संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का विशेष संपादकीय, 8 जनवरी : अनारक्षित-आरक्षण सही, पर बाकी तबकों पर से भी क्रीमीलेयर खत्म हो..

Posted Date : 08-Jan-2019



-सुनील कुमार

केन्द्र की मोदी सरकार ने कल एक अभूतपूर्व हड़बड़ाहट में यह तय किया है कि अनारक्षित तबके के भीतर के आर्थिक-कमजोर लोगों को पढ़ाई के दाखिले और सरकारी नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण दिया जाएगा। आज शायद संसद में इसे लेकर मोदी सरकार एक संविधान संशोधन ला रही है जिसके बाद सामान्य कहे जाने वाले अनारक्षित वर्ग के गैरगरीब लोगों के लिए स्कूल-कॉलेज और सरकारी नौकरियों में मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के तहत बचे पचास फीसदी अवसरों में से चालीस फीसदी रह जाएंगे, और दस फीसदी सामान्य-सीटें गरीबों के लिए आरक्षित रहेंगी। अनारक्षित वर्ग के भीतर आरक्षण का यह एक बिल्कुल ही नया फार्मूला है जो कि आर्थिक आधार पर बनाया गया है। ऐसा लगता है कि मोदी सरकार आज देश के किसानों के बीच कांग्रेस की एकदम से बढ़ी साख से हड़बड़ाई हुई है, और देश का चौकीदार रफाल विमानों की खरीदी पर उठे सवालों से भी कुछ असुविधा में है। शायद इसलिए भी सौ दिन बाद खड़े चुनाव में अपनी हालत सुधारने के लिए एनडीए सरकार यह एक बड़ा फैसला ले रही है जिससे सवर्ण तबके के भीतर के निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों को ऐसा लगेगा कि उनके लिए कुछ किया गया है। 

सरकार द्वारा कल दी गई जानकारी के मुताबिक आठ लाख रूपए सालाना से कम आय के परिवारों को इस सवर्ण-आरक्षण का फायदा मिलेगा। इस आय वर्ग को तय करने के लिए खेती की जमीन या शहरी मकान की जमीन के कुछ पैमाने भी तय किए गए हैं, और वह सारी जानकारी समाचार में है, इसलिए यहां पर उसे खुलासे से लिखना जरूरी नहीं है। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि केन्द्र का यह आरक्षण किस तबके के भीतर के कितने हिस्से पर लागू होगा? आज सरकार ने ऐसी कोई जानकारी दी नहीं है, लेकिन मोटे तौर पर इस तस्वीर को समझने के लिए ऐसा एक अंदाज लगाना ठीक होगा कि अनारक्षित तबके के भीतर का यह दस फीसदी आरक्षण अनारक्षित तबके के भीतर के तकरीबन नब्बे फीसदी लोगों पर लागू होगा। आज अनारक्षित तबके के भीतर भी कुल दस फीसदी लोग ही आठ लाख रूपए सालाना कमाई से अधिक वाले होंगे, या जमीन-मकान का जो पैमाना है, उसे पूरा करने वालेह होंगे। ऐसे में अनारक्षित तबके के उन तमाम कमजोर लोगों को इस दस फीसदी का फायदा मिलेगा जो बाकी संपन्न अनारक्षित लोगों के मुकाबले दाखिले या नौकरी की तैयारी नहीं कर पाते। आज अनारक्षित तबके के भीतर जो पहली बेचैनी इस दस फीसदी आरक्षण को लेकर दिख रही है, वह अपने लिए संभावनाओं के कम होने की है, और जायज भी है, लेकिन सामाजिक न्याय के लिए पहली नजर में ऐसा लगता है कि अनारक्षित तबके के लिए संभावनाओं पर से दस फीसदी हिस्से से क्रीमीलेयर को हटाना बहुत बड़ा बेइंसाफ नहीं लग रहा है, खासकर तब जब वह शायद नब्बे फीसदी आर्थिक कमजोर लोगों को फायदा पहुंचाएगा। 

मोदी सरकार का यह फैसला अपने गुण-दोष पर विश्लेषण पाने के बजाय, नीयत और वक्त को लेकर विश्लेषण पा रहा है। यह लोकतंत्र में एक संपूर्ण बहस के लिए तो ठीक है, लेकिन उस बहस के बाद, उस बहस से परे यह भी देखने की जरूरत है कि अनारक्षित तबके के भीतर नब्बे फीसदी आबादी को दस फीसदी हिस्से पर आरक्षण देना किस तरह की सोच है। हम पहले भी इस बात को बार-बार लिखते आए थे कि दलित, आदिवासी, या ओबीसी, किसी भी किस्म के आरक्षित तबके के भीतर से क्रीमीलेयर को आरक्षण के फायदों से परे करना जरूरी है। एक सीमा से अधिक आय, एक सीमा से अधिक संपत्ति, एक सीमा से ऊपर का सरकारी या राजनीतिक ओहदा, लोगों को आरक्षण के फायदे से बाहर करने का होना चाहिए। आज हालत यह है कि सारे आरक्षित तबकों के भीतर आरक्षण का अधिकतर फायदा उन तबकों की वह क्रीमीलेयर ले जाती है जो अपनी संपन्नता और ताकत की वजह से दाखिले और मुकाबले के इम्तिहानों के लिए बेहतर तैयारी कर पाती है। जिस सामाजिक समानता की नीयत से आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई थी, वह इससे शिकस्त पा रही है, और घूम-फिरकर एक छोटा तबका ही आरक्षण के अधिकतर फायदों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पा रहा है। लेकिन क्रीमीलेयर को आरक्षण के फायदों से वंचित करने की बहस इसलिए जोर नहीं पकड़ पाती क्योंकि सरकार और संसद में, न्यायपालिका और मीडिया में, राजनीतिक दलों और दूसरे ताकतवर तबकों में इसी क्रीमीलेयर का काबू है, और इसे फायदे से बाहर करने का मतलब किसी बड़े जज, किसी भी सांसद या विधायक, किसी भी आईएएस-आईपीएस, किसी भी करोड़पति दलित-आदिवासी-ओबीसी के बच्चों को आरक्षण के फायदों से परे करना होगा। इसलिए आज नीति बनाने, उस पर फैसला लेने, और उस पर अदालती नुक्ताचीनी करने वाले तमाम लोगों के लिए क्रीमीलेयर को हटाना आत्मघाती होगा, और इसीलिए उस पर कोई चर्चा नहीं हो पाती है।  

पिछले विधानसभा चुनाव में खासकर मध्यप्रदेश और राजस्थान में सवर्ण तबके की यह नाराजगी मोदी सरकार के खिलाफ मुखर थी कि एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटकर केन्द्र सरकार ने फिर से कड़े प्रावधान लागू किए थे जिनके खिलाफ सवर्ण तबका हमेशा से बोलते आ रहा था। चुनाव में ऐसा माहौल बना कि सवर्णों ने भाजपा के खिलाफ वोट डाला। इसलिए भी सवर्ण तबके की बहुसंख्यक आबादी को खुश करने के लिए अनारक्षण में आरक्षण का यह नया फैसला लिया गया है। पहली नजर में यह फैसला सैद्धांतिक रूप से हमें ठीक लग रहा है, और यह आरक्षण की अदालती या संवैधानिक सीमा के बाहर जाएगा, या नहीं, यह तो आने वाले दिनों में अदालत में ही साबित होगा। इसके लिए जो संविधान संशोधन होना है, उसे सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ सही पाएगी या नहीं, यह भी आगे की बात है। फिलहाल सरकार की नीयत की जो बात है, उस पर राजनीतिक और चुनावी बहस जारी है। लेकिन इस बीच हम क्रीमीलेयर को दस फीसदी संभावनाओं से दूर करने को ठीक फैसला पाते हैं। 

अब यह भी देखना होगा कि आठ लाख रूपए सालाना आय या जमीन-मकान के मालिकाना हक के लिए भ्रष्ट सरकारी मशीनरी से जो सर्टिफिकेट लोगों को लगेंगे, वे कितने सही होंगे, और कितने गलत होंगे? दूसरी बात यह कि हिन्दुस्तान में आज नौकरीपेशा लोग तो आठ लाख रूपए की सालाना कमाई को छुपा नहीं सकते, सरकार या गैरसरकारी कंपनियों में लोगों की कमाई अच्छी तरह दर्ज रहती है, लेकिन कारोबारियों की कमाई, स्वरोजगार में लगे लोगों की कमाई का कोई ठीक हिसाब-किताब रहता नहीं है। ऐसे में संगठित वेतनभोगी सबसे पहले क्रीमीलेयर में गिनाएंगे, और अपने बच्चों को इस आरक्षण का फायदा दिलाने के लिए लोग जमीन-मकान को भी दूसरों के नाम करने लगेंगे। चूंकि देश की व्यवस्था इतनी भ्रष्ट है, इसलिए ऐसी तमाम तिकड़में मुमकिन बनी रहेंगी। इसके बीच ही किस तरह आरक्षण लागू हो पाएगा, और सही हकदार ही उस तक पहुंच पाएंगे, यह देखना होगा। हम इस मौके पर एक बार फिर यह दुहराना चाहेंगे कि हर आरक्षित तबके के भीतर क्रीमीलेयर को अपात्र बनाने के लिए पैमाने तय करके संविधान संशोधन करना चाहिए ताकि गिने-चुने चुनिंदा लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी फायदा न पाते रहें, और उन तबकों के बाकी लोगों को उसका फायदा मिल सके।




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