संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 9 जनवरी : आज छोड़े सुबूत भी दस-बीस बरस बाद पकड़ेगी टेक्नालॉजी

Posted Date : 09-Jan-2019



कल एक खबर आई थी कि किस तरह अमरीका में एक लड़की ने अपने जन्म के तीस बरस बाद नामालूम पिता को इंटरनेट पर अपना डीएनए डालकर ढूंढ निकाला। इन दिनों इंटरनेट पर डीएनए से वंशवृक्ष बनाने की बहुत सी वेबसाइटें काम करती हैं जिनसे लोग अपने पुरखों और रिश्तेदारों को ढूंढ सकते हैं। लेकिन टेक्नालॉजी का एक खतरा किस तरह रहता है, यह खबर आज सामने आई है। एक ऐसे स्कूल शिक्षक को अमरीका में अभी उम्रकैद हुई है जिसने एक बलात्कार, और उसके बाद कत्ल किया था। मौके पर पुलिस को मिले डीएनए की जांच करते हुए दशकों बाद पुलिस को वह डीएनए वंशवृक्ष वाली एक वेबसाइट पर एक ऐसी युवती के डीएनए से मैच करता हुआ मिला, जो कि हत्यारे की बहन निकली। पुलिस पहले उस डीएनए से बहन तक पहुंची, और फिर बहन के रास्ते उस बलात्कारी-हत्यारे तक। हत्यारे ने तो कोई ऐसी सीधी चूक नहीं छोड़ी थी जिससे पुलिस उस तक पहुंच जाती, लेकिन हत्यारे की बहन का डीएनए वेबसाइट पर था, और पुलिस ने इंटरनेट पर मौजूद लोगों के डीएनए से मेल कर-करके यह तलाश पूरी की। 

टेक्नालॉजी तरह-तरह के सुराग छोड़ती है, और सुराग ढूंढती भी है। एक एसएमएस, या एक टेलीफोन कॉल के रास्ते लोग जिस तरह मुजरिम तक पहुंच जाते हैं, वह देखना हक्का-बक्का करता है, और याद दिलाता है कि दुनिया का एक सबसे बड़ा आतंकी-हमलावर, ओसामा-बिन-लादेन, इतने बरस इसलिए अमरीका की सारी ताकत से बचा रहा कि उसने कोई फोन-इंटरनेट इस्तेमाल नहीं किया था। जिस अमरीकी तकनीक की बात हम यहां कर रहे हैं, वह भारत में आम लोगों के इस्तेमाल के लिए भी यहां की भुगतान-क्षमता के मुकाबले कुछ महंगी है, और यहां की जांच एजेंसी की क्षमता से कुछ परे भी है। लेकिन भारत में भी आधार कार्ड, मोबाइल के सिमकार्ड, मोबाइल हैंडसेट, लैपटॉप, सोशल मीडिया अकाऊंट, एटीएम या क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल जैसी बहुत सी बातें हैं जिनसे मुजरिम पकडऩे में आसानी हो जाती है। दूसरी तरफ शहरों में जिस रफ्तार से चौराहों पर कैमरे लग रहे हैं, आधुनिक और बड़ी इमारतों में कैमरे लग रहे हैं, उनसे भी टेक्नालॉजी जुर्म पकडऩे में मदद कर रही है। यह सिलसिला निजी जिंदगी की निजता को तो घटा रहा है, लेकिन जुर्म सुलझाने की संभावना बढ़ा भी रहा है। 

सार्वजनिक जगहों पर, जिनमें अब सोशल मीडिया भी शामिल है, लोग ऐसे सुबूत छोड़ देते हैं जिससे जांच एजेंसियां उनके बारे में जानकारी जुटा लेती हैं, और उन्हें घेर पाती हैं। विकसित देशों में आज जब लोग अपनी कंपनी से छुट्टी लेते हैं, या किसी इलाज-बीमा कंपनी से इलाज का भुगतान लेते हैं, तो उनके सोशल मीडिया अकाऊंट देखकर कंपनियां बहुत से मामलों में उनका झूठ पकड़ लेती हैं, क्योंकि जिन दिनों में वे अपने को बीमार बताते हैं, उन्हीं दिनों में वे अपने सैर-सपाटे की तस्वीरें भी पोस्ट करते हैं। डीएनए-वंशावली या वंशवृक्ष के रास्ते अपने पुरखों को ढूंढना, अपने रिश्तेदारों तक पहुंचना, या मुजरिमों तक पहुंचना एक नया सिलसिला है जो कि आगे चलकर जोर पकडऩे वाला है। अब मुजरिम खुद अपना डीएनए इंटरनेट पर पोस्ट न भी करे, उसके रिश्तेदार अपना डीएनए पोस्ट करते हैं, तो उससे भी सुबूतों के डीएनए की मैचिंग हो सकती है, हो रही है, और उस बुनियाद पर सजा भी हो रही है। टेक्नालॉजी आज सामने आ रही है, लेकिन लोग अपने जुर्म या अपने गलत काम के सुबूत इसका अंदाज हुए बिना दस-बीस बरस पहले छोड़ चुके थे, और वे अब पकड़ में आ रहे हैं। आज जिस टेक्नालॉजी की आम लोगों को कल्पना नहीं है, वह टेक्नालॉजी भी दस-बीस बरस बाद सामने आ सकती है, इसलिए बेहतर यही है कि लोग आज भी अपनी हरकतों को ठीक रखें।


- सुनील कुमार 




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