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'मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से...' पढ़ें, इंकलाबी पंजाबी कवि 'पाश' की कविताएं
23-Mar-2022 4:38 PM
'मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से...' पढ़ें, इंकलाबी पंजाबी कवि 'पाश' की कविताएं

जब भी क्रांति का जिक्र होता है, तब कई ऐसी हस्तियों का नाम भी लोगों की जुबान पर जरूर आता है जिन्होंने अपने तरीके से बुराई के खिलाफ आवाज उठाई. साहित्य के जरिए भी कई लोगों ने समाज में बदलाव लाने की कोशिश की. उन क्रांतिकारी कवियों की फेहरिस्त में ‘पाश’ का नाम जरूर लिया जाता है. इंकलाबी पंजाबी कवि ‘पाश’ का मूल नाम अवतार सिंह संधू था. जानकारी के मुताबिक उन्हें क्रांति का कवि माना जाता है. उन्होंने 15 साल की उम्र से ही कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं. साल 1967 में उनकी कविताओं का पहला प्रकाशन हुआ था. जानकारों के अनुसार उनकी कविताओं में गांव की मिट्टी की खूशबू, क्रांति, विद्रोह और इंसानों से जुड़ी भावनाएं मिलती हैं. उनकी कलम की धार से डर कर 23 मार्च, 1988 को आतंकवादियों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी थी.

आज ‘पाश’ की पुण्यतिथि है. पढ़ें, उनकी रचना- ‘हम लड़ेंगे साथी’, ‘मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से’ और क़ैद करोगे अंधकार में’

हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े

हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीख़ती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, सवाल नाचता है
सवाल के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी

क़त्ल हुए जज़्बों की क़सम खाकर
बुझी हुई नज़रों की क़सम खाकर
हाथों पर पड़े गाँठों की क़सम खाकर
हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का पेशाब पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले ख़ुद नहीं सूँघते
कि सूजी आँखों वाली
गाँव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्ध से लौट नहीं आता

जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाइयों का गला घोंटने को मज़बूर हैं
कि दफ़्तरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर

हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है
जब बन्दूक न हुई, तब तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की ज़रूरत होगी

हम लड़ेंगे कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता,  हम लड़ेंगेहम लड़ेंगे कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता, हम लड़ेंगे
और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सज़ा कबूलने के लिए
लड़ते हुए मर जाने वाले की
याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे

मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से
मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से
क्या वक़्त इसी का नाम है
कि घटनाएँ कुचलती हुई चली जाएँ
मस्त हाथी की तरह
एक समूचे मनुष्य की चेतना को ?
कि हर सवाल
केवल परिश्रम करते देह की ग़लती ही हो
क्यों सुना दिया जाता है हर बार
पुराना लतीफ़ा
क्यों कहा जाता है हम जीते है
ज़रा सोचें –
कि हममे से कितनो का नाता है
ज़िन्दगी जैसी किसी चीज़ के साथ!
रब्ब की वह कैसी रहमत है
जो गेहूँ गोड़ते फटे हाथो पर
और मंडी के बीच के तख़्तपोश पर फैले माँस के
उस पिलपिले ढेर पर
एक ही समय होती है ?
आख़िर क्यों
बैलों की घंटियों
पानी निकालते इंज़नो के शोर में
घिरे हुए चेहरों पर जम गई है
एक चीख़ती ख़ामोशी ?
कौन खा जाता है तलकर
टोके पर चारा लगा रहे
कुतरे हुए अरमानो वाले पट्ठे की मछलियों ?
क्यों गिड़गिडाता है
मेरे गाँव का किसान
एक मामूली पुलिस वाले के सामने ?
क्यों कुचले जा रहे आदमी के चीख़ने को
हर बार कविता कह दिया जाता है ?
मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से

क्यों कुचले जा रहे आदमी के चीख़ने को हर बार कविता कह दिया जाता है ? मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज सेक्यों कुचले जा रहे आदमी के चीख़ने को हर बार कविता कह दिया जाता है ? मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से
यह भी पढ़ें- पढ़ें, सावित्रीबाई फुले की कविताएं- ‘शूद्रों का दुख’ और ‘श्रेष्ठ धन’

क़ैद करोगे अंधकार में
क्या-क्या नहीं है मेरे पास
शाम की रिमझिम
नूर में चमकती ज़िंदगी
लेकिन मैं हूं
घिरा हुआ अपनों से
क्या झपट लेगा कोई मुझ से
रात में क्या किसी अनजान में
अंधकार में क़ैद कर देंगे
मसल देंगे क्या
जीवन से जीवन
अपनों में से मुझ को क्या कर देंगे अलहदा
और अपनों में से ही मुझे बाहर छिटका देंगे
छिटकी इस पोटली में क़ैद है आपकी मौत का इंतज़ाम
अकूत हूँ सब कुछ हैं मेरे पास
जिसे देखकर तुम समझते हो कुछ नहीं उसमें(अनुवाद: प्रमोद कौंसवाल)

साभार- कविता कोश

(news18.com)

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