मनोरंजन

फिल्म द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर, थोड़ा आंखों-देखा सच, थोड़ा सोचा गया!

Posted Date : 12-Jan-2019



- अंजलि मिश्रा

संजय बारू की बहुचर्चित-विवादित किताब 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरÓ 2014 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले आई थी तो वहीं इस पर बनी फिल्म 2019 के चुनावों से पहले रिलीज हुई है। यह वक्त ही कुछ ऐसा होता है कि किताब-फिल्म जैसी सार्वजनिक चीजें हो या निजी मुलाकातें, सब चुनावी चश्मे से देखे जाते हैं। ऐसे में इस फिल्म पर भी एजेंडा सेट करने का इल्जाम तो लगना ही था।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरÓ प्रोपगेंडा फिल्म नहीं है, यह सौ में से निन्यानवे टका यही है। लेकिन बुराई में अच्छाई देखें तो इस बार इमरजेंसी के पकाऊ कॉन्सेप्ट से इतर समकालीन राजनीति और घटनाओं पर बनी यह फिल्म अपनी तरह की पहली है।
यहां पर इस बात पर खुश हुआ जा सकता है कि फिल्मकार अब इंदिरा गांधी के अलावा बाकी राजनीतिक किरदारों को भी परदे पर लाने में रुचि लेने लगे हैं। 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरÓ के बाद नरेंद्र मोदी पर आधारित विवेक ओबेरॉय की मुख्य भूमिका वाली फिल्म के आने की चर्चा भी जोरों पर है। कुल मिलाकर, राजनीति पर आधारित किस तरह की फिल्में बननी चाहिए, यह सीखना बॉलीवुड ने शुरू कर दिया है।
कहानी पर आएं तो फिल्म 2004 से 2014 के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकारों को अपनी पृष्ठभूमि बनाती है और मनमोहन सिंह और पार्टी नेतृत्व के बीच की खींचतान को दिखाती है। ऐसा करते हुए यह जहां एक तरफ गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी को जमकर निशाना बनाती है, वहीं मनमोहन सिंह के साथ सहानुभूति जताते हुए भी उन्हें सबसे कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर स्थापित कर देती है। कोई भी प्रधानमंत्री, खासतौर पर वह जो पहले आरबीआई गवर्नर और वित्तमंत्री जैसे जिम्मेदार पदों पर भी रहा हो, अपने मीडिया सलाहकार से पूछकर न्यूक्लियर डील पर अपना रुख तय क्यों करेगा? अगर आप खुद से यह एक कॉमन सेंस वाला सवाल पूछ लें तो फिल्म की नीयत को अच्छे से समझ सकते हैं।
पूरी फिल्म के दौरान आपको साउथ ब्लॉक की इमारतों के बाहर हरियाली और भीतर की चटख रंगों वाली दीवारें नजर आती हैं। ऐसे कई क्लीशे प्रतीकों के बीच आते-जाते किरदार पीएमओ का माहौल रचने की कोशिश करते है। लेकिन यहां पर घटने वाली घटनाएं और बताए जाने वाले तथ्य आपको पीएमओ या कांग्रेस पार्टी के भीतर की कोई ठोस जानकारी दे सकें, ऐसा नहीं हो पाता। इन्हें देखते हुए कई बार ऐसा लगता है जैसे अखबारों में छपने वाली पॉलिटिकल गॉसिप को आधार बनाकर फिल्म की पटकथा रच दी गई हो। फिल्म का पहला हिस्सा जहां मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल में हुई न्यूक्लियर डील और कांग्रेस नेतृत्व से खींचतान को दिखाता है, वहीं दूसरा हिस्सा दूसरे कार्यकाल में उजागर हुए घोटालों और कांग्रेस द्वारा मनमोहन सिंह को बलि का बकरा बनाए जाने की बात कहता है। ब्यूरोक्रेट्स और बाकी कांग्रेस नेताओं के साथ संजय बारू की केमिस्ट्री, कुछ ट्विस्ट, रोचक संवाद और थोड़ा नॉस्टैल्जिया फिल्म को बोझिल नहीं होने देते।
'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरÓ असली किरदारों, प्रतीकों और वीडियो फुटेज का खुलकर प्रयोग करती है और उन नामों को करीब से देखने का मौका देती है जिन्हें एक आम आदमी केवल खबरों में सुनता-पढ़ता रहता है। सोनिया गांधी जैसी दिखने वाली सुजैन बर्नेट, राहुल गांधी सरीखे अर्जुन माथुर, प्रियंका गांधी के रूप में आहना कुमरा और मनमोहन सिंह की तरह हूबहू दिखते अनुपम खेर के अलावा भी फिल्म में कई किरदार ऐसे हैं जिन्हें उनके कपड़ों या चेहरे-मोहरे की खासियतों के चलते पल भर में पहचाना जा सकता है।
अगर कोई किरदार ऐसा है जो कि अपने असल रूप से दूर-दूर तक मेल नहीं खाता तो वह कहानी के सूत्रधार, संजय बारू यानी अक्षय खन्ना हैं। अक्षय खन्ना असली बारू से अलग, महंगे-फैशनेबल सूट पहने हर फ्रेम में स्टाइल मारते हुए नजर आते हैं। शायद फिल्म के बड़े से डिस्क्लेमर में जिन काल्पनिक घटकों को जोड़े जाने की बात कही गई है, वह सबसे ज्यादा बारू के ही किरदार में जोड़े गए हैं। खन्ना ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके निर्देशक नहीं चाहते थे कि वे बारू से मिलें। शायद निर्देशक विजय गुट्टे ने पहले ही तय कर लिया था कि उन्हें दर्शकों को बारू का एक मनोरंजनक-आक्रामक वर्जन दिखाना है और जो आसानी से प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व पर हावी होता दिख सके। हालांकि इसे गले उतार पाना आसान है क्योंकि लोगों को बारू के व्यक्तित्व का अंदाजा कम ही है।
'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरÓ में अपने किरदार के बारे में अनुपम खेर का कहना है कि यह उनके जीवन की सबसे अच्छी परफॉर्मेंस है। ऐसा कहने के पीछे वे कारण बताते हैं कि उन्हें इस किरदार को करने में सबसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ी है। उनकी बात के पहले हिस्से से तो मुतमइन नहीं हुआ जा सकता लेकिन, इस बात से इंकार नहीं है कि उन्होंने इसके लिए मेहनत बहुत की है, तभी वे किरदार में वे बातें भी ला पाए हैं जो असल मनमोहन सिंह में भी नहीं हैं! (कटाक्ष!) सोनिया गांधी के हाथों की कठपुतली दिखाने के चक्कर में मनमोहन को जरूरत से ज्यादा बेचारगी दे दी गई है। उनकी चाल और आवाज को खेर ने कुछ इस तरह से रचा है कि वह जरा फेमिनिन सी लगने लगती है और हंसी छूटने की वजह बन जाती है। नरमी से बोलने के उनके तरीके को जबरन उनके कम आत्मविश्वास से जोड़कर दिखाने की कोशिश किया जाना अखरता है।
एडिटिंग, कैमरा वर्क और फॉरमेट से लगता है कि निर्देशक विजय गुट्टे नेटफ्लिक्स की बेहद पॉपुलर सीरीज 'हाउस ऑफ कार्ड्सÓ से काफी प्रभावित हैं। यह और बात है कि इस सीरीज जैसी ही तेजी और अंदाज अपनाने वाली यह फिल्म उसकी रोचकता का सौवां हिस्सा भी नहीं रच पाती। हालांकि एक फिल्म के तौर पर 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरÓ थोड़ा-थोड़ा मनोरंजन करती रहती है लेकिन, सच-झूठ के पैमानों पर यह खुद को इतना विश्वसनीय नहीं बना पाती कि इसे अविश्वसनीय सिनेमा कहा जा सके! (सत्याग्रह)




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