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अखिल भारतीय काव्य वेबिनार में राजेंद्र ओझा ने किया छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व
24-Nov-2021 2:42 PM (217)
अखिल भारतीय काव्य वेबिनार में राजेंद्र ओझा ने किया छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व
रायपुर, 24 नवंबर। चरामेती फाउंडेशन के अध्यक्ष राजेन्द्र ओझा ने बताया कि सोमालोब साहित्यिक मंच मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र के संयुक्त तत्वावधान में अखिल भारतीय स्तर के काव्य वेबिनार का आयोजन किया गया। छत्तीसगढ़ राज्य का प्रतिनिधित्व रायपुर के राजेन्द्र ओझा ने किया। में जहां मानवीय मूल्यों पर कविताएं पढ़ी गई वहीं प्रेम, प्रकृति, वर्तमान परिवेश भी कविता के विषय बने।
 
जाते हुए स्कूल 
और स्कूल से आते 
वह इसे कांधे पर ढो लेता है
बोरी की तरह,  
सलीके से लटकाता नहीं है
बस्ते की तरह।
 
बस्ता उसके लिए 
पढ़ने से ज्यादा
दोपहर के भोजन 
का जुगाड़ है।
-राजेन्द्र ओझा, छत्तीसगढ़
 
यह जग प्रीत की रीत न जाने
कपट कहीं,  छल पग - पग छाले
प्रेम का कमल जो है खिलाना
धीर पगों से आगे बढऩा।
-हर्षा मूलचंदानी, भोपाल, मध्य प्रदेश
 
उगा चुका है जो पत्थर पर
अपने श्रम से सुन्दर फूल
जिसको चढना गिरि शिखर पर 
उसके पथ पर होते शूल
उस पथ का शूल करे क्या
जिसने दृढ संकल्प लिया।
-यतीश चन्द्र मिश्र, नासिक
 
हैं ज्ञान के अक्षर जिन्हें कण कोयले के लग रहे
उनके आगे ज्ञान की सरिता बहाऊं किस तरह 
यंत्र का निर्माण करके, मंत्र का उच्चार करके
तंत्र विकसित कर रहा यह बताऊं किस तरह। 
-रामकृष्ण सहस्त्रबुद्धे, नागपुर
 
मैं तुम्हारे प्रीत में कविता लिखूंगी डूबकर
गीत, गजलों की यहां नदिया बहा दूंगी सनम।
-मृदुल तिवारी महक, मुम्बई
 
देश की व्यथा कथा जो आज कहने लगूं तो
दिल पर आपके भी छाले पड जाएंगे। 
काले कारनामों की यथार्थता दिखाने वाले
आईने भी मित्रवर काले पड जाएंगे।
शील सद्भाव का गला जो घुटता रहा तो
शांति हेतु बुद्ध को भी लाले पड जाएंगे।
-डॉ. प्रमोद कुमार समीर भृगुवंशी, वाराणसी
 
हिम शिखरों से आज उतरकर
निर्झर बनकर झरना होगा
इस पनघट पर प्यास खड़ी है
थोड़ी देर ठहरना होगा।
-शिव मोहन सिंह, देहरादून
 
शैलेन्द्र जय-प्रयागराज, प्रदीप देवीशरण भट्ट-हैदराबाद, अरुण अपेक्षित-इन्दौर, हेमलता मिश्र मानवी-नागपुर, अंजनी सिंह सौरभ- सीधी आदि ने भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। मुख्य अतिथि देहरादून के डॉ. शिव मोहन सिंह, अध्यक्षता पुणे के डॉ. मुकुन्द नीलकंठ जोशी ने की। संचालन संजय द्विवेदी, मुम्बई एवं आभार चन्द्रिका प्रसाद मिश्र, नासिक के द्वारा व्यक्त किया गया।

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