विचार / लेख

दुर्गा तेरे रूप अनेक : स्त्री के 'ना' कहने का अधिकार
04-Oct-2022 8:57 AM
दुर्गा तेरे रूप अनेक : स्त्री के 'ना' कहने का अधिकार

-शंभुनाथ

बंगाल दुर्गा पूजा के अवसर पर मानो सुरापान कर लेता है, इतना आनंदातिरेक शायद ही किसी अन्य राज्य में किसी त्योहार के अवसर पर हो। यहां की एक बड़ी खूबी धर्म और कलाओं का सम्मिलन है, जो धर्म के सौंदर्य को सार्वभौम बना देता है। पूरा मामला आस्था और अनास्था से ऊपर उठ जाता है। स्त्री, बच्चे, बुजुर्ग और नौजवान नए परिधान, नए जोश और प्रेमोन्माद में होते हैं! हिंसा के एक पुराने बिंब का पूरी तरह आनंदोत्सव में बदल जाना, यह कलाओं का कमाल है! इससे कला की शक्ति का बोध होता है।

इस अवसर पर दो- चार बातें दिमाग में उभर रही हैं। पहली बात यह कि दुर्गा अब शाक्त परंपरा और बंगाल के हिंसक जमींदारों की शक्तिपूजा तक सीमित न होकर काफी रूपांतरित हो गई हैं। वह देवी से ज्यादा एक उत्सव हैं-- सामूहिकता का उत्सव। 

ध्यान देना चाहिए कि दुर्गा अपने आपमें कुछ नहीं है। उसकी कल्पना एक ऐसी शक्ति के रूप में की गई है, जो विभिन्न देवताओं की शक्ति लेकर निर्मित होती है । भारत भी विभिन्न जातियों, भाषाओं और संस्कृतियों से ऐसे ही बना है। हमारी हिंदी भी तमाम बोलियों, उपभाषाओं और स्थानीय भाषाओं से शक्ति लेकर ऐसे ही बनी है। दरअसल सामूहिक असहमति में ही शक्ति है, अन्यथा सब अरण्यरोदन है!

दुर्गा का दूसरी सदी से पहले कोई अस्तित्व नहीं है। दूसरी से चौथी सदी की मिली मूर्तियों में वह चार हाथ वाली देवी हैं। किसी में वह छह या आठ हाथ वाली हैं। काफी बाद में वह दस हाथ वाली देवी बनती हैं। छठी सदी की एलोरा की मूर्ति में दुर्गा ने एक पूर्ण महिष पर अपना दाहिना पैर रखा है। बोस्टन म्यूजियम में रखी 10वीं सदी की एक अष्टभुजा मूर्ति में दुर्गा महिष के दो सींगों सहित कटे सिर पर खड़ी हैं। पौराणिक कथा और मूर्तिकला के संबंध के अध्ययन से बहुत सी बातें साफ होती हैं!

दुर्गा की एक व्याख्या इस रूप में की जा सकती है कि यह स्त्री के 'ना' कहने के अधिकार की कथा है। पुरुष उत्पीड़न और वर्चस्व के प्राचीन युग में एक ऐसी स्त्री की भारतीय कल्पना सम्भव हुई है, जिसमें एक स्त्री अपनी यौनिकता पर अपना अधिकार रखना चाहती है। किसी ने अपनी ताकत प्रदर्शित करते हुए प्रेम निवेदन कर दिया तो स्त्री को उसके निवेदन के आगे झुकना होगा, इस नियति को दुर्गा चुनौती देती हैं। वह बलात्कार के विरुद्ध एक शक्ति है, जो हर स्त्री के भीतर है!
एक अनोखी बात वैष्णो देवी को लेकर है। दुर्गा का यहां वैष्णो देवी नाम इसलिए है कि वह शिव की जगह विष्णु से जुड़ी हैं! आज ही दल नहीं बदला जाता, पहले भी दल- बदल होता था!

इस कल्पना में देखा जाता है कि महिषासुर की जगह भैरव दुर्गा के पीछे पड़ता है और दुर्गा भागती है। यह भी स्पष्ट यौन उत्पीड़न का मामला है! जम्मू के वैष्णो देवी के मंदिर के पास ही भैरव का भी मंदिर है। 

ऐसी ही बहुत सारी बातें हैं। नवमी सामने है। दुर्गा पूजा अब हर प्रान्त में होने लगी है। विदेशों में होने लगी है। इस जमाने में पूजा का मतलब है खाना- पीना और मनोरंजन! अब धर्म को ढूंढना हो तो वह सिर्फ राजनीति की गुफ़ाओं में मिलेगा।
 
दशहरा में भी रावण दहन का महान दायित्व उसे दिया जाता है, जिसने दशहरा उत्सव में सबसे ज्यादा चंदा दिया है! अब आज राम कहां मिलें!!
तो सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएं! और निराला की ये यादगार पंक्तियां :

होगी जय होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन,
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन!
दुर्गा को कलाओं की शक्ति से नए- नए रूप में देखना होगा और खुद को नवीन करना होगा-- सिर्फ फैशन के नए कपड़े और नए जूते भर नहीं---- नई जीवन दृष्टि भी चाहिए!

 

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