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सरकार बैंकों को आजाद करे, वरना हालात और बिगड़ेंगे -बीओबी चेयरमैन

Posted Date : 08-Aug-2018



नई दिल्ली, 8 अगस्त । बैंकों को सरकार अपने चंगुल से मुक्त करे, वरना प्राइवेट बैंक उनका सारा बिजनेस हड़प लेंगे...ये चेतावनी है बैंक ऑफ बड़ौदा के चेयरमैन रवि वेंकटेशन की। उनके मुताबिक, सरकारी बैंकों को मैनेजमेंट रखने की और स्ट्रैटेजी बनाने की आजादी नहीं दी गई, तो बैंकों का हाल और खराब हो जाएगा।
देश के तीसरे सबसे बड़े सरकारी बैंक के चेयरमैन रवि वेंकटेशन का कार्यकाल अगले महीने पूरा हो रहा है। उनके मुताबिक, सरकार ने अगर अपनी पकड़ ढीली नहीं की, तो धीरे-धीरे उनकी स्थिति और बिगड़ेगी।
वेंकटेंशन के मुताबिक, सरकार के चाहे बगैर ही बैंकिंग सेक्टर में निजीकरण हो रहा है। वो कहते हैं कि सरकारी बैंकों के लिए खतरे की घंटी बज गई है। मौजूदा वित्तीय साल में नए डिपॉजिट का 70 परसेंट प्राइवेट बैंकों में जा रहा है। साल 2020 तक यानी दो साल के अंदर लोन देने के मामले में भी प्राइवेट बैंकों की हिस्सेदारी 80 फीसदी तक पहुंच जाएगी।
घटिया लोन की वजह से सरकारी बैंकों की पूंजी खत्म हो रही है और उनके पास लोन देने लायक रकम ही नहीं बच रही है, 51 फीसदी सरकारी हिस्सेदारी की वजह से बैंक अतिरिक्त पूंजी के लिए सरकार पर भी निर्भर हैं।
वेंकटेशन और पीएस जयकुमार को बैंकों की सेहत ठीक करने के लिए प्राइवेट सेक्टर से लाया गया था। बैंक ऑफ बड़ौदा में आने से पहले वेंकटेशन माइक्रोसॉफ्ट इंडिया के चेयरमैन थे, जबकि पीएस जयकुमार सिटी ग्रुप इंक के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर।
वेंकटेशन के मुताबिक, उन्होंने और जयकुमार, दोनों ने कुछ बड़ा करने के लिए कम सैलरी पर सरकारी बैंकों में नौकरी ज्वाइन की थी। सरकारी बैंकों का खस्ता हाल- कुल एनपीए का 90 फीसदी, 21 में से 11 बैंक रिजर्व बैंक की निगरानी में, 13 लाख करोड़ के एनपीए, कुल बैंक फ्रॉड का 85फीसदी।
बैंक ऑफ बड़ौदा के चेयरमैन कहते हैं कि सरकारी बैंकों में सिस्टम ही कुछ ऐसा है कि वहां फ्रॉड और घोटाले की आशंका रहती है। अगर सुधारा नहीं गया। तो ये हालात और बिगड़ेंगे।
मोदी सरकार को वेंकटेशन की सलाह- बैंकों के बोर्ड को रिक्रूटमेंट का अधिकार मिले, स्ट्रैटेजी तय करने का हक मिले, बैंकों को सरकारी बंधनों से आजाद कर दीजिए, घटिया कर्ज से छुटकारे के लिए सख्त फैसले जरूरी, कमजोर बैंकों के साथ मर्जर करने से कोई फायदा नहीं होगा, भारत को कम लेकिन मजबूत सरकारी बैंकों की जरूरत, लेकिन सरकार में काम कैसे होता है, ये भी वेंकटेशन को मालूम है, इसलिए उनकी सलाह पर अमल होने की गुंजाइश के आसार नहीं है।(ब्लूमबर्ग क्विंट)




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