, पत्ते, चौपड़ बिछते नहीं। आँगन की अड्डेबाजी खत्म सी हो गई। मोहल्ला रिपोर्टर अब मिलते नहीं। मुझे ये सब कुछ आभासी दुनिया पर याद करना पड़ रहा।

आप भी इसे आभासी दुनिया में पढ़ रहे। पर इस आभासी दुनिया में रहते हुए हमें वही पुराना शहर, पुराने लोग, पुराने खेल, पुराने दिन की यादें हवा के ताजे झोके की तरह तन मन को तृप्त कर जाती हैं।

जैसे-जैसे अक्टूबर महीना गुजरता जा रहा, दशहरे से हम दिवाली की ओर बढ़ रहे वो दिन याद आ रहे जब दुर्गा पूजा से दिवाली तक बच्चों की दिवाली मनती थी।

तब और आज के बीच पतंगें, कंचे, भौरें, गिल्लियों की यादें बिखरी हुई हैं।
सोचा सबको एक-एक कर याद करूँ पर न जाने सब कुछ एक साथ याद आ गया।

‘वो दिन भी हाय क्या दिन थे जब अपना भी तअल्लुक था। दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से।’

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