संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 3 नवम्बर : बुतों का यह मुकाबला हो रहा किनके मुंह के कौर छीनकर?

Posted Date : 03-Nov-2018



हिन्दुस्तान एक तरफ दुनिया की सबसे ऊंची सरदार-प्रतिमा पर खुशी और गौरव में डूबा हुआ है, दूसरी तरफ ब्रिटिश मीडिया में इस खबर को कुछ दूसरे तरीके से भी लिया जा रहा है। सरदार पटेल की यह प्रतिमा इसलिए अंतरराष्ट्रीय खबर है कि इसकी 597 फीट की ऊंचाई को तय करने का पैमाना यह रखा गया था कि वह अमरीका की विश्वविख्यात स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से दोगुनी ऊंची रहेगी। जब भारत में ही इसे एक अंतरराष्ट्रीय और विश्व मुकाबला बना दिया था, तो अब दुनिया के दूसरे देशों का भी यह हक बनता है कि वे इसे अपने पैमानों पर आंकें। ब्रिटेन में इस प्रतिमा पर खर्च किए गए 330 मिलियन पाऊंड को इस हिसाब से भी देखा जा रहा है कि जिन 56 महीनों में यह प्रतिमा बनी है, उन महीनों में ब्रिटेन ने भारत को 1176 मिलियन की मदद की है। ब्रिटिश करदाताओं के बीच यह चर्चा है कि भारत को दी गई मदद के बीच अगर भारत के पास एक प्रतिमा पर खर्च करने को इतनी रकम है, तो उसे कोई मदद क्यों दी जाए? एक ब्रिटिश सांसद पीटर बोन ने बीती रात कहा कि हमसे मदद लेने वाला देश प्रतिमा पर ऐसा खर्च करे यह पूरी तरह बेवकूफी का काम है, और इसे देखकर लोग पागल हो रहे हैं। इससे यह साबित होता है कि हमें भारत को कोई मदद नहीं देनी चाहिए, अगर वे ऐसी महंगी प्रतिमा का खर्च उठा सकते हैं, तो वे किसी मदद के हकदार नहीं हैं। 
अभी सरदार प्रतिमा का जश्न खत्म हुआ भी नहीं है कि उत्तरप्रदेश से खबर आ रही है कि वहां पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दीवाली के वक्त यह मुनादी कर सकते हैं कि अयोध्या में सरयू नदी के तट पर सौ-डेढ़ सौ मीटर ऊंची राम प्रतिमा बनाई जाएगी। और इस खबर के आते ही वहां के भगवा बयानबाजों ने तुरंत यह मांग शुरू कर दी है कि यह प्रतिमा सरदार प्रतिमा से ऊंची होनी चाहिए। उधर दूसरी तरफ पिछले दो दिनों में ही सरदार प्रतिमा के लोकार्पण के बाद यह खबर आ चुकी है कि वह कुछ ही समय तक दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा रहेगी, और इसके बाद जल्द ही मुम्बई के समुद्र तट पर पानी के बीच बनने वाला शिवाजी स्मारक इस प्रतिमा की ऊंचाई का रिकॉर्ड तोडऩे जा रहा है। लोगों को यह भी याद होगा कि किस तरह मायावती ने उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए अपने, कांशीराम के, और अंबेडकर के बुत बनवाकर राज्य के सैकड़ों करोड़ रूपए खर्च किए थे, और अपनी पार्टी के निशान हाथी की विशाल पत्थर-प्रतिमाएं बनवाकर अपनी फजीहत भी करवाई थी। 
आज जब इस देश में यह चर्चा चल रही है कि केन्द्र सरकार एक कानून बनाकर अयोध्या के विवादग्रस्त हिस्से में मंदिर बनवाए, या मंदिर बनाने का कानून बनाए, तो देश में कुछ समझदार और जिम्मेदार लोगों के बीच यह बात भी उठ रही है कि प्रतिमाओं पर खर्च होने वाले तीन-तीन हजार करोड़ रूपयों से देश में क्या-क्या हो सकता था? कितने स्कूल बन सकते थे, कितने अस्पताल बन सकते थे, और कितने करोड़ बच्चे कुपोषण से बाहर आ सकते थे। जो देश गंदगी, प्रदूषण, कुपोषण में विश्व कीर्तिमान स्थापित कर रहा हो, उसके सामने इन दिक्कतों से जूझना एक बड़ी चुनौती रहेगी, बजाय प्रतिमा बनवाने के। हजारों करोड़ की प्रतिमा बनवाने के लिए महज मंत्रिमंडल से एक प्रस्ताव लगता है, और बच्चों के मुंह से निवाला छीनकर विश्व रिकॉर्ड बनाया जा सकता है। प्रतिमाओं के बीच यह दौड़ कभी खत्म नहीं हो सकती, और राजनीतिक इस्तेमाल करने के लिए, वोटों की थप्पियों को प्रभावित करने के लिए प्रतिमाओं का ऐसा झूठा गौरव एक लगातार-मुकाबला बन सकता है। हिन्दुस्तान को अगर एक जिम्मेदार लोकतंत्र बनना है, तो उसे ऐसी बुतपरस्ती से उबरना होगा। जिन पार्टियों को, जिन संगठनों को अपने किसी आराध्य देव की प्रतिमा बनानी हो, उन्हें अपनी जमीन पर अपने खर्च से ऐसा काम करना चाहिए, न कि जनता की जमीन पर जनता के पैसों से इस काम को करें। हमारा ख्याल है कि ऐसी बर्बादी और फिजूलखर्ची रोकने के लिए किसी जनहित याचिका के रास्ते सुप्रीम कोर्ट को इसमें शामिल करना चाहिए, और यह सिलसिला खत्म करना चाहिए। राज्य या केन्द्र, किसी भी सरकार को गरीब जनता के खून-पसीने की ऐसी बर्बादी का हक लोकतंत्र में नहीं मिल सकता। 
- सुनील कुमार 




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