संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 5 दिसंबर : राज्यपाल-राष्ट्रपति का क्षमादान का अधिकार पूरी तरह अलोकतांत्रिक

Posted Date : 05-Dec-2018



सुप्रीम कोर्ट ने उत्तरप्रदेश के राज्यपाल राम नाईक के एक फैसले को पलटा है जिसमें उन्होंने उत्तरप्रदेश के एक ऐसे हत्यारे की सजा को माफ कर दिया था जिसने चार राजनीतिक हत्याएं की थी, और अभी वह सात साल ही सजा काट पाया था। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के इस क्षमादान को पूरी तरह असंवैधानिक मानते हुए, हैरानी और अफसोस जाहिर करते हुए इस फैसले को खारिज किया, और यह कहा कि वह इसके बारे में कुछ अधिक कहना नहीं चाहता। यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बहुत कुछ कह दिया है कि राज्यपाल का यह फैसला या तो कुछ कहने के लायक नहीं है, या फिर कुछ ऐसा कहने के लायक है जो कि सुप्रीम कोर्ट ने राजभवन की इज्जत को ध्यान में रखते हुए छोड़ दिया है। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम राज्यपाल और राष्ट्रपति के किसी भी मुजरिम को क्षमादान देने के ऐसे अधिकार के खिलाफ पहले भी लिखते आए हैं। लोकतंत्र में किसी के विवेक पर किसी जिंदगी और मौत को नहीं छोड़ा जा सकता। कई ऐसे मौके रहते हैं जब राष्ट्रपति के पास ऐसे मामले पहुंचते हैं जिनसे देश की राजनीति या साम्प्रदायिकता बहुत बुरी तरह जुड़ी रहती हैं। और ऐसे में केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति के ऊपर एक बहुत बड़ा दबाव भी रहता है कि जनभावनाओं को देखते हुए वे क्या फैसला लें। ऐसे में इतिहास गवाह है कि बहुत से फैसले क्षेत्रीयता, जातीयता, या राजनीतिक प्राथमिकता के आधार पर लिए गए। लोकतंत्र इस बात की इजाजत नहीं देता कि किसी व्यक्ति को तथाकथित ईश्वर जैसा दर्जा दे दिया जाए, और वह जिसकी चाहे उसकी जिंदगी बचा सके। लोकतंत्र और विवेकाधिकार साथ-साथ नहीं चल सकते। 
जब इस देश में जिला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ऐसे जानलेवा मामलों की सुनवाई कई-कई दशक तक चलती है, और अधिकतर मामलों में चौथाई सदी निकल जाती है, तब कहीं किसी दुर्लभ मामले में फांसी की नौबत आती है। जब देश के आधा दर्जन छोटे-बड़े जज बारी-बारी से ऐसे किसी मामले में फैसला ले चुके रहते हैं, तो केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति के हवाले ऐसा कोई फैसला कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही संस्थाएं वोटों पर जिंदा हैं, और वोटों की अपनी मजबूरियां होती हैं। चूंकि जज चुनकर नहीं आते हैं, इसलिए वे अधिक निष्पक्ष और ईमानदार फैसला ले सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के सामने उत्तरप्रदेश के राज्यपाल का यह फैसला इस शक्ल में आया कि उसे बड़ी कड़ी जुबान का इस्तेमाल करना पड़ा। इस फैसले को लेकर ही देश की न्याय व्यवस्था में ऐसे फेरबदल के लिए एक जनमत बनाने की जरूरत है जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट ही देश का आखिरी फैसला लेने वाली संस्था हो। जब कोई मामला कानूनी-अदालती कार्रवाई से गुजरकर धीमी रफ्तार से किसी तर्कसंगत-न्यायसंगत नतीजे तक पहुंचता है, तब राजभवन में बैठे हुए लोगों और राष्ट्रपति भवन में बैठे हुए किसी व्यक्ति को उस नतीजे को पलटने की इजाजत बिल्कुल भी नहीं देनी चाहिए। देश के कई राजभवनों में इतिहास ने भ्रष्ट लोगों को देखा हुआ है। ऐसे में किसी दिन यह भी हो सकता है कि राजभवन को रिश्वत देकर कोई मुजरिम जिंदगी खरीद ले। कानून के तहत चलने वाले मुकदमों में अदालत से परे किसी फैसले के लिए लोकतंत्र में कोई गुंजाइश नहीं है। 
-सुनील कुमार

 




Related Post

Comments