संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सौ की क्षमता के पुल पर चार-पांच सौ लोग चढ़े, कौन बचा सकते थे?
31-Oct-2022 4:28 PM
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  सौ की क्षमता के पुल पर चार-पांच सौ लोग चढ़े, कौन बचा सकते थे?

गुजरात के मोरबी में कल एक पुल टूटने से अब तक 141 मौतों की खबर है, और एक आशंका यह भी है कि पुल के नीचे नदी में सारा पानी नालों का है जो कि इतना गंदा है कि अंधेरे में बचावकर्मी लाशों को ढूंढ भी नहीं पाए। यह टंगा हुआ पुल डेढ़ सौ बरस से भी अधिक पुराना था, और कई बरस बंद रहने के बाद अभी उसे सुधारकर शुरू किया गया था। इसे एक पर्यटन केन्द्र का दर्जा मिला था, और छठ पूजा होने से वहां शायद अधिक लोग पहुंचे, और पुल पर उसकी क्षमता से शायद चार-पांच गुना लोग चढ़े हुए थे, ऐसा लगता है कि इसी अधिक वजन की वजह से यह पुल टूटा होगा। राज्य और केन्द्र सरकार अपनी पूरी ताकत से लोगों को बचाने में लगी हुई हैं, लेकिन मौतों का अब तक का आंकड़ा भी दिल दहलाने वाला है।

इस हादसे से कई किस्म के सबक लिए जाने चाहिए। हिन्दुस्तान में बहुत से तीर्थयात्राओं के मौकों पर, मंदिरों में और तीर्थ के रेलवे स्टेशनों पर भगदड़ में कई हादसों में बड़ी संख्या में लोगों की मौतें हुई हैं। गैरतीर्थ पर्यटन केन्द्रों पर भी भीड़ और भगदड़ मिलकर बड़ा हादसा खड़ा कर देते हैं, और 1980 में कुतुबमीनार के भीतर पर्यटकों में हुई भगदड़ में 45 लोग मारे गए थे जिनमें से अधिकतर बच्चे थे। हिन्दुस्तान की एक दिक्कत यह भी है कि यहां लोग कुछ चुनिंदा त्यौहारों और छुट्टियों पर तीर्थों और पर्यटन केन्द्रों पर टूट पड़ते हैं, और किसी जगह की क्षमता ऐसी भीड़ के लायक नहीं रहती है। अभी कुछ दिन पहले ही मध्यप्रदेश में एक मंदिर से लौटते हुए ट्रैक्टर ट्रॉली पर सवार तमाम रिश्तेदार शराबी ड्राइवर की मेहरबानी से एक तालाब में जा गिरे थे, और बड़ी संख्या में मौतें हुई थीं। धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों में सडक़ के कोई नियम लागू नहीं होते, और श्रद्धा और आस्था से भरे हुए लोग पूरी तरह अराजक होकर चलते हैं। नतीजा यह होता है कि थोक में बहुत सी मौतें होती हैं। हाल के बरसों में धर्मान्ध भीड़ रास्ते के बाजारों पर हमले करते भी चलती दिखी है, और यह सिलसिला उन राजनीतिक दलों द्वारा बढ़ावा भी पा रहा है जो कि धार्मिक आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण की नीयत रखते हैं।

अब गुजरात का यह हादसा एक अलग किस्म की तकनीकी और प्रशासनिक विफलता का है। पुल पुराना जरूर था, लेकिन वह अभी-अभी मरम्मत के बाद दुबारा शुरू किया गया था, इसलिए कोई वजह नहीं थी कि पुल टूट जाता। लेकिन जैसे कि हर मजबूत चीज की मजबूती की एक सीमा होती है, इस पुल की भी क्षमता अगर सौ लोगों की थी, और उस पर चार-पांच सौ लोग चढ़ गए थे, तो यह स्थानीय प्रशासन की नाकामी थी। कई जगहों पर विसर्जन या किसी दूसरे धार्मिक जुलूस को देखने के लिए किसी पुराने और कमजोर हो चुके मकान के छज्जे पर बहुत से लोग चढ़ जाते हैं, और छज्जा गिरने से एक साथ बहुत सी मौतें होती हैं। कल गुजरात के इस पुल पर जाने वाले लोगों को भी रोकने का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए था। अगर ऐसा रोकना मुमकिन नहीं था, तो इस पुल को शुरू ही नहीं करना था। ऐसा हाल बहुत से मंदिरों में होता है, और कई जगहों पर गीली सीढिय़ों पर भीड़ फिसलती है, और लोग कुचलकर मारे जाते हैं। खबरों में आया है कि अजंता घडिय़ां बनाने वाली कंपनी को यह पुल चलाने का ठेका दे दिया गया था, और ऐसा लगता है कि इस कंपनी ने क्षमता से कई गुना अधिक टिकटें बेच दी थीं। इस पर निगरानी की जिम्मेदारी फिर भी अफसरों की होनी चाहिए थी जिन्होंने आपराधिक लापरवाही दिखाई है।

हिन्दुस्तान के बारे में एक बात बहुत साफ समझ लेनी चाहिए कि धर्म से परे भी रोजाना की जिंदगी में हिन्दुस्तानियों को न तो नियम मानने की आदत है, और न ही कतार लगाने की। बिना कतार की भीड़ में किसी का भी काम होने में दुगुना समय लग सकता है, लेकिन लोग भीड़ की शक्ल में रहना पसंद करते हैं, कतार मानो लोगों के अहंकार को चोट पहुंचाती है। इस पुल पर भी जाने वाले लोगों की अगर कोई कतार रहती, अगर क्षमता के बाद लोगों को रोक दिया जाता, तो कोई वजह नहीं थी कि ऐसा हादसा होता। सौ लोगों की क्षमता के पुल ने दो सौ भी झेल लिए थे, तीन सौ लोगों के चढऩे तक भी पुल नहीं टूटा था, शायद चार सौ भी बर्दाश्त हो गए थे, लेकिन उसके बाद फिर किसी समय पुल टूटा। हम रोजाना की जिंदगी में देखते हैं तो लोग छोटी सी मोपेड पर बोरे भर-भरकर सामान ले जाते हैं, तीन सवारियों के लिए बने ऑटोरिक्शा में लोग 15-20 मुसाफिर भरकर ले जाते हैं। जब देश का राष्ट्रीय चरित्र ही ऐसी अराजकता का हो गया है, तो यहां ऐसे हादसे होते ही रहेंगे, और यह अपने आपमें एक हैरानी की बात है कि ऐसे हादसे यहां रोज क्यों नहीं होते हैं?

हिन्दुस्तानियों के मिजाज में पहले तो कानून के खिलाफ, और फिर नियमों के खिलाफ जिस किस्म की हेठी भर दी गई है, उसी का नतीजा है कि सार्वजनिक जीवन खतरों से भर गया है। और सार्वजनिक नियमों के प्रति सम्मान लोगों में कतरे-कतरे में नहीं आ सकता, वह कुल मिलाकर ही आ सकता है। जो लोग मोटरसाइकिल पर तीन और चार लोग सवार होकर चलते हैं, उनसे दुनिया में कहीं भी कतार लगाने की उम्मीद नहीं की जा सकती, वे कहीं एटीएम के भीतर थूकेंगे, तो कहीं किसी लिफ्ट के भीतर, कहीं वे अंधाधुंध रफ्तार से मोटरसाइकिल चलाएंगे, तो कहीं चलाते हुए मोबाइल पर बात करते रहेंगे। नियमों के प्रति सम्मान, सार्वजनिक जीवन में दूसरों के प्रति सम्मान की सोच जब खत्म हो जाती है, तो लोग मनमाना हिंसक बर्ताव करने लगते हैं। अलग-अलग किस्म के हादसों में जिम्मेदारियां कुछ अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन जिस तरह इस पुल पर पहुंचने वाले पर्यटक गैरजिम्मेदार रहे, उसी तरह इस पुल को नियंत्रित करने वाली स्थानीय म्युनिसिपल भी गैरजिम्मेदार दिखती है जिसने कि सीमित क्षमता वाले पुल पर असीमित लोगों को जाने दिया। जब पूरे समाज में ही नियमों का सम्मान खत्म हो जाता है, तो म्युनिसिपल कर्मचारी भी उसी समाज का हिस्सा तो रहते हैं।

हिन्दुस्तान में लगातार बढ़ती हुई असभ्यता को देखें तो लगता है कि दुनिया के सभ्य देश आगे बढ़ रहे हैं, और हिन्दुस्तान अधिक असभ्य, अधिक अराजक होते चल रहा है। ऐसे समाज में किसी भी हादसे में, हिंसक हमले में, भीड़ के हाथों बेकसूर लोगों की मौत होती ही रहती है। जब तक हिन्दुस्तानियों का आम चरित्र अनुशासन का नहीं होगा, जब तक यहां पर लोग अपनी ड्यूटी की जिम्मेदारी पूरी करने के प्रति गंभीर नहीं रहेंगे, अलग-अलग हादसे होते रहेंगे। ऐसे तकरीबन हर हादसे को बारीकी से देखने पर यह समझ आता है कि ये सब रोके जा सकते थे, जिंदगियों को बचाया जा सकता था, लेकिन हमारे आम राष्ट्रीय चरित्र की वजह से यह संभावना खत्म हो गई है।
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