संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 सितंबर : रावण तय करने का हक होना चाहिए, और जलाने का भी

Posted Date : 11-Sep-2018



राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की चुनावपूर्व गौरवयात्रा में काले झंडे दिखाने वाले एक आदमी को वहां दर्जन भर पुलिसवालों ने घेरकर लाठियों से जिस तरह कूटा है, उसका वीडियो दिल दहलाने वाला है। दूसरी तरफ चार दिन पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के एक दौरे के पहले सड़क पर धरना दे रही स्कूली बच्चियों को भगाने के लिए पुलिस के साथ-साथ वहां के एसडीएम जिस तरह लाठी लेकर खुद भी टूट पड़े थे, उसका वीडियो भी फैला हुआ है। कुल मिलाकर सत्तारूढ़ नेताओं को किसी भी तरह की असुविधा से बचाने के लिए पुलिस लोकतांत्रिक प्रदर्शन करते हुए लोगों को भी जिस हिंसक तरीके से पीटती है, उसका किसी सत्तारूढ़ पार्टी से कोई लेना-देना नहीं होता है। हर पार्टी के राज में पुलिस की इस किस्म की हिंसा की लंबी भारतीय परंपरा बनी हुई है, और शायद ही कोई नेता ऐसे हों जो कि अपनी जनता के लोकतांत्रिक प्रदर्शन का सामना करने की पहल करते हों।
अखबार के दफ्तर में बैठकर रोजाना हमें ऐसी दर्जनों तस्वीरें देखने मिलती हैं जिनमें पुलिस किसी सत्तारूढ़ नेता के पुतले को बचाने के लिए प्रदर्शनकारियों के साथ इतनी खींचतान करती है कि पुतले के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। अब किसी नेता का पुतला अगर जल ही जाए तो वह उस नेता का अधिक अपमान होगा, या फिर उस पुतले के टुकड़े-टुकड़े हो जाएं, तो वह अधिक बड़ा अपमान होगा? इसी तरह जहां पुतला जलने की आशंका होती है, वहां पुलिस पहले से पानी का इंतजाम करके रखती है कि अगर किसी तरह पुतला जला भी दिया गया, तो उसे फिर चाहे पास से पानी की बोतलें ही खरीदकर क्यों न बुझाना पड़े। कई तस्वीरों में ऐसा नजारा भी दिखता है कि प्रदर्शनकारी पुतला जलाने में कामयाब हो जाते हैं, और पुलिस को पानी नहीं जुटता, तो ऐसे में पुलिस जलते हुए पुतले को अपने बूटों से कुचल-कुचलकर आग बुझाने की कोशिश करती है। अब सवाल यह उठता है कि नेताजी के पुतले का जल जाना ठीक है, या फिर जलने के साथ-साथ पुलिस के बूटों तले कुचलकर अधजला बचना?
दरअसल लोकतंत्र में कई बातों के लिए बर्दाश्त अगर न रहे, तो वह लोकतंत्र ही नहीं रह जाता। किसी को पुतला जलाने, या पुतले को फांसी पर टांगने, या किसी को काले झंडे दिखाने से उसका भला क्या नुकसान हो सकता है? लोगों की भड़ास अगर ऐसे काम करके निकलती है, तो सरकार द्वारा तय किए गए धरना-स्थल पर एक अंतिम संस्कार का कोना भी बना देना चाहिए जहां लोग पुतले को जला सकें, या फांसी दे सकें। हिंदुस्तान में मुजरिमों को पकडऩे के लिए भी पुलिस इतनी कम है कि उसे पुतलों को छीनने में, उसकी आग बुझाने में, काले झंडे छीनने में, बर्बाद नहीं करना चाहिए। लोगों को जब तक रोकथाम करने के लिए पुलिस दिखती है, तभी तक उनका कई किस्म के प्रदर्शन का उत्साह भी अधिक रहता है। इसलिए लोगों को शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक प्रदर्शन करने देना चाहिए, किसी के पुतले जलने से उनकी देह जलने का दिन न करीब आता, न दूर जाता। और फिर उत्तर भारत में तो लोग एकमत होकर रावण का पुतला जलाते ही हैं, समारोहपूर्वक जलाते हैं, और उसकी खुशियां भी मनाते हैं। हर पार्टी के लोगों को अपने रावण तय करने का हक होना चाहिए, और जलाने का भी।
- सुनील कुमार 




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