विशेष रिपोर्ट

करोड़ों खर्च के बाद भी 13 हजार आदिवासी बच्चे अनुदेशकों के भरोसे

Posted Date : 31-Jan-2019



पोटाकेबिनों में शिक्षक नहीं, बच्चों के भविष्य पर मंडरा रहा संकट
राजीव गांधी मिशन के जिला परियोजना समन्वयक ए बसमैया का कहना है कि युक्तियुक्तकरण के माध्यम से शिक्षकों की भर्ती पोटाकेबिनों में किये जाने की तैयारी चल रही है। इसमें अतिशेष व बंद स्कूलों के शिक्षकों को शामिल किया गया है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक पोटाकेबिन को 8-8 शिक्षक दिए जाएंगे। इसके लिए जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से प्रपोजल कमिश्नर कार्यालय भेज दिया गया है।
छत्तीसगढ़ संवाददाता
बीजापुर, 31 जनवरी। जिले में संचालित गुरुकुल आवासीय विद्यालय यानि  पोटाकेबिनों में अध्यनरत तेरह हजार आदिवासी बच्चों का भविष्य इन दिनों दांव पर लगा हुआ है। करोड़ों खर्च करने बाद भी बच्चों को शिक्षकों के बजय अनुदेशकों के सहारे तालीम दी जा रही है। इससे आदिवासी बच्चों के भविष्य पर संकट मंडरा रहा है।
 जिले में संचालित 34 आदर्श गुरुकुल आवासीय विद्यालयों में अध्ययनरत इन आदिवासी बच्चों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति ही नहीं की गयी। आवासीय विद्यालय में 24 घंटे आदिवासी बच्चों के देख-रेख के लिए अस्थायी तौर पर नियुक्त किये गये अनुदेशक ही बच्चों को तालीम दे रहे हैं। सलवा जुडूम के प्रादुर्भाव के बाद सुरक्षा बल के जवान मुख्य सड़कों में स्थित स्कूल भवनों को अस्थायी कैंप के रूप में इस्तेमाल करने लगे। जिसके बाद माओवादियों ने अंदरूनी इलाकों के सैंकड़ों स्कूल भवनों को ध्वस्त कर दिया। जिससे हजारों आदिवासी छात्र शिक्षा से वंचित हो गये। 
शिक्षा से वंचित होकर ये आदिवासी छात्र कहीं नक्सल पंथ से न जुड़ जाएं इस डर से सरकार ने शाला त्यागी और अप्रवेशी बच्चों के लिए सन 2010 में राजीव गांधी शिक्षा मिशन के तहत आदर्श गुरुकुल आवासीय विद्यालय यानी कि पोटाकेबिनों की नींव रखीं। इन पोटाकेबिनों में अंदरूनी इलाकों के आदिवासी बच्चों को दाखिला दिलाकर उन्हें बेहतर शिक्षा देने का प्रयास किया गया। शुरूआती दौर में माओवादियों द्वारा ध्वस्त किये गये स्कूल भवनों में पदस्थ शिक्षकों को ही इन आवासीय विद्यालयों में नियुक्त किया गया था। साथ ही बच्चों के देख-रेख के लिए नियुक्त किये गए अनुदेशक कुछ समय बाद युक्तियुक्तकरण में पोटाकेबिनों में पदस्थ शिक्षक वापस अपनी मूल संस्था में लौट गये। इसके बाद पोटाकेबिन में हजारों बच्चों के साथ केवल एक अधीक्षक और कुछ  अनुदेशक ही बच  गये। चूंकि अधीक्षक की जिम्मेदारी हॉस्टल मैनेजमेंट संभालना होता है तो इन आदिवासी  बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा देखभाल के लिए नियुक्त किये गये अनुदेशकों के कन्धों पर आ गया। करीब 7 साल से चंद अनुदेशक ही हजारों आदिवासी छात्रों को किसी तरह पढ़ा रहे हैं। 
केंद्र और राज्य सरकार पोटाकेबिन में अध्ययनरत एक छात्र के खाने, पीने और दैनिक उपयोग की चीजों पर मासिक 1500 रूपये खर्च करती है। यानि कि वर्तमान में जिले के 34 पोटाकेबिनों में अध्ययनरत 13 हजार आदिवासी बच्चों के रहन सहन पर सरकार सालाना 23 करोड़, 39 लाख, 10 हज़ार रूपये खर्च कर रहीं हैं। अब हैरान कर देने वाली बात ये है किए आदिवासी बच्चों के रहन सहन पर करोड़ों खर्च करने वाली हमारी सरकारें उनके बेहतर शिक्षा और भविष्य  के लिए कुछ शिक्षक नियुक्त नहीं कर पा रही। पोटाकेबिनों में पदस्थ अधीक्षक और राजीव गांधी शिक्षा मिशन के अधिकारी भी मानते हैं कि पोटाकेबिनों में शिक्षा का स्तर गिर चुका है।
बीजापुर ही नहीं बल्कि नक्सल प्रभावित सुकमा, दंतेवाड़ा, और नारायणपुर में भी पोटाकेबिन संचालित किये जा रहे हैं। इन जिलों में संचालित पोटाकेबिनों की भी स्थिति कमोबेश बीजापुर की ही तरह ही हैं। अब बड़ा सवाल ये कि  शिक्षा के नाम पर जिन आदिवासी बच्चों के रहन सहन के लिए करोड़ों रूपये खर्च करने वाली हमारी सरकारें उनके बेहतर भविष्य और शिक्षा के लिए कुछ शिक्षक क्यूं नहीं नियुक्त कर पा रहीं हैं।  

 

 




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