विचार / लेख

पशु अधिकारों पर अदालती फैसला और इंसानी दायित्व

Posted Date : 10-Jul-2018



शिवप्रसाद जोशी
समस्त जंतु जगत का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा है कि इसके दायरे में जल और वायु के जीव भी शामिल होंगे। कोर्ट का ये फैसला अनूठा और अभूतपूर्व है और विस्मयकारी भी। पशु अधिकारों के लिये काम करनेवाली संस्थाएं इससे खुश हैं कि इससे लोगों में जानवरों के प्रति संवेदनशीलता और जागरूकता आएगी तो वहीं सवाल उठ रहे हैं कि इसे लागू कैसे किया जा सकेगा। फैसले और फैसले की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पता चलता है कि हाईकोर्ट ने जानवरों के प्रति संवेदनहीनता की निंदा ही नहीं की है बल्कि प्रशासनिक और चिकित्सकीय लापरवाहियों के प्रति सावधान रहने और मौजूदा कानूनों को कड़ाई से लागू करने की हिदायत भी है। संविधान में निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों और मौलिक कर्तव्यों के प्रावधानों को देखते हुए ये फैसला उचित ही लगता है। लेकिन ये उत्तराखंड की सर्वोच्च अदालत से ही क्यों और कैसे आया?
नैनीताल हाईकोर्ट की जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने उत्तराखंड निवासी नारायण दत्त भट्ट की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये फैसला दिया है। इस याचिका में उत्तराखंड से जुड़ी नेपाल सीमा पर होने वाली घोड़ागाडिय़ों या तांगा की आवाजाही पर रोक लगाने को कहा गया था। उत्तराखंड के चंपावत जिले की सीमा नेपाल से जुड़ती है और वहां से इस आवाजाही की बात याचिका में की गई थी। याचिकाकर्ता ने अनिवार्य रूप से मांग की थी कि घोड़ों का टीकाकरण होना चाहिए और भारतीय क्षेत्र में घुसने से पहले संक्रमण या किसी बीमारी की आशंका के लिहाज से एहतियातन उनकी जांच की जानी चाहिए।
हालांकि इस याचिका की परिधि में सभी जानवरों की सुरक्षा और कल्याण की बात भी स्वत: ही निहित थी। क्योंकि इसमें जंतु कल्याण से जुड़े कानूनों का उल्लेख भी किया गया था। और उन पर अमल की शोचनीय स्थिति का भी। मिसाल के लिए प्रिवेंशन ऑफ क्रूएल्टी टू एनीमल्स (पीसीए) एक्ट का जिक्र याचिका में था। प्राचीन आख्यानों और उपनिषदों आदि के हवाले से समस्त प्राणिजगत की बराबरी का उल्लेख भी था। इसमें बताया गया था कि जानवर के जीने का अधिकार सिर्फ मनुष्य का उसके दोहन करने देने तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसे भी मनुष्य की तरह गरिमा और सम्मान से जीने का हक है और उसके जीवन को सीमित, प्रतिबंधित या अपनी मर्जी से हांका नहीं जा सकता है।
कोर्ट ने उत्तराखंड के प्रशासन और नागरिकों को पशुओं के अधिकारों की रक्षा करने और इस संबंध में जुड़े कानूनों पर अमल करने के लिए जिम्मेदार बनाया है। अदालत ने कहा है कि भारतीय सीमा में दाखिल होने से पहले जानवरों का मेडिकल चेकअप कराना होगा। आवाजाही के नियमों के तहत लाइसेंस आदि जारी करने होंगे। जीबी पंत कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति की निगरानी में विशेषज्ञों और जानवरों के डॉक्टरों की एक कमेटी बनाई जाएगी जो इस बात का अध्ययन करेगी कि आखिर जानवर कितना अधिकतम वजन ढो सकते हैं। और मौजूदा नियम क्या उचित हैं। कमेटी को 12 हफ्तों में अपनी रिपोर्ट विश्वविद्यालय के कुलपति को देनी होगी जो इसे उत्तराखंड के मुख्य सचिव को भेजेंगे।
हाईकोर्ट ने जानवरों को डंडे या किसी वस्तु से मारने, छेडऩे, कोंचने या तंग करने पर प्रतिबंध लगा दिया है ताकि उन्हें कोई घाव, सूजन या किसी भी तरह का शारीरिक नुकसान न हो। सभी शहरी निकायों के लिए ये अनिवार्य होगा कि पशुगाडिय़ों के मालिकों से उन वाहनों के वजन का प्रमाण पत्र लें जिनमें उन पशुओं को जोता जाएगा।
 सभी बैलगाड़ी, तांगा और ऊंटगाड़ी में आगे-पीछे रात में चमकने वाली पट्टी लगानी होगी और रात में पशुओं के शरीर पर भी ताकि रात में किसी संभावित खतरे से बचे रहें। पशुवाहनों के चलने के समय और उनमें अधिकतम सवारी, विश्राम और चिकित्सीय जांचों और सावधानियों के संबंध में भी विस्तृत निर्देश जारी किए हैं। आदेश में प्रिवेंशन ऑफ क्रूएल्टी टू एनिमल एक्ट और प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ इंफेक्शियस डिजीज एक्ट को भी कड़ाई से लागू करने के आदेश दिए हैं। साथ ही सरकार से कहा है कि सभी जिलों में ऐसी सोसायटी बनाई जाएं जो इनके अनुपालन को सुनिश्चित करे।    
ध्यान देने की बात ये है कि पिछले वर्ष मार्च में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इसी तरह का फैसला गंगा-यमुना और उसकी सहयोगी नदियों के बारे में दिया था कि उन्हें भी नागरिकों की तरह अधिकार प्राप्त हैं लेकिन तीन महीने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। पशुप्रेमियों और समाज को ये सुनिश्चित करना होगा कि जानवरों के संबंध में आए इस फैसले की भी वही गति न हो और सबसे बुनियादी बात ये है कि जानवरों के अधिकारों के प्रति सम्मान और संवेदना का पर्यावरण विकसित हो सके। (डॉयचे वैले) 




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