विशेष रिपोर्ट

कसडोल के गांवों में लगे ताले

Posted Date : 06-Jan-2019



10 हजार से ज्यादा रोजी की तलाश में बाहर
गोरेलाल तिवारी
कसडोल, 6 जनवरी (छत्तीसगढ़)।
कसडोल तहसील क्षेत्र के 230 ग्रामों से अब तक अनुमानित 10 हजार से अधिक गरीब मजदूर खाने-कमाने दीगर प्रांत चले गए। जिससे गांवों के कई घरों में ताले लगे नजर आते हैं। सरकारी मजदूरी योजना के अभाव में गरीबों को रोजी-रोटी की तलाश में शहरी क्षेत्रों तथा अन्य प्रांतों में परिवार सहित जाने के लिए मजबूर हंै। 
शहीद के गांव सहित वन क्षेत्रों से सर्वाधिक
कसडोल तहसील क्षेत्रों के प्राय: सभी क्षेत्रों से कमाने-खाने दीगर प्रांत जाने की खबर है, किंतु मैदानी क्षेत्रों के बजाय वन क्षेत्रों से सर्वाधिक जाने की खबर है। मैदानी क्षेत्रों के कसडोल, पीसीद, सेल, असनीद, कोसमसरा, सेमरिया, मोहतरा, चरौदा, सर्वा, टुंड्रा आदि 50 ग्रामों से 3 हजार से अधिक लोग जा चुके हैं।
 कसडोल से ली गई जानकारी के अनुसार 500 से अधिक गरीब मजदूर किसान जा चुके हैं। सबसे ज्यादा शहीद वीर नारायण सिंह के सोनाखान, भुसड़ीपाली, नवागांव, अर्जुनी, महराजी, कंजिया, चिखली, देवतराई पंचायतों के 30 ग्रामों से अनुमानित 2 हजार से ऊपर मजदूर परिवार जा चुके हंै। इसी तरह राजदेवरी, थरगांव, बिलारी, छाता, नगरदा, कुरमाझर, कुशगढ़, कुशभांठा, सोनपुर, बरपानी, चांदन, अमरूवा, रंगोरा, दुमरपाली, बया इलाके के 42 गांव से बड़ी संख्या में जाने की खबर है। इसी तरह जंगल क्षेत्र के ही बार अभ्यारण्य क्षेत्र के बार चरौदा, आमगांव, ढेबी, मुड़पार, रवान, भिंभोरी 22 गांव तथा गुडागढ़, बोरसी, बगार, परसदा, पुटपुरा, अर्जुनी, बलदाकछर 25 गांवों से भी मजदूरों के दीगर प्रांत जाने की खबर है। कुल मिलाकर उक्त ग्रामों से 5 से 7 हजार मजदूरों के जाने का अनुमान है।
रोजगारमूलक कामों का अभाव
क्षेत्र में मजदूरों के अन्य प्रांत जाने की असली वजह रोजगार मूलक कार्यों का पूर्णत: अभाव है। एक तो इस क्षेत्र में सरकार की कोई योजना नहीं है, जिसमें गरीब मजदूर परिवारों को रोजी के व्यापक काम मिल सके। शासकीय विभागों जल संसाधन, लोक निर्माण आदि सभी विभागों में ठेके प्रथा से काम कराया जाता है। जिसमें ठेकेदारों द्वारा मशीनों का उपयोग कराया जाता है। 
वन विभाग में पिछले साल कैम्पा आदि अन्य मदों से करोड़ों का काम कराया गया। कटवाझर, डाढ़ा खार, खुदमुड़ी, परसदा, पुटपुरा, मुढ़ीपार, अर्जुनी, बलदाकछार, औरई, बरबसपुर आदि ग्रामों में करोड़ों के काम हुए। बताया गया कि सभी ग्रामों में गरीब मजदूर खाली बैठे रहे, किन्तु उन्हें काम नहीं दिया गया। यहां तक कि वन परिक्षेत्र सोनाखान, अर्जुनी, देवपुर, लवन, कोठारी बार में मिट्टी के काम को भी जेसीबी से कराया गया है। यही वजह है कि गरीब लघु एवं सीमांत कृषक मजदूर परिवार जिन्हें रोज कमाना और रोज खाना होता है, काम के तलाश में अन्यत्र जीवकोपार्जन के लिए घर छोड़कर जाना पड़ता है।
क्षेत्र से 10 हजार से अधिक मजदूर अन्य प्रांत जा चुके हैं। क्षेत्र में श्रम मूलक विकास कार्यों का पूर्णत: अभाव है। यही वजह है कि काम की तलाश में प्रदेश के शहरी क्षेत्रों तथा व्यापक स्तर पर अन्य प्रांतों दिल्ली, गुजरात, यूपी, हरियाणा, पंजाब, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, आंध्रप्रदेश आदि में जाने की जानकारी मिली है। 
कसडोल तहसील क्षेत्र में कसडोल, राजादेवरी, गिधौरी में जहां थाना है, वहीं गिरौदपुरी, सोनाखान बया लवन में पुलिस चौकी स्थापित है। इसके अलावा असनीद, नवगांव, देवपुर, महराजी, अर्जुनी, सलिहा, कुम्हारी, बरपानी, चांदन, देवगांव, कोरकोटी, पकरीद, चरौदा, बार रवाना बडग़ांव, दोन्द, अवरई, बरबसपुर, ठकुरदिया, कोसमसरा आदि चप्पे-चप्पे पर वन विभाग का बेरियर है। जिसके बावजूद मजदूर दीगर प्रांत जा रहे हैं।  
पूस पुन्नी के बाद भारी तादाद में अन्य प्रांत जाने की तैयारी
क्षेत्र में मजदूर दलालों का गांव-गांव गरीब परिवारों से लगातार संपर्क होने सैकड़ों दलालों के सम्पर्क की खबर है। क्षेत्र से लगातार गांव पहुंच चारपहिया वाहनों, मेटाडोर से कमाने खाने अन्य जगह जाने की खबर है। ग्रामीण अंचलों से मिली खबर के अनुसार दलालों तथा मजदूरों के बीच गोपनीय सांठगांठ होती है कि रात को वाहन मुहैया कराकर रातोंरात रेलवे स्टेशन पहुंचकर अन्य प्रांत भेजने सफल हो जाते हैं। 
छत्तीसगढ़ का प्रमुख त्यौहारों में एक छेरछेरा पुन्नी 21 जनवरी के बाद हजारों की क्षेत्र से जाने की तैयारी को अंजाम दिया जा रहा है। सैकड़ों दलाल गांव-गांव गरीब मजदूरों के घर पहुंचकर तैयार करने में जुटे हुए हैं। 
गौरतलब हो कि कसडोल तहसील क्षेत्र में करीब 50 हजार पंजीकृत कृषक मजदूर हैं, जो लघु एवं सीमांत कृषक की गणना में आते हैं। मजबूरी में उनको घर बार छोड़कर अन्य प्रांतों में रोजी रोटी की तलाश में जाना पड़ता है। पंचायतों तथा जनपद पंचायत में मजदूरों के जाने का कोई रिकॉर्ड नहीं है। मजदूरों को दलाल गैरकानूनी रूप से प्रति वर्ष दीगर प्रांत भेजते हैं, जिसमें मजदूरों का शोषण किया जाता है।




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