विशेष रिपोर्ट

संवेदनशील क्षेत्र और शोध के खतरे

Posted Date : 10-Jul-2018




एक था जगरगुण्डा

बस्तर में जन्मे, पले, बढ़े  राजीव रंजन प्रसाद का बस्तर के इतिहास, साहित्य, संस्कृति और पुरावैभव पर निरंतर लेखन जारी है। इसी क्रम में नक्सलियों की उपराजधानी कहे जाने वाले जगरगुंडा के ताजा हालात पर उनके आलेख हम प्रकाशित कर रहे हैं।


अनेक प्रयत्नों के पश्चात मैं जगरगुण्डापहुँच सका था। सलवाजुडुम के दौर और पिछले लगभग बारह वर्षों में शेष दुनियाँ से अलग-थलग,टापू बन चुके जगरगुण्डा से बहुत सी अद्भुत और अनकही कहानियों-जानकारियों को एकत्रित करने के लोभ में शाम हो गयी। दक्षिण बस्तर के अतिसम्वेदनशील क्षेत्रों में कार्य करने का अपना जोखिम है। ग्रामीणों के अतिरिक्त जगरगुण्डा के पुलिस अधिकारियों ने भी उजाला रहते क्षेत्र से बाहर निकल जाने के लिये हमें आगाह किया था। अधिक से अधिक जानने-समझने की उत्कंठा के कारण शाम गहरी होने लगी। लौटते हुए जब तक हम चिंतलनार पहुँचे अंधेरा गहरा हो गया था। पूरे रास्ते किसी वाहन की आमद तो दूर की बात है, कोई व्यक्ति भी दिखाई नहीं पड़ा। यहाँ से थोड़ा आगे बढ़ते ही हमारी गाड़ी का टायर पंचर हो गया। भयावह सूनसान में जहाँ इस समय कोई भी आवागमन असम्भव था, अंधकार में गाड़ी को रोकना दुस्साहस था। यह पूरा क्षेत्र नक्सल गतिविधियों के लिये कुख्यात है तथा निकटस्थ क्षेत्रों ताडमेटला, चिंतलनार, चिंतागुफा आदि में अनेक भयावह घटनायें नक्सलियों ने पिछले कुछ वर्षों में अंजाम दी हैं। ड्राईवर ने पंचर का निरीक्षण करने के पश्चात झुंझलाहट में कहा कि जिस टायर के पंचर होने की संभावना थी वह तो सही सलामत है जबकि नया टायर जमीन से लग गया है। मोबाईल की रोशनी में स्टेप्नी गाड़ी पर चढ़ाने के पश्चात हम ब-मुश्किल पाँच सौ मीटर आगे गये होंगे कि उसकी आशंका सही सिद्ध हुई और दूसरा टायर भी पंचर हो गया। अब हम वास्तविक परेशानी में थे। 
घटाटोप अंधकार तथा आवागमन रहित सड़क में कोई मदद मिलने की संभावना नहीं थी। वातावरण का अपना मनोवैज्ञानिक दबाव अलग था जिस कारण पूरी रात वहीं गाड़ी के भीतर गुजारने की कल्पना डरावनी थी। किसी तरह की आहट अथवा सीटियों की आवाजों से अनेक काल्पनिक आशंकायें प्रबल हो रही थीं। हमारे पास सीआरपीएफ की मदद प्राप्त करने का विकल्प था लेकिन अंदाजन उस क्षेत्र से कांकेर लंकाकैम्प लगभग ढाई किलोमीटर की दूरी पर होना चाहिये था। मरता क्या न करता वाली स्थिति थी,अंतत: हमने निश्चय किया कि पंचर अवस्था में ही गाड़ी को ढाई किलोमीटर चला कर सुरक्षित स्थान तक पहुँचा जाये। सड़क निर्माणाधीन होने के कारण अत्यधिक खस्ताहाल थी। सामान्य परिस्थिति में कोई भी वाहनचालक पंचरगाडी को आगे ले जाने का दुस्साहस नहीं करता किंतु नक्सलगढ़ की उपराजधानी में इस तरह फँसे हुए हम विकल्पहीन थे।  हम धीरे-धीरे चलते हुए कांकेर लंका पहुँचने में सफल हुए। अब तक पंचर टायर चिथड़ों में बदल गया था। 
कैम्प में अपना परिचय देने और वांछित पूछताछ के बाद हमें मदद मिली। मैं अपने पाठकों और वास्तविक शोधार्थियों के उस मिथक को तोडऩा चाहता हूँ कि जंगल में बैठी हमारी फोर्स दुव्र्यवहार करती है अथवा उनका रवैया गैर-दोस्ताना रहता है। युद्धरत क्षेत्र में आपको समुचित पहचान पत्र लेकर चलना चाहिये, इतना ही नहीं पूछताछ से परेशान होने की बजाय थोड़ा धैर्य रखना ही उचित है। हमें एयरपोर्ट पर इससे अधिक कड़ी जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है तब परेशानी नहीं होती फिर ऐसे जटिल क्षेत्रों में सुरक्षाकर्मियों से पूछताछ के दौरान हमारा अहं क्यों सामने आने लगता है? मुझे प्रसन्नता है कि समुचित स्वागत प्राप्त हुआ, चाय-नाश्ते की व्यवस्था की गयी। अधिकारियों ने बताया कि इस समय कैम्प से किसी वाहन को ले जाने की अनुमति असम्भव है,साथ ही आस-पास सड़क बनाने में लगी किसी गाड़ी को ले कर आगे जाना भी ठीक नहीं था। कैम्प में जवानों के आतिथ्य में हम सुरक्षित थे और विपरीत परिस्थिति में यहाँ रात काटी जा सकती थी। सौभाग्य से वहाँ टेलीफोन नेटवर्क उपलब्ध था। फोन कर स्थिति बताने के पश्चात दोरनापाल से पत्रकार मित्रों ने वैकल्पिक टायरों की व्यवस्था की और उसे कैम्प तक पहुँचाया। आखिरकार लगभग रात्रि के साढ़े नौ बजे हम आगे बढऩे में सफल हो सके। जवानों की इस सहायता के लिये धन्यवाद एक छोटा शब्द था, धन्यवाद ज्ञापित करते हुए मैंने अपनी पुस्तक 'दंतक्षेत्र' कमाडिंग अधिकारी को भेंट की। कभी-कभी सोचता हूँ कि शोध से जुड़े ऐसे अनुभव ही गहरे संस्मरण बन जाते हैं। अब मेरा अगला लक्ष्य पुन: जगरगुण्डा था लेकिन अब रास्ता नकुलनार-अरनपुर हो कर....। 




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