संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 5 नवम्बर : ईमानदारी की कम से कम एक बरस तो एक्सपायरी डेट रहे...

Posted Date : 05-Nov-2018



मध्यप्रदेश की चुनावी खबर है कि वहां भाजपा के मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल गौर अपने लिए और अपनी बहू के लिए भाजपा की टिकटें चाहते हैं, और न मिलने पर दो सीटों से निर्दलीय चुनाव लडऩे की धमकी भी दे दी थी, बाद में उन्होंने अपना बयान बदला।े दूसरी तरफ मध्यप्रदेश से ही एक बड़े भाजपा नेता का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वे यह कहते हुए बताए गए हैं कि किस तरह दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह करोड़ में भाजपा कुछ सीटों को बेच रही है। इस बात की सच्चाई कितनी है यह तो नहीं मालूम, लेकिन चुनाव के वक्त तमाम बड़ी पार्टियों में यही हाल रहता है। अभी सीबीआई में तीन करोड़ की रिश्वत की खबर आई तो लोगों ने सोशल मीडिया पर तंज कसा कि बसपा की मुखिया मायावती जितने में एक विधानसभा की टिकट बेचती हैं, उतने में सीबीआई बिक गई। 
अब खरीदी-बिक्री के ऐसे मामलों को चुनाव आयोग कुछ भी नहीं कर पाता है क्योंकि उसकी ताकत सड़कों पर नगदी और चुनावी तोहफों की आवाजाही पर नजर रखने तक सीमित है, और बंद कमरों में जब लोग अपनी आत्मा, ईमानदारी, और प्रतिबद्धता बेचते हैं, तो वह चुनाव आयोग के दायरे से बाहर होता है। ऐसे में भारतीय लोकतंत्र में दलबदल के दलदल और खरीद-बिक्री की गंदगी को रोकने का एक रास्ता चुनाव कानून में संशोधन करके लाया जा सकता है। अगर भारत में यह चुनाव कानून हो जाए कि लोग नामांकन के एक बरस पहले से अपनी पार्टी घोषित करें, और उसके बाद अगर उन्हें चुनाव लडऩा है, तो या तो निर्दलीय लड़ें, या न लड़ें। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक राजनीतिक दल दूसरी पार्टी की ऐसी गंदगी को लाकर अपने सिर पर बिठाने से परहेज नहीं करेंगे जो किसी भी तरह से चुनाव जीतने की ताकत रखती है। पार्टियां तो एक-दूसरे के मुजरिमों को भी लाकर अपने सिर पर बिठा लेती हैं, और चुनाव के वक्त तो यह सिलसिला बड़ा तेज हो जाता है। 
लंबे समय पहले हरियाणा में दलबदल ऐसे थोक में होता था कि वहां आयाराम-गयाराम की राजनीति कहलाती थी। आज भी दलबदल एक बड़ा हथियार है, और पार्टी से बगावत भी उतना ही बड़ा हथियार है। अगर नेताओं और पार्टियों में सिद्धांत और ईमानदारी जरा भी नहीं बचे हैं, तो देश के चुनाव-कानून में फेरबदल करके चुनावी राजनीति की गंदगी साफ करनी चाहिए। आज कानपुर के करीब गंगा अधिक गंदी है कि देश की चुनावी राजनीति, इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। देश के लोगों का यह हक कि वे जिन्हें प्रतिनिधि चुनने जा रहे हैं, उन पर ईमानदारी का एक न्यूनतम पैमाना तो थोप सकें। राजनीतिक दलों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे साल भर पहले से पार्टी में आए हुए लोगों में से ही किसी को उम्मीदवार बनाएं। सिर्फ वामपंथी दलों में ऐसी नैतिकता बची हुई है, और उस पार्टी की गिनती अब सफेद शेरों से भी कम रह गई है। बाकी पार्टियों पर कानून से ही ईमानदारी थोपनी होगी, और नेताओं पर बारह महीने पहले हलफनामा देने की शर्त लगानी होगी। ईमानदारी की कम से कम एक बरस की तो एक्सपायरी डेट रहे। 
- सुनील कुमार 




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