संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : ताकत हिंसक बनाये, इंसान ही बनाये रखे...
29-Nov-2021 5:37 PM (120)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  ताकत हिंसक बनाये, इंसान ही बनाये रखे...

जो लोग हिंदुस्तान में नेताओं को देख-देखकर थक गए हैं उन लोगों के लिए एक अलग किस्म की खबर है. जब अपने यहां इतना अच्छा कुछ न होता हो तो कम से कम दूसरी किसी जगह की किसी बात को देखकर खुश हो जाना चाहिए। न्यूजीलैंड की एक सांसद जूली एन जेंटर ने अभी फेसबुक पर अपनी खुद की, 27 नवम्बर की, एक दिलचस्प कहानी लिखी है। उन्होंने लिखा है कि आज सुबह 3:00 बजे हमारे परिवार में एक नए सदस्य का आना हुआ। रात 2:00 बजे मुझे दर्द उठने लगा था तो मैं साइकिल से ही अस्पताल गई, और 10 मिनट में वहां पहुंच गई, और जल्द ही एक बिटिया को जन्म दिया। इस सांसद ने अपने फेसबुक पेज पर सबसे पहली लाइन यही लिखी है कि वह ग्रीन सांसद है और अपनी साइकिल से मोहब्बत करती है। आज ही की एक दूसरी खबर सोशल मीडिया पर ही जर्मनी की भूतपूर्व चांसलर एंजेला मर्केल को लेकर है जो एक फ्लैट में पूरे कार्यकाल तक रहती थीं, और अभी भी वहीं रह रही हैं. खुद बाजार जाकर अपना सामान खरीदती थीं, और जब एक फोटोग्राफर ने उनसे कहा कि 10 बरस पहले भी उसने इन्हीं कपड़ों में उनकी फोटो खींची थी, तो उन्होंने कहा कि मैं जनसेवक हूं, कोई मॉडल नहीं हूं जिसे बार-बार कपड़े बदलने पड़ते हैं। यूरोप के बहुत से देशों में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति, या मंत्री और सांसद, साइकिलों पर दिखते हैं, बड़े-बड़े प्रोफेसर, नोबेल पुरस्कार विजेता भी साइकिल चलाते दिखते हैं। भारत के ही बगल में भूटान के एक से अधिक प्रधानमंत्री, भूतपूर्व प्रधानमंत्री साइकिल चलाते दिखते हैं। लेकिन हिंदुस्तान ऐसा है कि जहां किसी छोटे से राज्य का कोई बहुत छोटा सा मंत्री भी निकले तो पांच-दस गाडिय़ों का काफिला साथ चलता है। हिंदुस्तान में सत्ता की मेहरबानी से जो शान-शौकत चलती है, वह हिंसक किस्म की हो गई है क्योंकि वह देश की गरीबी की रेखा के नीचे की एक बड़ी आबादी के हक के पैसों को लूटकर उसका बेजा इस्तेमाल करके की गई शान-शौकत रहती है। सरकारी खर्च पर चलने वाले छत्तीसगढ़ के एक बंगले में पिछली भाजपा सरकार के वक्त लोगों ने 58 एसी गिने थे, पता नहीं उसके बाद के वर्षों में उनकी गिनती और बढ़ी थी या नहीं। लेकिन जनता के पैसों पर जब नेता फिजूलखर्ची करते हैं, तो उर्दू की एक लाइन याद आती है, माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम।

दुनिया के जिन देशों में न्यूजीलैंड की इस महिला सांसद की तरह सादगी से जीने वाले लोग रहते हैं, उन्हें देखकर लगता है कि सभ्यता को दिखावे की शान-शौकत की कोई जरूरत नहीं रहती, और लोग ताकत के बावजूद सचमुच ही सादगी से रह सकते हैं, आम जनता की तरह रह सकते हैं। दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्र प्रमुखों में से एक जर्मनी की चांसलर लंबे समय तक रहने वाली एंजेला मर्केल जिस सादगी से पूरी जिंदगी रहीं और आज भी रह रही हैं, वह एक मिसाल है कि देश का ताकतवर और संपन्न होना, खुद नेता का बहुत ताकतवर होना, उसका स्थाई होना, और उसकी निरंतरता होना, इनमें से किसी भी बात को लेकर दिखावे की शान-शौकत की जरूरत नहीं रहती। और हम यह भी नहीं कहते कि हिंदुस्तान में ऐसे लोग बिल्कुल भी नहीं है। लाल बहादुर शास्त्री की जिंदगी इसी किस्म की सादगी की थी, आज भी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिंदगी ऐसी ही सादगी की है। त्रिपुरा के मार्क्सवादी मुख्यमंत्री रहे माणिक सरकार इसी किस्म की सादगी वाले रहे, और कम्युनिस्टों में ऐसे बहुत नेता हुए जिन्होंने अपने पूरे परिवार को भी सादगी से रखा। लेकिन हिंदुस्तान में आज जिस तरह सरकारी खर्च पर सत्तारूढ़ नेता, और विपक्ष के भी दर्जा प्राप्त नेता, जिस शान-शौकत का मजा लेते हैं वह पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, गांधीवाद के खिलाफ है, और गरीब जनता के साथ बेइंसाफी भी है।

अब अगर दुनिया के एक संपन्न देश न्यूजीलैंड की एक महिला सांसद अपने बच्चे को जन्म देने के लिए अस्पताल जाते हुए जन्म के घंटे भर पहले भी साइकिल चला कर जा रही है, तो यह बात एक आईने की तरह दुनिया भर के देशों के उन नेताओं को दिखाने लायक है जो कि बड़े-बड़े काफि़लों में चलते हैं, बड़े ऐशो-आराम से जीते हैं और जिनका पूरा बोझ उनकी जनता उठाती है। हिंदुस्तान को देखें तो लगता है कि गांधी को राष्ट्रपिता बनाकर चबूतरे पर बैठाया, या खड़ी की गई मूर्ति के भीतर गांधी को कैद करके उससे छुटकारा पा लिया गया है। किसी धातु की या पत्थर सीमेंट की मूर्ति में गांधी की आत्मा को कैद कर दिया और उसके बाद उसकी किफायत का भी मानो पिंडदान कर दिया क्या हिंदुस्तान में सत्ता को सादगी सिखाने का कोई काम हो सकता है? बीते दशकों में कई ऐसे सत्तारूढ़ नेता आए और गए जो एक-एक दिन में आधा दर्जन अलग-अलग कपड़ों में सार्वजनिक जगहों पर दिखते हैं। क्या ऐसे नेताओं को जर्मनी की एंजेला मर्केल से कुछ सीखना चाहिए?

जिस दिन हिंदुस्तान पर सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ था और शिवराज पाटिल केंद्रीय गृह मंत्री की हैसियत से दिल्ली से मुंबई गए थे, उस दिन सार्वजनिक जगहों पर उनकी खींची गई तस्वीरों को जब साथ रखकर देखा गया था तो यह साफ-साफ दिखा कि उन्होंने आधा दर्जन से अधिक बार अपने कपड़े बदले थे और ये कपड़े हमले में किसी खून के दाग लग जाने पर बदले गए हों ऐसा भी नहीं था, ये कपड़े अलग-अलग सार्वजनिक कार्यक्रमों में अलग-अलग पहने गए थे। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अनगिनत रंगों के, अनगिनत किस्मों के कपडे पहनने के लिए जाने जाते हैं. उनका एक सूट तो बहुत ख़बरों में रहा किसकी धारियों में उनका नाम गूंथकर वह कपड़ा ही अलग से बनाया  था, और कहा गया था कि वह दस लाख रुपियों का कपडा था। यह किस किस्म का दिखावा है, और किस कीमत पर दिखावा है? क्या यह गरीबी की रेखा के नीचे की देश की एक बहुत बड़ी आबादी की खिल्ली उड़ाने तरीका नहीं है? जब हिंदुस्तान के मुकाबले प्रति व्यक्ति आय के मामले में दर्जनों गुना आगे चलने वाले देशों के सांसद, प्रधानमंत्री, और राष्ट्रपति सादगी के साथ साइकिलों पर चलते हैं तो हिंदुस्तान में राशन की मदद पाने वाली जनता के हक छीनकर नेता अंधाधुंध खर्च करते हैं। हिंदुस्तान के लोगों को अपने नेताओं के ऐसे मिजाज के बारे में जरूर सोचना चाहिए। हिंदुस्तानी वोटरों को भी चाहिए कि न्यूजीलैण्ड की इस सांसद की सादगी की कहानी अपने नेताओं को भेजें।
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