विशेष रिपोर्ट

राज्य बनने के बाद से 7142 नाबालिग लापता, 96 फीसदी से ज्यादा घर लौटे, सुप्रीम कोर्ट के आर्डर पर अपहरण दर्ज करने मजबूर पुलिस

Posted Date : 01-Aug-2018



-मृत्युंजय मिश्रा
रायपुर, 1 अगस्त (छत्तीसगढ़)। प्रदेश में नाबालिगों के लापता होने की शिकायतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। लेकिन जब से सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों के गुम होने की शिकायतों को अपहरण की शिकायत के बतौर दर्ज करने का आदेश दिया तब से ऐसी शिकायतों की बाढ़ ही आ गई। अकेले रायपुर जिले में राज्य बनने के बाद 7 हजार से अधिक नाबालिगों के शिकायत दर्ज की गई। इसमें से करीब पौने सात हजार वापस आ गए। यानी 96 फीसदी से ज्यादा नाबालिग वापस आ गए। पुलिस अफसरों के मुताबिक ज्यादातर नाबालिग प्रेम-प्रसंग के चलते गुम हुए थे। यह भी बताया गया कि लापता नाबालिग भी हो सकते हैं जिनके वापस आने की सूचना पुलिस को नहीं दी गई हो। 
छत्तीसगढ़ राज्य के अस्तित्व में आने के बाद 1 नवंबर 2000 से 30 जून 2018 तक 2855 नाबालिग लड़कों के अपहरण की शिकायत दर्ज की गई, इसी दौरान 4287 लड़कियों के अपहरण के मामले दर्ज हुए। इनमें से 2732 लड़के और 4135 लड़कियां वापस आ गए। 18 सालों में नाबालिगों के अपहरण के 7 हजार 142 की शिकायतें दर्ज की गई और 6 हजार 867 नाबालिगों के वापस आने की जानकारी उपलब्ध कराई गई है। इन गुम/अपहरण की शिकायतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन की मजबूरी के चलते एक ओर जहां पुलिस के पास अपहरण के नाम से दर्ज किए जाने वाले मामलों की संख्या बढ़ रही है वहीं दूसरी ओर यह राजनीतिक मुद्दा भी बना लिया जाता है। वरिष्ठ पुलिस अफसरों की माने तो नाबालिगों के अपहरण के मामले न केवल शासन के संसाधनों की बरबादी है बल्कि  पुलिस के समय और उर्जा की भी बरबादी है। ऐसे ज्यादातर मामलों में 12 साल से उपर की लड़के लडकियां अपनी मर्जी से किसी रिश्तेदार, दोस्त या परिचितों के यहां चले गए होते हैं जो वहीं से वापस मिल जाते हैं। इनके वापस आने पर पुलिस को तीन बार बयान करना कराना पड़ता है। पहले पुलिस खुद बयान लेती है फिर चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सामने बयान होता है। यहां भी जज के स्तर का अफसर होता है। इसके बाद कोर्ट में बयान कराया जाता है। कोर्ट में बयान के लिए पुलिस को समय लेना होता है और इंतजार करना पड़ता है। यह सब करने का एक ही मकसद है कि कथित अपहरण के दौरान नाबालिग के साथ कोई गलत व्यवहार तो नहीं किया गया। 
पुलिस के अफसरों के मुताबिक फिल्मों और सोशल मीडिया के प्रभाव के चलते 12 साल के उपर के बच्चे सब कुछ जानने समझने की स्थिति में होते हैं जिसके चलते उन्हें कोई बहला फुसला कर कोई कहीं ले जाए ऐसा बहुत कम होता है।चार दिन पहले की बात है टिकरापारा थाने में दो लड़कियों के एक ही समय पर गायब होने की अलग-अलग रिपोर्ट लिखाई जाती है। दूसरे दिन ही पुलिस को कथित अपहरण की गई लड़कियों को पुलिस खोज लेती है।जानकारी मिल जाती है कि दोनों सहेलियां थी जो अपनी मर्जी से किसी रिश्तेदार के घर पर चली गई थी। दो दिन पहले एक नाबालिग के गुम होने की शिकायत कोतवाली थाने में दर्ज कराई गई उसके बिलासपुर में अपने रिश्तेदार के घर होने की जानकारी मिली।
किसी नाबालिग के गुम होने की शिकायत हर थाने एक जैसी लिखी जाती है। रिपोर्ट लिखवाने वाला चाहे कुछ भी वास्तविक बातें लिखवाना चाहे पुलिस लिखती है- अज्ञात व्यक्ति बहलाफुसला कर अपहरण कर लिया। एक तरफ यह भी लिखा जाता है कि गुम इंसान क्रमांक ......... के तहत धारा 363 वगैरह दूसरी तरफ यह लिखा होता है कि अपहरण कर लिया गया। गुम या कथित अपहरण के मामलों में पुलिस तुरंत ही रिपोर्ट लिख लेती है। नाबालिगों के मामले पुलिस रिस्क लेना पसंद नहीं करती लेकिन बड़ों के मामले में परिजनों को रिश्तेदारों या दोस्तों के घर पता करने की सलाह दी जाती है। 
ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या से विपक्षी नेताओं को बैठ बिठाए एक मुद्दा मिल जाता है कि इतने सौ या हजार महिलाएं राज्य से गायब हैं। उनका पुलिस पता नहीं लगा पाई। राजनीतिक दल गुम होने के आंकड़े दिखाते फिरते हैं । पुलिस के आला अफसरों का कहना है। महिलाओं या नाबालिगों के अपहरण या गायब होने को लेकर कई आरोप लगाए जाते हैं लेकिन पुलिस से नहीं पूछा जाता कि गायब या अपहरण की गई महिलाओं या नाबालिगों में कितनी वापस आईं क्या उनका बयान हुआ या कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई या नहीं। रायपुर एसएसपी अमरेश मिश्रा ने कहा कि गुम महिलाओं की संख्या को लेकर बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश जाती है। लेकिन पुलिस से कभी नहीं पूछा जाता है कि गायब महिलाओं में से कितनी महिलाएं वापस आईं। लोग गुम या अपहरण की शिकायत दर्ज करा देते हैं लेकिन उनके घर वापस आ जाने की सूचना भी पुलिस को नहीं देते। पुलिस नाबालिगों के मामलों तत्काल कार्रवाई करती है। शिकायत दर्ज करने से लेकर पतासाजी का काम बिना देर किए किया जाता है।
फिल्मों-इंटरनेट का प्रभाव
छत्तीसगढ़ से चर्चा में एसएसपी अमरेश मिश्रा ने कहा कि टीवी, फिल्मों और इंटरनेट के प्रभाव के चलते नाबालिग प्यार में पड़ जाते हैं जिसके चलते उन्हें घर पर माता-पिता और अन्य लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता है। 95 फीसदी मामलों में नाबालिगों के मामले में यही होता है। वे अपनी मर्जी से पूरी समझ से घर से जाते हैं और वापस आ भी जाते हैं लेकिन परिवार के लोगों की जल्दबाजी की वजह से पुलिस के पास एक नया मामला दर्ज हो जाता है। बाद में बयान लेने पर पता चलता है कि अपहरण जैसी कोई बात नहीं थी कोई अपने रिश्तेदार के यहां तो कोई अपने दोस्त/सहेली के यहां चला गया था। 
माता-पिता की काउंसिलिंग की जरूरत
हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता उपेन्द्रनाथ अवस्थी ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में बताया कि फिल्मों और इंटरनेट के प्रभाव के चलते नाबालिग प्यार में पड़ जाते हैं घर के लोगों के विरोध के चलते घर छोड़ कर जाने विचार करते हैं। शारीरिक परिवर्तन और उत्सुकता के चलते उन्हें घर के लोगों के खिलाफ कदम उठाना पड़ता है। ऐसे मामलों में बच्चों के माता-पिता को काउंसिलिंग की जरूरत है जिसे लेकर सरकार कुछ नहीं करती है। मां-बाप का असंतुलित व्यवहार भी कभी-कभी बच्चों को घर छोडऩे के लिए मजबूर करता है। नाबालिगों के गुम होने को अपहरण की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि कानून के मुताबिक नाबालिग की अपनी मर्जी का कोई महत्व नहीं होता। बड़ों को कोई कहीं ले जाए तो किडनेपिंग की श्रेणी का अपराध माना जाता है। अपहरण के लिए किडनैपिंग से ज्यादा सजा का प्रावधान है। कानून तो बहुत पुराने हैं लेकिन पहले मामले दर्ज नहीं होते थे। 
बताया गया कि नाबालिगों के गुम होने के मामलों में परिवार के लोग खुद किसी मुसीबत में न पड़ जाएं इस डर से जल्द से जल्द पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश करते हैं। पुलिस तो पहले ही कोर्ट के आर्डर का पालन करने के लिए तैयार रहती है जिससे लिखा पढ़ी शुरू करने में समय नहीं लगता। इसके साथ ही पुलिस के पास एक और मामला बढ़ जाता है। पुलिस के आला अफसरों का कहना है कि परिवारजन अपनी परेशानी पुलिस पर डालने की कोशिश करते हैं, जिसके चलते वे रिपोर्ट लिखा कर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं।
98 फीसदी के प्रेम प्रसंग के मामले
रायपुर के एडिशनल एसपी प्रफुल्ल ठाकुर के मुताबिक करीब 98 फीसदी मामले प्रेम प्रसंग के होते हैं। परिवार के लोग धर्म,जाति, समाज बराबरी जैसी बातों को लेकर नाबालिगों का विरोध करते हैं जिससे उन्हें बिना बताए घर छोडऩा पड़ता है। यही मामला बाद में पुलिस के लिए अपहरण का बन जाता है।
बताया गया कि अपहरण एक बड़ा अपराध है इसके लिए किडनैपिंग से ज्याद सजा का प्रावधान किया है। अपहरण के आंकड़ों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि खराब होती है। मानव अधिकार संगठनों में ऐसे आंकड़े किसी भी देश के लिए बहुत कमी और पिछड़ेपन की निशानी माने जाते हैं। इसलिए कानून की जानकारों के मुताबिक नाबालिगों के गुम होने को अपहरण की श्रेणी में रखने की बजाय एक नए कानून बनाए जाने की जरूरत है।

 




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