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'रात आ कर गुज़र भी जाती है...' पढ़ें, इब्न-ए-इंशा के क्लासिक शेर
30-Dec-2021 2:08 PM
'रात आ कर गुज़र भी जाती है...' पढ़ें, इब्न-ए-इंशा के क्लासिक शेर

 

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिराकुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा

बे तेरे क्या वहशत हम को तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँतू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है

हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगेतू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा

हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देताहर किसी की नज़र नहीं होती

रात आ कर गुज़र भी जाती हैइक हमारी सहर नहीं होती

इक साल गया इक साल नया है आने कोपर वक़्त का अब भी होश नहीं दीवाने को

(news18.com)

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