संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 10 अगस्त : दलाईलामा की कमअक्ली की बात इतिहास के भी खिलाफ

Posted Date : 10-Aug-2018



भारत में शरण पाकर रह रहे चीन के निर्वासित नेता, तिब्बतियों के गुरू दलाईलामा ने अभी कहा कि अगर नेहरू ने जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने की गांधी की बात मान ली होती तो देश का बंटवारा नहीं होता। उन्होंने नेहरू को आत्मकेन्द्रित नेता बताया। दलाईलामा ने एक सार्वजनिक मंच से कहा कि गांधी जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन नेहरू ने इसे नामंजूर कर दिया। 
दलाईलामा की इस बात से दुनिया के वे तमाम लोग हक्का-बक्का हैं जो कि गांधी, नेहरू, आजादी के वक्त का भारत जानते-समझते हैं, और जिन्हें यह अच्छी तरह याद है कि दलाईलामा के साथ लाखों तिब्बतियों को भारत ने किस तरह चीन की नाराजगी मोल लेकर भी शरण दी थी, और शरणार्थियों की तरह नहीं, बल्कि मेहमानों की तरह रखा। और यह पूरा फैसला जवाहरलाल नेहरू का ही था। आज जब हिन्दुस्तान में तमाम बदहाली और बेहाली के लिए नेहरू पर तोहमत लगाने का एक नया फैशन चल रहा है तब ऐसे बुजुर्ग धार्मिक नेता ने भी इतिहास को तोडऩे-मरोडऩे का काम किया है, और यह भी साबित किया है कि धर्म और आध्यात्म के बावजूद लोग किस तरह और किस कदर अहसान फरामोश हो सकते हैं। दलाईलामा को यह सब कहते हुए यह भी समझ नहीं पड़ा कि अगर जिन्ना अविभाजित हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री होते, तो क्या नेहरू जैसी दरियादिली से उन्होंने तिब्बतियों को शरण दी होती? आधी सदी से अधिक पहले जब भारत आजादी के बाद खुद की दिक्कतों को झेल रहा था, गरीबी, कुपोषण और भुखमरी को झेल रहा था, तब पड़ोस की इतनी बड़ी फौजी ताकत चीन को नाराज करते हुए तिब्बतियों को नेहरू ने भारत में सम्मान की जगह दी, और आज भी सवा लाख से अधिक तिब्बती शरणार्थियों के साथ दलाईलामा भारत में हैं, और वे सबसे आरामदेह एक प्रदेश हिमाचल की धर्मशाला नाम की जगह से तिब्बत की निर्वासित सरकार चला रहे हैं, और भारत की, खासकर नेहरू की मेहरबानी से दुनिया में उन्हें जगह मिली हुई है। 
खैर, नेहरू की किसी मेहरबानी की वजह से इतिहास में उनसे रियायत की जाए, यह कहना हमारा मकसद नहीं है। लेकिन दलाईलामा का दर्जा आज भी भारत में एक शरणार्थी का है, और किसी भी सभ्य शरणार्थी की तरह उन्हें भारत की आंतरिक राजनीति से अपने आपको परे रखना चाहिए। और खासकर ऐसी राजनीति से जो कि नेहरू के इतिहास को मिटाने के मकसद से ओवरटाईम कर रही है। ऐसी कोशिशों को दलाईलामा की ऐसी मदद पर चारों तरफ से इतिहास और इंसानियत के जानकार लोग दलाईलामा को कोस रहे हैं। और शायद इसी के चलते आज उन्होंने चतुराई के साथ यह कहा है कि अगर उनकी कही बात गलत थी, तो वे इसके लिए माफी मांगते हैं। दलाईलामा के इस नेहरू-विरोध से कुछ बातें साबित होती हैं कि धर्म और आध्यात्म किसी को जरूरी नहीं है कि इंसानियत की बेहतर खूबियां भी सिखाएं। यह भी जरूरी नहीं है कि धर्म और आध्यात्म लोगों को कृतज्ञ या एहसानमंद बनना सिखाएं। और किसी देश द्वारा की गई अच्छी मेहमाननवाजी से भी किसी का यह सीखना जरूरी नहीं है कि उस देश का सम्मान करते हुए उसके भीतर की राजनीतिक साजिशों से अपने को दूर रखा जाए। 
दलाईलामा की ऐसी बेतुकी और कमअक्ल बात से दुनिया भर में तिब्बत की स्वायत्तता के लिए चल रहे आंदोलन को भी नुकसान पहुंचेगा। उनकी इस एक बात से यह भी साबित होता है कि किस तरह किसी आंदोलन का मुखिया अपनी गैरजिम्मेदार बात से अपने आपको तो नुकसान पहुंचाता ही है, किस तरह वह आंदोलन के पूरे मकसद को भी नुकसान पहुंचाता है। भारत में अभी नेहरू के इतिहास को जानने और मानने वाले लोग कांग्रेस के बाहर के भी हैं, और इसीलिए कई राजनीतिक पार्टियों के लोगों ने, बहुत से लेखकों और पत्रकारों ने दलाईलामा को उनकी इस रद्दी बात के लिए धिक्कारा है। जिन तिब्बतियों को भारत में मेहमान की तरह रखा गया था, आज लोग उन्हें याद दिला रहे हैं कि वे शरणार्थी हैं, और नेहरू की मेहरबानी से ही उन्हें यहां जगह मिली थी। 
- सुनील कुमार 




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