विचार / लेख

पीएम की कुर्सी पर ममता की नजर?

Posted Date : 10-Aug-2018



-प्रभाकर एम
क्या बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी की निगाहें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर हैं? हालांकि ममता कई बार कह चुकी हैं कि वो प्रधानमंत्री पद की रेस में नहीं हैं।
लेकिन भाजपा के खिलाफ विपक्षी राजनीतिक दलों का महगठजोड़ बनाने की दिशा में उनकी अतिरिक्त सक्रियता, कोलकाता और दिल्ली में तमाम गैर-भाजपाई नेताओं से मुलाकातें, कोलकाता में अगले साल जनवरी में विपक्षी दलों की महारैली के आयोजन, विभिन्न मुद्दों पर भाजपा की अगुवाई वाली सरकार के खिलाफ कमर कस कर मैदान में उतरने और बीती 21 जुलाई को कोलकाता में आयोजित शहीद रैली में भाषण ममता की मंशा शीशे की तरह साफ कर देते हैं।
केंद्र की यूपीए और एनडीए सरकार मे मंत्री रहीं ममता बहुत पहले से ही यह संकेत देती रही हैं कि वे महज बंगाल की राजनीति तक ही सिमटकर नहीं रहना चाहतीं। अब भाजपा विरोधी राजनीति की धुरी बनने की उनकी बैचैनी सामने आने लगी है।
ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस अब यहां 15 अगस्त तक भाजपा हटाओ देश बचाओ नारे के साथ अभियान चला रही है। बंगाल पर सात साल तक राज करने के बाद अब अगले साल होने वाले आम चुनावों से पहले उनकी महात्वाकांक्षा एक बार फिर जोर मारने लगी हैं।
वैसे, ममता ने बीते लोकसभा चुनावों में भी विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास किया था लेकिन उनको अपने अभियान में कामयाबी नहीं मिली थी।
इसलिए इस बार वह बहुत पहले से ही भाजपा के खिलाफ तमाम राजनीतिक दलों को साथ लेकर संघीय मोर्चा बनाने की जमीन तैयार करने में जुट गई हैं। तमाम क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर लाने के लिए तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने दुर्गा पूजा के बाद दो महीने का देशव्यापी दौरा करने की योजना बनाई है।
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने कोलकाता में बीते महीने अपनी शहीद रैली के दौरान ही विपक्षी नेताओं की महारैली का एलान किया था। उन्होंने बीते सप्ताह दिल्ली दौरे पर विपक्षी नेताओं से मुलाकात कर इसकी तैयारियां भी शुरू कर दी हैं।
ममता बनर्जी ने इस रैली में कहा था, अगले साल की शहीद रैली लोकसभा चुनावों में जीत की रैली होगी। तृणमूल कांग्रेस राज्य की सभी 42 लोकसभा सीटें जीतेंगी। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पिछली गलतियों से सबक लेकर ममता अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रही हैं।
यही वजह है कि वे बार-बार खुद के प्रधानमंत्री पद की रेस में नहीं होने की बात दोहरा रही हैं। राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चौधरी कहते हैं, बार-बार इंकार करने के बावजूद ममता की मंशा साफ है। नोटबंदी से लेकर असम के एनआरसी तक केंद्र के तमाम फैसलों के विरोध में अपनी सक्रियता से उन्होंने देश में अपनी एक अलग छवि बना ली है।
हाल के दिनों में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के। चंद्रशेखर राव और जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला यहां ममता से मुलाकात कर चुके हैं। इन दोनों नेताओं ने भाजपा के खिलाफ विपक्ष का संघीय मोर्चा बनाने की वकालत की और ममता के नेतृत्व पर भरोसा जताया।
लेकिन विपक्षी महागठजोड़ के नेतृत्व के सवाल पर उठने वाले मतभेद के स्वरों को ध्यान में रखते हुए अब्दुल्ला ने कहा कि इसका फैसला चुनावी नतीजों के बाद किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि विपक्षी एकता की कोशिशों को नाकाम करने के लिए ही नेतृत्व का सवाल उछाला जा रहा है।
अब्दुल्ला का कहना था, भारतीय जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता से बेदखल करने के लिए कांग्रेस को विपक्षी एकता की रीढ़ की हड्डी की भूमिका निभानी होगी और राहुल गांधी को इस अभियान को नेतृत्व करना होगा।
ममता बनर्जी कहती हैं, प्रधानमंत्री पद के चेहरे का एलान नहीं करना विपक्षी गठजोड़ के हित में बेहतर होगा। इस पद के लिए उम्मीदवार का चयन चुनाव के बाद किया जा सकता है। नेतृत्व के सवाल पर पेंच फंसते देख ममता ने कहा है कि भाजपा को केंद्र से बेदखल करने के लिए उनको कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने पर कोई आपत्ति नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषक चौधरी कहते हैं, ममता जानती हैं कि नेतृत्व के सवाल पर कांग्रेस से खींचतान से उनकी उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। इसलिए उन्होंने फिलहाल इस सवाल को टाल दिया है। बाद में अपनी छवि और स्वीकार्यता के आधार पर वे प्रस्तावित महागठजोड़ की कमान संभाल सकती हैं।
ममता भले प्रधानमंत्री पद की रेस में होने से इंकार करें, कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस नेता इस बात को छिपाने का कोई प्रयास नहीं करते।
शहरी विकास मंत्री फिरहाद हकीम कहते हैं, अगले साल ममता दीदी ही प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेंगी। बीते महीने हुई शहीद रैली में लगभग सभी नेताओं ने एक स्वर में यही बात दोहराई थी।
ममता ने रैली में कहा था, अगले आम चुनावों में भाजपा केंद्र की सत्ता से साफ हो जाएगी और इसकी राह बंगाल ही दिखाएगा। भाजपा को डेढ़ सौ सीटें भी नहीं मिलेंगी।
ममता भले राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास कर रही हो, बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी कहते हैं, ममता की निगाहें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर हैं। उनकी तमाम कवायद का एकमात्र मकसद प्रधानमंत्री बनना है।
चौधरी कहते हैं कि विपक्ष नेताओं को पल-पल रंग बदलने वाली ममता पर भरोसा नहीं करना चाहिए। उनका आरोप है कि ममता ने राज्य में कांग्रेस को लगभग खत्म कर दिया है। अब वे बंगाल में लोकसभा की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर प्रधानमंत्री पद के लिए अपना दावा मजबूत करना चाहती हैं। भाजपा ने भी ममता पर प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने का आरोप लगाया है।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री बनने का सपना देखना बंद कर देना चाहिए। उनको पहले राज्य में अपनी सरकार बचाने की फिक्र करनी चाहिए।
अब लाख टके का सवाल यह है कि क्या ममता को अपनी मुहिम में कामयाबी मिलेगी?
पॉलिटिकल साइंस के रिटायर्ड प्रोफेसर दिनेश गोस्वामी कहते हैं, अभी ये कहना मुश्किल है कि विपक्षी महागठजोड़ का स्वरूप कैसा होगा। आपसी मतभेदों को मिटा कर तमाम राजनीतिक दलों के एकजुट होने पर ममता के पक्ष में हवा बन सकती है। लेकिन अभी इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
छात्र राजनीति के जमाने से ही ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, ममता शुरू से ही जुझारू रही हैं। अपनी इसी प्रवृत्ति, निजी जीवन में सादगी और आम लोगों से संबंधों के तार आसानी से जोडऩे जैसी खूबियों की बदौलत ही उन्होंने कभी अजेय समझे जाने वाले वाम मोर्चा को लगभग साढ़े तीन दशक के बाद राज्य की सत्ता से बेदखल कर दिया।
तापस मुखर्जी कहते हैं कि बंगाल की राजनीति पर अपनी पकड़ बेहद मजबूत करने के बाद अब ममता के निशाने पर केंद्र की सत्ता है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि ममता अपनी करिश्माई छवि की वजह से विपरीत ध्रुवों वाले नेताओं को भी एक मंच पर लाने का माद्दा रखती हैं। 
19 जनवरी को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में प्रस्तावित विपक्ष की रैली की कामयाबी से ही यह संकेत मिलेगा कि ममता पीएम की कुर्सी के कितने करीब या दूर हैं। (बीबीसी)




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