संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : आजादी के अमृत महोत्सव का अमृत किसे, और विष किसे?
14-Aug-2022 1:07 PM
 ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  आजादी के अमृत महोत्सव का अमृत किसे, और विष किसे?

आज जब पूरा हिन्दुस्तान तिरंगे झंडे को लहराते हुए घूम रहा है, और कल आजादी की 75वीं सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहा है, उस वक्त राजस्थान के जालौर में इंटरनेट बंद किया गया है। आमतौर पर साम्प्रदायिक घटनाओं को लेकर देश में जगह-जगह ऐसी नौबत आती है, लेकिन जालौर में तो हिन्दुओं के बीच ही ऐसी नौबत आई है। वहां के एक निजी स्कूल में 9 बरस के एक दलित बच्चे ने मास्टर छैलसिंह की अलग रखी हुई मटकी से पानी पी लिया, तो मास्टर ने उसे मार-मारकर जख्मी कर दिया, और तीन हफ्ते बाद इन्हीं जख्मों की वजह से अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मास्टर की मार से इस दलित बच्चे के चेहरे और कान बुरी तरह जख्मी हुए थे, और इन जख्मों से वह उबर ही नहीं पाया। अब वहां के तनाव को देखते हुए राज्य सरकार ने वहां इंटरनेट बंद किया है।

आजादी की 75वीं सालगिरह के मौके पर आजादी का अमृत महोत्सव मना रही भारत सरकार के जलसे के बीच यह एक बुरी खबर है जो कि हिन्दुस्तान में उस दलित तबके की हकीकत बताती है जो कि आज देश पर राज कर रही सोच के पांवों तले जी रहा तबका है। आज इस देश में हाईकोर्ट की एक जज उस मनुस्मृति को महिमामंडित कर रही है जिसमें दलितों के खिलाफ तमाम किस्म की हिंसक बातें लिखी गई हैं, जहां महिलाओं को तिरस्कार के लायक पाया गया है। जिस हिन्दू सोच के मुताबिक दलित के कानों में ज्ञान का एक शब्द पड़ जाने पर उसमें पिघला हुआ सीसा भर देने की व्यवस्था है, उस सोच के तहत इस मास्टर ने तो दलित बच्चे को महज पीटा ही था, और यह तो उसके दलित बदन का कुसूर था कि वह मास्टर की मार को बर्दाश्त नहीं कर पाया, और चल बसा।

राजस्थान, मध्यप्रदेश, और उत्तर भारत के कुछ दूसरे हिस्से दलितों के साथ ऐसे जुल्म करने की परंपरा की गिरफ्त में हैं। हिन्दुस्तान के जिन लोगों को यह लगता है कि अब जाति व्यवस्था खत्म हो चली है, और अब आरक्षण की जरूरत नहीं है, उन लोगों को सीमेंट और डामर की सडक़ों से कुछ नीचे उतरकर देखना चाहिए कि जमीनी हकीकत क्या है। मध्यप्रदेश के कई इलाकों में दलित चप्पल पहनकर सवर्णों की बस्ती से नहीं गुजर सकते, और जो लोग भारत के गांवों के परंपरागत ढांचों के जानकार हैं, उनका कहना है कि आम गांवों में ऊंचे इलाकों में सवर्ण बसते हैं, और वहां से नालियों का पानी जिस तरफ बहता है, वहां ढलान की तरफ दलित बसते हैं, ताकि दलितों की नालियों का पानी कभी भी सवर्ण बस्तियों की तरफ न आ सके। हर बरस दर्जनों ऐसी खबरें आती हैं कि दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढक़र बारात में निकलने के लिए पुलिस की हिफाजत मांगनी पड़ी, और पुलिस की मौजूदगी में भी उन पर हमले हुए। कहीं दलितों को मूंछ रख लेने पर मारा जाता है, तो कहीं संगीत जोर से बजाने पर। देश को आजाद हुए पौन सदी हो गई है, लेकिन दलितों के लिए सवर्ण नफरत में कोई कमी नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की धारदार वक्ता महुआ मोइत्रा ने कुछ दिन पहले ही यह कहा था कि हिन्दुस्तान में जब तक मुस्लिम हैं, तभी तक हिन्दू हिन्दू हैं। जब मुस्लिम खत्म हो जाएंगे तो हिन्दू नहीं रह जाएंगे, उनकी जगह ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अछूत बच जाएंगे। यह बात सौ फीसदी सही है। लेकिन दिक्कत की बात यह है कि जो दलित जाति व्यवस्था में पैरों से पैदा हुए माने जाते हैं, और अछूत समझे जाते हैं, जिन्हें इंसानी हकों का दावा करते ही मार दिया जाता है, वे दलित भी उन्हीं सवर्ण हिन्दुओं के देवी-देवताओं की पूजा करने के लिए मरे पड़े रहते हैं, जिन देवी-देवताओं ने इन दलितों को कभी नहीं बचाया। हिन्दू धर्म की व्यवस्था में मंदिर प्रवेश, और ईश्वर की उपासना का अधिकार मांगने का मतलब ही ब्राम्हणवादी सवर्ण व्यवस्था को मजबूत करना है। इन दलितों को हिन्दू समाज के ऐसे जातिवादी ढांचे से बाहर निकलकर अपना खुद का ईश्वर ढूंढने या बनाने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन सदियों की गुलाम मानसिकता उन्हें मंदिर प्रवेश का एक ऐसा अधिकारों का सपना दिखाती है जिसे हासिल करना उन्हें बहुत बड़ी बात लगती है। जिस दिन दलित समुदाय एकमुश्त हिन्दू समाज के ढांचे के बाहर निकल आएंगे, बचे हुए गैरदलित हिन्दुओं की अकल ठिकाने आ जाएगी। सवर्ण हिन्दुओं का यह दंभ, और उनकी यह हिंसा, तभी तक कायम हैं, जब तक दलित 21वीं सदी में भी गुलाम मानसिकता के शिकार बने हुए हैं, और मंदिर-प्रवेश को एक अधिकार का दावा मानकर चल रहे हैं।

ऐसी व्यवस्था को धिक्कारकर, लानत भेजकर दलितों को हिन्दू व्यवस्था को ही खारिज करना चाहिए जिसने कि उन्हें शोषण का सामान बनाकर रखा है। यह तो इस देश में दलितों और आदिवासियों के साथ जुल्म और ज्यादती करने पर एक अलग कानून का इंतजाम है, उसके बाद भी सवर्ण तबका धड़ल्ले से हिंसा करते रहता है, क्योंकि उसे भारत की जांच और न्याय व्यवस्था पर अपनी बिरादरी के कब्जे पर अतिआत्मविश्वास है। यह सिलसिला खत्म करना चाहिए, और राजस्थान, मध्यप्रदेश सरीखे राज्यों में कानून के कड़ाई से इस्तेमाल से हालात सुधारने चाहिए। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, और तैनात अफसरों में अगर दलितों की बराबरी का सम्मान नहीं है, तो उन्हें चुनावों से दूर करना चाहिए, और उनकी नौकरी खत्म करनी चाहिए। यह इस देश के लिए आजादी की सालगिरह के इस मौके पर शर्म से डूब मरने की एक बात है कि एक दलित बच्चे को इसलिए मार डाला गया कि उसने गैरदलित का पानी छू लिया था। जहां तक इस सालगिरह को आजादी का अमृत महोत्सव करार देने की भाषा का सवाल है, तो यह भाषा अपने आपमें उसी हिन्दू धर्म से निकली हुई है जिसमें समुद्र मंथन से निकले अमृत पर देवताओं का हक तय किया गया था। यह भाषा आज भी इस देश में उसी धर्म व्यवस्था को मजबूत करती है, और किसी के लिए अमृत और किसी के लिए विष की सोच आगे बढ़ाती है।
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