संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 10 जनवरी : खर्च की सरकारी नीतियों को एक बार तौलने की जरूरत

Posted Date : 10-Jan-2019



अभी सुप्रीम कोर्ट और देश के एक, तमिलनाडू के, हाईकोर्ट के दो आदेश बाकी राज्यों को भी देखने चाहिए। हो सकता है कि अभी ये फैसले की शक्ल में सामने नहीं आए हैं, और मामले की सुनवाई के दौरान अदालत का एक हिस्सा हैं, या अदालत की लगाई रोक हैं, लेकिन देश के बाकी राज्यों में भी ऐसे अदालती नजरिये से चीजों को तौल लेने की जरूरत है ताकि बर्बादी होने के बाद उसमें सुधार और मरम्मत की मशक्कत न करनी पड़े। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले जिंदगी भर देने के खिलाफ एक आदेश किया था। यह आदेश जब बिहार में नहीं माना गया, तो पटना उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को एक नोटिस जारी करके कहा है कि भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को किस आधार पर बंगले दिए गए हैं? जब अदालत के सामने इनकी हिफाजत का तर्क रखा गया तो जज ने नाराज होते हुए कहा कि ऐसा है तो भूतपूर्व मुख्यमंत्री जमीन के नीचे बंकर बना लें। 

हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश देश के सभी राज्यों पर लागू होता है, चाहे वह किसी एक राज्य के संदर्भ में ही क्यों न दिया गया हो। यह मामला ऐसा नहीं है जो कि किसी एक राज्य की स्थानीय परंपरा का हो। हर राज्य में भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए बंगलों की एक महंगी समस्या है जिसका बोझ गरीब जनता को ही उठाना पड़ता है। देश में गरीबी का हाल यह है कि अभी कल जब अनारक्षित तबके के भीतर गरीबों के लिए आरक्षण की बात आई, तो यह बात भी उठी कि इस पैमाने पर तो अनारक्षित तबके के नब्बे फीसदी लोग आ जाएंगे। जिस देश में सामान्य तबके में गरीबी का यह हाल है उस प्रदेश में किसी भी वर्तमान को भी महंगे बंगलों का कोई हक नहीं होना चाहिए। दूसरी तरफ भूतपूर्व तो संख्या में बढ़ते चल सकते हैं, और हर पांच बरस में एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री का जन्म हो सकता है। ऐसे में इन सब लोगों को, या इसी किस्म की पात्रता वाले विधानसभा अध्यक्षों, या दूसरे लोगों को कब तक और क्यों सरकारी सहूलियतें दी जाएं? 

चेन्नई हाईकोर्ट ने तमिलनाडू सरकार के एक फैसले पर रोक लगाई है जिसमें हर राशन कार्ड पर एक हजार रूपए पोंगल उपहार दिया जाना था। इसके खिलाफ एक जनहित याचिका दायर हुई जिसमें कहा गया कि सरकारी पैसे का इस्तेमाल गैरगरीबों के लिए कैसे किया जा सकता है? कैसे गरीबी की रेखा के ऊपर के लोगों को सरकारी पैसे पर कोई उपहार दिया जा सकता है? इस फैसले को लेकर छत्तीसगढ़ में दो सवाल उठते हैं। पिछली रमन सरकार ने प्रदेश के सारे नागरिकों के लिए स्वास्थ्य-बीमा लागू किया था। इसमें संपन्न तबके के लोगों को भी इसका फायदा लेने की छूट थी। अब इसका भुगतान तो जनता के पैसों से हो रहा था, और उसमें संपन्न लोगों को कैसे कोई राहत-रियायत दी जा सकती थी? दूसरा मुद्दा जो छत्तीसगढ़ पर लागू होता है वह है मौजूदा भूपेश-सरकार का किसान-कर्जमाफी का। इसके तहत गरीब-अमीर सभी तरह के वे किसान राहत पा चुके हैं जिन्होंने सहकारी बैंकों से अल्पकालीन कर्ज लिया था। अब सवाल यह उठता है कि कर्जमाफी की पात्रता तो गरीबों को ही होनी चाहिए, और गरीबों के खजाने से सरकार अमीर किसानों की कर्जमाफी कैसे कर सकती है? 
इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन आवास देने की मौजूदा व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ दिखती है जिसमें उसने बंगलों का ऐसा आबंटन असंवैधानिक करार दिया था। जब बिहार सरकार के वकील ने पटना हाईकोर्ट को सहमत कराने की कोशिश की कि राज्य में एक कानून बनाकर पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास दिए गए हैं, तो अदालत ने कहा कि यह कानून पहली नजर में ही संविधान के खिलाफ दिखता है। छत्तीसगढ़ में भी जिन लोगों को उनके कार्यकाल के बाद इस तरह से मकान दिए गए हैं, वे असंवैधानिक लगते हैं, और इस बारे में सरकार को जांच-परख कर लेनी चाहिए। हमने इसी कॉलम में कुछ समय पहले यह लिखा भी था कि गरीब जनता के पैसों पर सत्तारूढ़ लोगों को अपने लिए ऐशोआराम नहीं जुटाने चाहिए। उसके साथ ही यह बात भी लिखी थी कि मीसाबंदी पेंशन जैसी जो सुविधाएं बहुत से नेता लेते हैं, उन्हें भी गैस सब्सिडी की तरह ऐसी रियायतें, ऐसे फायदे छोडऩे चाहिए जो कि गरीब जनता के पैसों से दिए जाते हैं। 
जिस तरह छत्तीसगढ़ में रियायती चावल के लिए गरीबी का एक पैमाना तय किया गया है, उसी तरह स्वास्थ्य-बीमा या कर्जमाफी के लिए गरीब होना या जरूरतमंद होना एक अनिवार्य शर्त होनी चाहिए। जो नेता अपने खुद के दम पर करोड़पति हैं, उन्हें किसी भी तरह के सरकारी ऐशोआराम नहीं मिलने चाहिए। इसके लिए जनता के बीच से एक ऐसा आंदोलन भी शुरू हो सकता है जो कि लोगों को नाजायज हक छोडऩे कहे, और जायज हक के लिए भी जरूरत के पैमाने को लागू करे। आज जिसे, जितना, जब तक मुफ्त मिल सके, वह हसरत खत्म ही नहीं होती है, फिर चाहे उसे पूरा करते हुए कितने ही गरीब खत्म न हो जाएं। 
-सुनील कुमार




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