संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : हिंदुस्तानी डूबे रहते हैं धनबल, दलबल की ताकत के नशे में...
06-Nov-2021 5:10 PM (131)
 ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  हिंदुस्तानी डूबे रहते हैं धनबल, दलबल की ताकत के नशे में...

दिवाली की अगली सुबह चारों तरफ कचरा ही कचरा फैला हुआ था, संपन्न इलाकों में यह कुछ अधिक था जहां पर लोगों ने बड़े-बड़े महंगे फटाके बड़ी संख्या में फोड़े थे। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे, और उन्होंने एक सफाई अभियान छेड़ा था, तो झाड़ू लेकर तस्वीरें खिंचवाने का एक मुकाबला देश भर में चल निकला था। उस वक्त उन्होंने दिवाली की अगली सुबह लोगों को अपना-अपना पैदा किया हुआ कचरा बटोरने के लिए भी कहा था, और लोग अगली सुबह झाड़ू लेकर अपने घर के सामने कचरा इकट्ठा कर भी रहे थे। लेकिन उसके अगले ही बरस से ऐसा कुछ भी दिखना बंद हो गया, और संपन्न लोगों का खड़ा किया हुआ पटाखों का कचरा विपन्न सफाई कर्मचारियों का इंतजार करते हुए बिखरा रहा। ऐसा इसलिए हुआ कि दिवाली के बाद अपने घर के सामने की सफाई करना, एक राजनीतिक नारे की तरह उछाला गया था, और लोगों ने उसे तब तक ही माना जब तक कि उसकी गूंज हवा में बनी हुई थी, उन्होंने शायद दिवाली की अगली सुबह के बाद से ही इस नारे पर अपने घर के बाहर अमल बंद कर दिया गया। फिर वहां-वहां झाड़ू जारी रहा जहां पर कोई राजनीतिक आयोजन होना था, जहां पर किसी मंत्री को अपने आपको मोदी के प्रति वफादार साबित करने के लिए, अपनी तस्वीर खिंचवाने के लिए, झाड़ू पकडक़र कुछ मिनट कचरा साफ करना था। यह कुछ उसी किस्म का है जिस तरह से आज कॉलेज के छात्रों के बीच राष्ट्रीय सेवा योजना नाम का एनसीसी सरीखा एक कार्यक्रम चलता है जिसमें कहीं कचरा साफ करने या कहीं झाडिय़ों को साफ करने के लिए छात्र-छात्राओं का जत्था अपने प्रभारी प्राध्यापक की अगुवाई में इकट्ठा होता है, और बैनर टांगकर 15-20 मिनट सफाई की जाती है, और तस्वीरें खींचकर वहां से रवानगी डाल दी जाती है। हिंदुस्तानियों के बीच चरित्र की ईमानदारी इस कदर कमजोर है कि वह कदम-कदम पर सामने आती है। दिखावे के लिए किसी काम को करना लोगों को बहुत सुहाता है, लेकिन तस्वीरें खिंच जाएं उसके बाद उनकी दिलचस्पी उस काम में खत्म हो जाती है। लोग बैनर लेकर चलते हैं और जहां मौका मिले वहां चार लोग बैनर लेकर खड़े हो जाते हैं और तस्वीरें खिंचवाते हैं। यह सिलसिला हिंदुस्तान के लोगों में गहराई तक बैठी हुई एक बेईमानी का सुबूत है कि वे दिखावे के लिए भी किसी नेक काम को कुछ घंटे भी करना नहीं चाहते, और एक फर्जी सुबूत गढ़ लेने तक ही उनकी दिलचस्पी इस काम में रहती है।

लोग सोशल मीडिया पर अपनी प्रोफाइल फोटो में अपने बच्चों के साथ अपनी तस्वीर लगाते हैं, और उसके बाद उसी प्रोफाइल से वैचारिक रूप से असहमत दूसरी महिलाओं को बलात्कार की धमकी देते हैं, उनके बारे में अश्लील बातें लिखते हैं, गंदी गालियां लिखते हैं। फिर अगले ही ट्वीट, या अगली फेसबुक पोस्ट पर वे अपने धर्म की तारीफ करते हैं, अपने इष्ट देव या इष्ट देवी की तस्वीरें लगाते हैं। यह पूरा मिजाज चरित्र और तथाकथित नैतिकता की बेईमानी का एक बड़ा खुला मामला है जिसमें लोग अपने आपको धार्मिक बतलाते हैं, आध्यात्मिक बतलाते हैं, किसी एक राजनीतिक विचारधारा से जुड़ा हुआ बताते हैं, और उसके बाद इस देश की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बेजा इस्तेमाल करते हुए हिंसा की बातें लिखते हैं, अश्लील बातें लिखते हैं, और धमकियां लिखते हैं। लोगों की ना केवल सार्वजनिक जीवन के प्रति कोई ईमानदारी नहीं है बल्कि लोगों की अपनी खुद की तथाकथित सामाजिक नैतिकता के प्रति भी कोई ईमानदारी नहीं है। लोग इस देश के एक काल्पनिक और गौरवशाली इतिहास का गुणगान करते नहीं थकते, लोग अपने देवी-देवताओं का कीर्तन करते नहीं थकते, लेकिन यही लोग दूसरे इंसानों के खिलाफ वैसे काम करते हैं जैसे कि वे अपनी कहानियों में राक्षसों का किया हुआ बताते हैं।

हिंदुस्तान में जब किसी व्यक्ति के चरित्र की नैतिकता को देखना है तो उसके सार्वजनिक जीवन के व्यवहार को उस वक्त देखना चाहिए जब वे अपने बाहुबल, या धनबल, या अपने दलबल की ताकत से लैस रहते हैं। जब वे अपने घर के सामने पटाखे फोड़ते हैं, या अपने साथियों के साथ सुबह की सैर पर चलते हैं, अपने दोस्तों के साथ सडक़ के बीच गाडिय़ां रोककर गप्पे मारते हैं। हिंदुस्तानियों को सुबह की सैर पर भी देखें तो अगर तीन लोग भी रहेंगे, तो सडक़ की पूरी चौड़ाई को घेरकर इस बदतमीजी से, और इस हमलावर अंदाज में चलते हैं कि कोई दूसरे लोग सडक़ पर आ जाना सकें। इसी तरह जब वे किसी बारात का हिस्सा रहते हैं उस वक्त वे सडक़ को अपनी मिल्कियत मानते हुए वहां जैसे हिंसक अंदाज में लाउडस्पीकर बजाते हुए, ट्रैफिक को रोक करते हुए नाचते हैं, उससे यह समझ में आता है कि वे एक भीड़ के दिमाग का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो कि वे अकेले नहीं कर सकते थे। यह सिलसिला हिंदुस्तानियों को पूरी तरह से असभ्य और हिंसक बनाते चल रहा है। इस देश में अदालतों ने कोशिश कर ली कि दिवाली पर एक सीमा से अधिक पटाखे ना चलें, लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट का मुंह चिढ़ाते हुए लोगों ने इतने पटाखे फोड़े कि वहां की पूरी हवा जहरीली हो गई। दिक्कत यह है कि जहर फैलाने को लोगों ने अपना धार्मिक अधिकार मान लिया है। और बाकी लोग इस बात में जुट गए हैं कि धर्म का यह अधिकार कहीं भी कमजोर ना पड़े। आम बोलचाल की जुबान में एक बात कही जाती है कि ऐसे लोगों का भगवान ही मालिक है। तो ऐसे लोगों को मालिक का जल्द अपने पास बुला ले ताकि बाकी लोग एक खुली और साफ हवा में सांस ले सकें।
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