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Jyotiba Phule Death Anniversary: समाज सुधार से महिला शिक्षा तक के लिए संघर्ष
28-Nov-2021 8:30 AM (72)
Jyotiba Phule Death Anniversary: समाज सुधार से महिला शिक्षा तक के लिए संघर्ष

भारत में जातपात और सामाजिक असमानता के खिलाफ जिन लोगों ने संघर्ष किया है उनमें महात्मा ज्योतिबा फूले का नाम सबसे आगे हैं. एक सामाजिक कार्यकर्ता, विचारक, समाज सेवक और लेखक के रूप में मशहूर ज्योतिबा फूले देश में, विशेषकर महाराष्ट्र में छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों को मिटाने और वंचित तबके को मजबूती प्रदान करने का काम किया था. अपने इस काम के लिए ज्योतिबा ने समाज के सभी तबकों को अपने साथ लेने में भी सफलता पाई और व्यापक तौर पर एक बदलाव लाने में सफल रहे. आज 28 नवंबर को ज्योतिबा फूले की पुण्यतिथि है.

निचले तबके के उत्थान के लिए संघर्ष
ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे में माली जाति के परिवार में हुआ था. उनका परिवार मूलतः सितारा का था जो पुणे में आकर माली का काम करता था. उन्होंने समाज के निचले तबके को सशक्त बनाने की लड़ाई लड़ी. इसके लिए उनको स्थापित नियमों और परंपराओं के खिलाफ लड़ना पड़ा. उन्हें महिला शिक्षा के लिए  ब्रिटिश शासन से भी टकराने पड़ा.

महिलाओं की शिक्षा
ज्योतिबा फूले केवल समाज में जातिवाद को खत्म करने के लिए ही नहीं जाने जाते हैं. महिलाओं की स्थिति को सुधारने 1854 में एक स्‍कूल खोला जिससे वे शिक्षित होकर अपनी पहचान खुद बना सकें.. लड़कियों के लिए खोला गया यह देश का पहला स्‍कूल था. इस स्कूल में पढ़ाने के लिए जब उन्हें कोई महिला अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री को पढ़ाया और दूसरों को शिक्षा देने योग्य बनाया.

एक गहन संघर्ष
ज्योतिबा को अपने कार्यों के लिए कम संघर्ष नहीं करना पड़ा. महिलाओं के उत्थान में किए गए कामों में कुछ लोगों ने उनके पिता पर दबाव बनाकर पत्‍नी समेत उन्‍हें घर से बाहर निकलवा दिया. इन सबके बावजूद ज्‍योतिबा ने हौसला नहीं खोया और उन्‍होंने लड़कियों के तीन-तीन स्‍कूल खोल दिए.

महात्मा की उपाधि भी
ज्योतिबा ने दलितों और शोषित वर्ग को न्याय दिलाने के लिए 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की. उनकी समाजसेवा देखकर साल 1888  में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें महात्मा की उपाधि दी गई. ज्योतिराव ने ही दलित शब्द का पहली बार प्रयोग किया था.

विवाह कार्यक्रम ने दी प्रेरणा
बताया जाता है कि उनमें एक बड़ा बदलाव तब देखने को मिला जब वे अपने दोस्त के विवाह संस्कार में शामिल हुए थे. लेकिन उन्हें दोस्त के माता पिता ने ही शूद्र जाति का  होने के कारण  इस समारोह से दूर रहने को कहा और उनका तिरस्कार किया. इससे उन्हें जाति व्यवस्था के अन्याय के खिलाफ काम करने की प्रेरणा मिली. उन्होंने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार करने की प्रथा शुरू की और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली.

शिशु हत्याओं के खिलाफ
वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे. उन्होंने 1863 में उच्च वर्ग गर्भवती विधवाओं के लिए एक घर शुरू किया जहां वे अपने बच्चों को सुरक्षित रूप से जन्म दे सकें. उन्होंने भ्रूण हत्या और शिशु हत्या को रोकने के लिए एक अभियान चलाया और अनाथालय भी खोला था.

एक लेखक के रूप में ज्योतिबा ने कई पुस्तकें भी लिखीं थीं  इनमें तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा, ब्राह्मणों का चातुर्य, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत प्रमुख थीं. उन्होंने जाति व्यवस्था के साथ मूर्तिपूजा का भी विरोध कर सरल धार्मिक विचारों और स्वस्थ परंपराओं का समर्थन किया और पुजारियों की जरूरत को भी खारिज किया. (news18.com)

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