विशेष रिपोर्ट

बस्तर के इस गांव में 25 बरस में ही झुक रही कमर

Posted Date : 08-Jan-2019



फ्लोराइड का कहर, 40 फीसदी 40 बरस में बूढ़े
जगदलपुर, 8 जनवरी (छत्तीसगढ़)। बीजापुर जिला मुख्यालय से तकरीबन 60 किमी दूर भोपालपट्नम का गेर्रागुड़ा बस्तर का एक ऐसा गांव है, जहां पर युवा 20 से 25 वर्ष की आयु में ही लाठी लेकर चलने को मजबूर  हैं और 40 साल के पड़ाव तक बूढ़े होने लग जाते हैं। पूरा गांव फ्लोराइड की मार सह रहा है। साल भर पहले  साफ पानी के लिए हर घर नल कनेक्शन तो दिया गया पर आपूर्ति अब तक नहीं हो सकी है।
मामले में सीएमएचओ डॉ बीआर पुजारी का कहना है कि ग्रामीणों के शिकायत के बाद गांव में कैम्प लगाकर लोगों का इलाज किया गया था और कुछ लोगों को बीजापुर भी बुलाया गया था, चूंकि इस गांव के पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण हड्डियों में टेड़ापन, कुबड़पन और दांतों में पीलेपन के साथ सडऩ की समस्या आती है। जिसका इलाज सिर्फ  शुद्ध पेयजल से ही हो पाएगा। शिकायत के बाद गांव के अधिकांश हैंडपंपों को सील करवा दिया गया था।
वहीं फ्लोराइड समस्या के निदान के लिए पीएचई द्वारा निर्मित वाटर ओवरहेड टैंक से पेयजल आपूर्ति ना होने की बात पर ईई जगदीश कुमार का कहना है कि विभाग द्वारा टैंक के निर्माण पश्चात पंचायत को हैण्डओवर किया जा चुका है। आपूर्ति  की जिम्मेदारी अब पंचायत की है फि र भी अगर पानी की सप्लाई नहीं की जा रही है तो विभाग इसे अवश्य संज्ञान में लेगा।
भोपालपट्नम के गेर्रागुड़ा का पानी जहर साबित हो रहा है।  यहां के हैंडपंपों और कुओं से निकलने वाले पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण पूरा गांव का गांव समय से पहले ही अपंगता के साथ-साथ लगातार मौत की ओर बढ़ रहा हैं।इस गांव में आठ वर्ष की  उम्र से लेकर 40 वर्ष तक का हर तीसरे व्यक्ति में कुबड़पन, दांतों में सडऩ, पीलापन और बुढ़ापा नजर आता है। 
यहां के सेवानिवृत्त शिक्षक तामड़ी नागैया, जनप्रतिनिधि नीलम गणपत और फ्लोराइय युक्त पानी से पीडि़त तामड़ी गोपाल का कहना है कि गांव में पांच नलकूप और चार कुएं हैं, इनमें से सभी नलकूपों और कुओं में फ्लोराइड युक्त पानी निकलता है।
लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने सभी नलकूपों को सील कर दिया था लेकिन गांव के लोग अब भी दो नलकूपों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि हर व्यक्ति शहर से खरीदकर पानी नहीं ला सकता है, इसलिए यहीं पानी पीने में इस्तेमाल होता है। गर्मी के दिनों में कुछ लोग तीन किमी दूर इंद्रावती नदी से पानी लाकर उबालकर पीते हैं।  
तामड़ी नागैया का कहना है कि  तीस साल पहले तक यहां के लोग कुएं का पानी पीने के लिए उपयोग किया करते थे, परंतु जब से नलकूपों का खनन किया गया तब से यह समस्या विराट रूप लेने लगा और अब स्थिति ऐसी है कि गांव की 40 फ ीसदी आबादी 25 की उम्र में लाठी के सहारे चलने, कुबड़पन को ढोने और 40 वर्ष की अवस्था में ही बुढ़े होकर जीवन जीने को मजबूर है। लगभग 60 फ ीसदी लोगों के दांत पीले होकर सडऩे लगे हैं।
पूरा गांव  चट्टान पर बसा हुआ है  बताया जा रहा है कि इसी वजह है कि पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है और इस भू गर्भ से निकलने वाला पानी यहां के ग्रामीणों के लिए जहर बना हुआ है।
जानकार बताते हैं कि वन पार्ट पर मिलियन यानि पीपीएम तक फ्लोराइड की मौजूदगी इस्तेमाल करने लायक है, जबकि पीपीएम को मार्जिनल सेप माना गया है। डेढ़ पीएम से अधिक फ्लोराइड की मौजूदगी को खतरनाक माना गया है और गेर्रागुड़ा में डेढ़ से दो पीपीएम तक इसकी मौजूदगी का पता चला है।
इस समस्या से निजात पाने के लिए एक साल पहले पीएचई विभाग ने इस गांव में एक ओवरहेड टैंक का निर्माण कर गांव के हर मकान तक पाइप लाइन विस्तार के साथ नल कनेक्शन भी दे रखा है, परंतु  अब तक  आपूर्ति नहीं हुई है। गांव के संपन्न लोग किसी तरह भोपालपटनम स्थित वाटर प्लांट से शुद्ध पेयजल खरीदकर  लेते हैं, परंतु गरीब तबके के लोग अब भी फ्लोराइड युक्त पानी पीने मजबूर हैं।

 




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