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जितना समझा गया था, उससे कहीं बाद में विलुप्त हुए थे विशालकाय मैमथ
27-Oct-2021 9:51 AM (69)
जितना समझा गया था, उससे कहीं बाद में विलुप्त हुए थे विशालकाय मैमथ

पृथ्वी पर जीवन के इतिहास में डायानसोर ही सबसे विचित्र जानवर थे. उनसे भी कई विचित्र जानवर भी हुआ करते थे. ऐसे ही हाथी जैसे दिखने वाले विशालकाय मैमथ हुआ करते थे. माना जाता है कि पिछले हिमयुग के खत्म होने के समय करीब 13000 साल पहले जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी के तीन चौथाई जीव मरने लगे थे जिसमें मैमथ भी थे. लेकिन इसका सही समय अभी तक विवाद का विषय है. नए अध्ययन में एक नई पद्धति से इस समस्या को सुलझाने का प्रयास किया गया है जिसके मुताबिक मैमथ जितना समझा जा रहा था उसके काफी बाद विलुप्त हुए थे.

तब तक मानव सभ्यताएं भी
हिमयुग में रहने वाले जीवों के लिए वह जलवायु परिवर्तन बहुत ही दुष्कर साबित हुआ था. नेचर में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पर्यावरणीय डीएनए विश्लेषण पद्धति का उपयोग किया और पाया कि साइबेरिया के प्रमुख भूभाग में मैमथ 39 हजार साल पहले रहा करते थे. यह वही समय था जब मिस्र में महान गीजा पिरामिड का निर्माण हो चुका था.

ऊनी राइनों का भी था यही हाल
वैज्ञानिकों के मुताबिक मैमथ साइबेरिया के प्रमुख भूभाग में बहुत कम सख्या में रहा करते थे जो हिमयग के बाद गर्म हो रही जलवायु के संक्रमण काल के दौरान खुद को बचाने में सफल हो गए थे. लेकिन मैमथ के अलावा ऊनी राइनो भी इस खुद को बचाने में कामयाब हो सके थे और माना जाता था कि वे भी 14 हजार साल पहले खत्म हो गए थे. लेकिन पर्यावरणीय डीएनए विश्लेषण से पता चलता है कि वे आर्कटिक के बाहर करीब 9800 साल पहले भी जिंदा थे.

कहां से लिए गए अध्ययन के लिए नमूने
पर्यावरणीय डीएनए विश्लेषण के इस प्रोजेक्ट में शामिल वैज्ञानिकों ने साइबेरिया, अलास्का, कनाडा और स्कैनडिनेविया के 73 स्थानों के जमी हुई झीलों के अति ठंडे इलाकों से अवसाद आदि के 535 नमूने जमा किए, जहां मैमथ के अवशेष पाए गए थे.  इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह जानने का भी प्रयास किया कि क्या मैमथ के विलुप्त होने में मानवों की भी कोई भूमिका थी.

संभावना कम ही है
इस सवाल को लेकर भी वैज्ञानिकों में काफी बहस होती रही है. यह भी माना जाता रहा है कि मैमथ के समूल विनाश में मानवों की उनके अत्यधिक शिकार करने की गतिविधि की अहम भूमिका थी. इस शोध में उपयोग में लाए गए मॉडल में शोधकर्ताओं ने मानव उपस्थिति के बहुत कम मिले पुरातत्व संकेतों के रिकॉर्ड और डीएनए की जगह मानव अनुकूल जलवायु के उपस्थिति का उपयोग किया. उन्होंने पाया की इसकी संभावना कम ही थी के मानव मैमथ के विनाश के लिए जिम्मेदार रहे होंगे.

केवल मैमथ ही नहीं
शोधकर्ताओं का मानना है कि विनाश आर्कटिक के एक खास परिस्थितिकी तंत्र में आया था, जिसे मैमथ स्टेपी कहते हैं जो आज मौजूद नहीं है. इससे जलवायु गर्म और नम हो गई थी. नेचर में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक शोधकर्ताओं ने मैथम, ऊनी राइनो, घोड़े स्टेपी भैंसों से संबंधित ऐसी बहुत सी तारीखें दी जो जीवाश्म द्वारा दर्शाए गए रिकॉर्ड से बहुत आगे की थीं. इस अध्ययन से इस बात के मजबूती मिलती है कि आर्कटिक में जीव काफी देर तक खुद को बचाए रख सके थे.

गति से मात खा गए मैमथ
इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता एस्के विलिर्सलेव ने एक  बयान में कहा, “हम आखिर यह सिद्ध कर सके हैं कि केवल जलवायु परिवर्तन ही समस्या नहीं थी, बल्कि यह उसकी तेजी थी जिसकी वजह से अंततः मैमथ जैसे जीवों का विनाश हो सका. मैमथ उस गति से खुद को बदले हुए हालात में नहीं ढाल सके जिस तेजी से जलवायु बदल रहा था.

इस अध्ययन के लेखकों में से एक कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के जूओलॉजी विभाग के रिसर्च एसोसिएट यूचेंग वांग ने बताया, “एक जानवर का डीएनएस उसके गोबर, पेशाब, बाहरी कोशिकाओं, बालों आदि से फैलता रहता है. लेकिन मरने पर एक हड्डी का ढांचा ही रह जाता है जिसके भी संरक्षित होने की संभावना कम होती है. लेकिन पर्यावरण में संरक्षित इनमें से कुछ ही डीएनए अणुओं की सीक्वेंसिंग से काफी कुछ पता चल जाता है. इसलिए हैरानी की बात नहीं है कि अवसादी डीएनए बाद का और विनाश के समय का ज्यादा सटीक आंकलन दे सकता है. (news18.com)

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