संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 सितंबर : ऐसे आरोपों पर खुद होकर तुरत सफाई देने की जरूरत

Posted Date : 13-Sep-2018



भारत में एक बार फिर दो राजनीतिक बवाल खड़े हो रहे हैं, भारत से बैंकों को लूटकर भागे हुए दारू कारोबारी विजय माल्या ने कहा है कि वे विदेश जाने के पहले वित्तमंत्री अरूण जेटली से मिलकर गए थे, और उन्हें बताकर गए थे कि वे बैंकों के कर्ज का निपटारा करना चाहते हैं। इस पर जेटली ने कहा है कि माल्या राज्यसभा सदस्य होने का बेजा फायदा उठाते हुए उनसे संसद के कारीडोर में जबर्दस्ती आकर मिले थे, और उन्होंने तुरंत ही कह दिया था कि उन्हें जो निपटारा करना है वह बैंकों के साथ करें, और इसके बाद उनसे बात करने से मना कर दिया था। जेटली की इस बात को गलत बताते हुए आज सुबह कांग्रेस की एक प्रेस कांफ्रेंस में कांग्रेस सांसद पी.एल. पुनिया ने राहुल गांधी की मौजूदगी में कहा कि संसद के सेंट्रल हॉल में जेटली और माल्या की मुलाकात के वे गवाह हैं, और यह मुलाकात काफी देर तक चली थी, और इसकी जांच संसद के कैमरों की रिकॉर्डिंग से की जा सकती है। उन्होंने जेटली को खुली चुनौती दी कि यह आरोप अगर गलत साबित होगा तो वे राजनीति छोड़ देंगे, और अगर कैमरों ने जेटली-माल्या की काफी देर तक की बैठक दर्ज की होगी, तो जेटली राजनीति छोड़ दें। 
दूसरी तरफ बीजेपी ने राहुल गांधी पर यह आरोप लगाया है कि नेशनल हेराल्ड मामले में उन्होंने एक ऐसी निजी कंपनी से कर्ज लेना बताया है जो कि दोनंबरी पैसों को एक नंबर का करने का कालाधंधा करती थी, और ऐसी दो सौ कंपनियां चलाने वाले एक मालिक ने आयकर विभाग को दिए अपने बयान में अपनी सारी कंपनियों को इसी किस्म का धंधा करने वाला बताया है। इसके साथ-साथ भाजपा ने राहुल और कांग्रेस पार्टी पर यह भी आरोप लगाया है कि वे समय-समय पर माल्या और उसकी कंपनियों के साथ यूपीए सरकार रहते हुए नर्मी दिखाते आए हैं, और वे माल्या से मिले हुए हैं। 
आज यहां पर दो मामले ऐसे हैं जिनमें देश का पैसा डूबते हुए दिख रहा है, चाहे वह माल्या की कंपनियों में हो, चाहे वह एक ट्रस्ट नेशनल हेराल्ड में हो, जो कि नेहरू के समय से प्रकाशित हो रहे कांग्रेस के अखबार की मालिक कंपनी है, और उसके शेयर और मालिकाना हक को गलत तरीके से हासिल करने का मामला राहुल गांधी, सोनिया गांधी, और कांग्रेस पार्टी के इस ट्रस्ट के खिलाफ अदालत और आयकर में चल रहा है। इन दोनों मामले में हमारा यह कहना है कि सार्वजनिक जीवन में, और खासकर सत्ता से जुड़े हुए लोगों को अदालत की आड़ लेना बंद करना चाहिए। जब वे जनता के बीच वोट मांगने के लिए जाते हैं, तो अपने नोटों के हिसाब के लिए उनको बंद कमरों और अदालती मेहरबानी की आड़ नहीं लेनी चाहिए। उनको आरोप लगते ही बिना किन्तु-परन्तु के सीधे जनता के सामने खुद होकर अपना हिसाब रखना चाहिए, चाहे वह माल्या से जेटली की मुलाकात की बात हो, चाहे वह राहुल और सोनिया के शेयरों की और पैसों की बात हो, चाहे वह स्मृति ईरानी और नरेन्द्र मोदी की डिग्री की बात हो, चाहे वह दूसरे नेताओं पर लगे दूसरे तरह के आरोपों की बात हो। 
सार्वजनिक जीवन के लोगों को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि जनता के जानने के हक को लेकर ही देश में सूचना के अधिकार का कानून बना है। ऐसे में सार्वजनिक जीवन के लोगों को न सिर्फ जनता के जानने के अधिकार का सम्मान करना चाहिए, बल्कि जनता को बताने की अपनी जिम्मेदारी भी पूरी करनी चाहिए। जनता के पूछने पर, सूचना के अधिकार की अर्जी लेकर महीनों और बरसों तक सरकारी दफ्तरों या पार्टी दफ्तरों में धक्के खाने पर भी अगर कोई जानकारी नहीं दी जाती है, तो इस बात की पूरी गुंजाइश रहती है कि ऐसी जानकारी में कोई न कोई घोटाला छुपा हुआ है। इसलिए सार्वजनिक जीवन में आरोप लगते ही बिना किसी अदालती नोटिस के लोगों को खुद ही सब कुछ सामने रखना चाहिए, और लोगों के मन से संदेह खत्म करना चाहिए। 
- सुनील कुमार 




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