संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जिनकी जिंदगी न्यायव्यवस्था की लापरवाही और बेइंसाफी से तबाह, उनका इंसाफ क्या?
03-Jul-2022 4:18 PM
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  जिनकी जिंदगी न्यायव्यवस्था की लापरवाही और बेइंसाफी से तबाह, उनका इंसाफ क्या?

हिन्दुस्तान के जिस उत्तरप्रदेश में राम बसते हैं, जहां की सरकार रामराज का दावा करती है, उस प्रदेश की एक खबर पिछली कई सरकारों के हाल को बताने वाली आई है। 1996 में उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था, उसके बाद मायावती लौटकर फिर मुख्यमंत्री बनी थीं, उनके बाद कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्ता, राजनाथ सिंह, मायावती, मुलायम सिंह यादव, मायावती, अखिलेश यादव, और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। तीन दशक का यह वक्त गुजर गया तब जाकर सत्तर बरस के रामरतन को अदालत से रिहाई मिली है। जब वह 44 बरस का था, तब पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया, और उस पर आरोप लगाया कि उसके पास कट्टा है। यह देसी पिस्तौल कभी बरामद नहीं हो पाई, अदालत में पुलिस कभी पेश नहीं कर पाई, लेकिन मामला चलते ही रहा। और आज सबसे निचली अदालत में इस मामले का फैसला हुआ तो उसे बेकसूर मानकर बरी किया गया। इन 26 बरसों में अदालत में उसे चार सौ बार पेश होना पड़ा, और अब वह 70 बरस का हो चुका है, और पूरा परिवार जिंदगी खो चुका है। इस मामले के चलते बच्चे पढ़ नहीं पाए, और परिवार बर्बाद हो गया। 1996 से चली आ रही कट्टे की तोहमत से निचली अदालत ने उसे 2020 में बरी कर दिया था, लेकिन सरकारी वकील ने फिर जोर डालकर मामला खुलवाया, और अब जाकर दुबारा वही फैसला सामने आया।

आज जब हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तक दुनिया भर में घूम-घूमकर हिन्दुस्तानी लोकतंत्र और न्यायव्यवस्था के बारे में सौ तरह की बातें कह रहे हैं, तो इस देश में ऐसे मामले सामने आना जारी है जो बताते हैं कि यह लोकतंत्र किस हद तक नाकामयाब भी हो चुका है। आजाद हिन्दुस्तान का इतिहास सरकारी अमले की हिंसा और कमजोर लोगों के साथ उसकी बेइंसाफी से भरा हुआ है। लोगों को बिहार का आंख फोडऩे का मामला याद होगा, भागलपुर में 70-80 के दशक में पुलिस ने एक ऑपरेशन गंगाजल चलाया। इसके तहत पुलिस ने 33 अपराधियों की आंखों को फोड़ा, और उन्हें इंजेक्शन की सिरींज से तेजाब डाला। इसी को पुलिस और जनता ने गंगाजल माना। छत्तीसगढ़ के बस्तर में सुरक्षा बलों ने आदिवासी महिलाओं से बलात्कार और बेकसूर आदिवासियों की हत्याओं के अनगिनत जुर्म किएं, लेकिन उनके खिलाफ जांच आयोग की रिपोर्ट आ जाने के बाद भी कोई कार्रवाई तक नहीं हुई। पंजाब के आतंक के दिनों में सुरक्षा बलों ने लोगों के मानवाधिकार खूब कुचले, यही काम उत्तर-पूर्वी राज्यों में हुआ, और यही काम कश्मीर में हुआ। लेकिन हिन्दुस्तान जितने विशाल और विकराल आकार के देश की सरकारी ताकत इतनी बड़ी हो जाती है कि बिखरे हुए मानवों के अधिकार उसके सामने कहीं नहीं टिक पाते। नतीजा यह हुआ कि जगह-जगह लोगों का लोकतंत्र पर से भरोसा खत्म हुआ, और सरकार को अपनी पूरी ताकत इस्तेमाल करके फौजी वर्दियों की मदद से कथित लोकतंत्र को बचाना पड़ा, भरोसा तो नहीं बचना था, नहीं बचा।

हिन्दुस्तानी न्याय व्यवस्था को अपने खुद के कामकाज पर गौर करना चाहिए, क्योंकि अब संसद और विधानसभाओं को बाहुबल की स्थिरता या बाहुबल की कमी की अस्थिरता के खेल खेलने से फुर्सत नहीं है। ऐसे में किसी को तो सोचना होगा कि 25-30 बरस तक अगर किसी बेकसूर को अदालत में फंसाकर रखा जाता है, तो उस परिवार की जिंदगी के उन दशकों की किसी भरपाई की जिम्मेदारी लोकतंत्र पर आती है या नहीं? आतंकी घटनाओं की तोहमत लगाकर मुस्लिमों को जेल में डालना कई पार्टियों के राज में पुलिस और सत्ता का पसंदीदा शगल रहा है, और जब ऐसे लोग 25-30 बरस बाद बेकसूर छूटते हैं, तब तक उनकी कई पीढिय़ों का वर्तमान और भविष्य सब कुछ तबाह हो चुका रहता है। इस लोकतंत्र में ऐसे इंतजाम की जरूरत है जिसमें शुरूआत के लिए कम से कम गरीब लोगों को बेकसूर बरी होने पर मुकदमे के बरसों की भरपाई न्यूनतम मजदूरी के हिसाब से तो ब्याज सहित मिले। अगर एक नामौजूद कट्टे की तोहमत लगाकर राम के उत्तरप्रदेश में रामरतन नाम के गरीब के 26 बरस अदालत में झोंक दिए गए, तो उसे इन 26 बरसों की न्यूनतम मजदूरी जितना मुआवजा तो मिलना चाहिए। अब उसके बच्चों की जा चुकी पढ़ाई का तो कोई मुआवजा नहीं मिल सकता, परिवार की जिंदगी दुबारा नहीं आ सकती, लेकिन लोकतंत्र को अपनी नीयत और नीति स्थापित करने के लिए ऐसे मुआवजे का इंतजाम करना चाहिए।

हिन्दुस्तान में जिंदगी बहुत सस्ती मान ली जाती हैं, और लोगों का वक्त भी मुफ्त का मान लिया जाता है। इसीलिए सरकारी दफ्तरों से लेकर दूसरी सार्वजनिक जगहों तक सरकारें अपने निकम्मेपन की भरपाई लोगों की कतारें लगवाकर करती है। लोगों को दिन-दिन भर खड़ा करवा दिया जाता है, मानो उनके वक्त की कोई कीमत न हो। और सबसे अधिक खराब नौबत हिन्दुस्तान की अदालतों की है जहां पर गरीब इंसाफ के लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी खड़े रह जाते हैं। वे अपनी आंखों से देखते हैं कि किस तरह सुबूत बिक रहे हैं, गवाह बिक रहे हैं, पुलिस और वकील बिक रहे हैं, और अदालतों के बाबू से लेकर जज तक बिक रहे हैं। और इस खरीद-बिक्री को देखते हुए भी वे अपनी पूरी जिंदगी इंसाफ कहे जाने वाले एक फैसले का इंतजार करते हैं। अभी पिछले कुछ हफ्तों से हिन्दुस्तान के मुख्य न्यायाधीश योरप और अमरीका जाकर वहां के बहुत से कार्यक्रमों में भारतीय न्यायपालिका और लोकतंत्र पर बहुत कुछ कह रहे हैं। लेकिन उसके साथ-साथ एक बड़ी जरूरत यह भी है कि न्यायव्यवस्था की लापरवाही, साजिश, या बेइंसाफी की शिकार जिंदगियों को मुआवजा देने के बारे में भी सोचा जाए।
-सुनील कुमार

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