संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 6 दिसंबर : कांग्रेस अपने नेताओं और वकीलों को लेकर घर में एक नीति तय करे, वरना...

Posted Date : 06-Dec-2018



कांग्रेस पार्टी के कई नेता बड़े नाजुक मौकों पर इस तरह का बर्ताव करते हैं कि उन्होंने मानो कांग्रेस विरोधी किसी पार्टी से रिश्वत ले रखी हो। अब कांग्रेस अगुवाई वाली यूपीए सरकार के वक्त के फौजी-हेलीकॉप्टर घोटाले में जब एक विदेशी कंपनी के इस सौदे के बिचौलिए को मोदी सरकार भारत लेकर आई है, तो पिछले दो दिनों से यह खबर मीडिया में बनी हुई थी। वकील-नेताओं से लगी हुई कांग्रेस पार्टी के पास यह समझने और सम्हल जाने का खासा मौका था कि उसके सदस्य या पदाधिकारी इस मामले में वकालत करें, या न करें। यह पहला मौका नहीं है कि कांग्रेस के वकील ऐसे मामलों में महज पेशेवर अंदाज से काम करने लगते हैं जिन मामलों से देश की चुनावी राजनीति भी जुड़ी हुई है। अयोध्या का मामला हो तो उसमें एक तरफ से एक कांग्रेसी-नेता-वकील अदालत में खड़े हुए हैं, रिलायंस के अनिल अंबानी का मामला हो तो उसमें भी एक बड़े कांग्रेस नेता वकालत कर रहे हैं। वैसे तो राजनीति और वकालत इन दोनों को अलग-अलग करके भी चलने का एक तर्क, एक वकील के तर्क की तरह दिया जा सकता है, लेकिन देश के आम नागरिक को यह समझ नहीं पड़ता कि जो वकील कमा-कमाकर अरबपति बन चुके हैं, और कम से कम बेरोजगार और भूखे नहीं हैं, वे ऐसे मामलों को लेने के पहले अपनी पार्टी के हितों को क्यों नहीं देखते? 
वैसे तो बात महज कांग्रेस की नहीं है, भाजपा के भी मंत्री, सांसद, और नेता रहे हुए राम जेठमलानी ने भी बलात्कारियों से लेकर हत्यारों तक के मामले लिए जिनसे उनकी पार्टी को असुविधा भी हुई, लेकिन आज का मौका भारत में भाजपा की विरोधी पार्टियों को देशद्रोही और गद्दार साबित करने के माहौल का मौका है, और ऐसे में कांग्रेस को अधिक सावधान रहने की जरूरत है। सोशल मीडिया ड्रिप-इरिगेशन के ऐसे पाईप की तरह है जिसमें पेट्रोल डालकर देश के हर छह इंच के हिस्से पर बूंद टपकाई जा सकती है। ऐसे माहौल में कांग्रेस जैसी पार्टी को एक नीतिगत फैसला लेना चाहिए कि उसके नेता-पदाधिकारी वकालत करते हुए किन मामलों को लें या किन मामलों को न लें। अगर पार्टी ऐसा तय नहीं करती है, तो देश की जनता की भावनाओं को अदालत में किसी कानूनी मुद्दे की तरह सही या गलत करार नहीं दिया जा सकता। जिस कांग्रेस पार्टी पर भाजपा इस हेलीकॉप्टर सौदे में दलाली खाने का आरोप लगा रही है, उस कांग्रेस पार्टी का वकील अगर दलाल की तरफ से वकालत करता है तो इससे जनता के बीच कांग्रेस की साख तो चौपट होती ही है। 
कांग्रेस पार्टी का जिक्र करना जरूरी इसलिए भी है कि इसके नेता हर नाजुक मौके पर भाजपा से पैसे खाकर अनर्गल प्रलाप करते हुए लगते हैं। कभी कोई नेता मोदी को नीच कहता है, कभी कोई मोदी के बाप का नाम पूछता है, कभी कोई मोदी की जात पूछता है, कभी कोई मोदी को चायवाला कहकर हिकारत से बात करता है, और कभी कोई मोदी की मां को लेकर अपमानजनक लहजे में कोई बात कहता है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस के नेता एक पुरानी कहानी के तीन भाईयों की तरह बर्ताव कर रहे हैं जिनकी शादी उनके तुतलाने की वजह से नहीं हो पा रही थी। ऐसे में उनके पिता ने कन्याओं के एक पिता के आने पर अपने बेटों को सख्त चेतावनी दे रखी थी कि चाहे कुछ भी हो जाए वे विनम्रता का लबादा ओढ़े हुए अपना मुंह बंद रखें और किसी भी हालत में कुछ न बोलें। लेकिन जब कन्याओं का पिता आता है, और साथ बैठता है तो कमरे में आए हुए एक चूहे को लेकर बारी-बारी से तीनों भाई कुछ न कुछ गैरजरूरी बात बोलते हैं जिसे बोले बिना काम चल सकता था। आज कांग्रेस के नेता हर चुनाव के मौके पर इसी किस्म की कई गैरजरूरी, ओछी, अवांछित, और बकवास बात करने लगते हैं। ऐसा करते हुए वे ऐसी कोशिश करते हुए दिखते हैं कि उनका भी अस्तित्व है, और उन्हें पूरी तरह अनदेखा नहीं किया जा सकता। वे बकवास करके अपनी मौजूदगी का एहसास कराने लगते हैं। 
कांग्रेस पार्टी जनभावनाओं को लेकर अपने नेताओं और अपने वकीलों के गैरजिम्मेदार उतावलेपन को लेकर एक घरेलू नीति तय करे, वरना ऐसी हरकतों के चलते जनभावनाएं आसानी से तय हो रही हैं। 
- सुनील कुमार 




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