विशेष रिपोर्ट

लोकसभा के नामों पर अटकलें जारी,

Posted Date : 31-Jan-2019



कुछ घोड़े पर चढऩे को बेताब हैं तो कुछ लडऩे को बिल्कुल तैयार नहीं

रायपुर, 31 जनवरी (छत्तीसगढ़)। लोकसभा चुनाव में अब अधिक वक्त नहीं बचा है, और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस, भाजपा के अलावा जोगी-बसपा के उम्मीदवारों के नामों की चर्चा बंद कमरों में तो शुरू हो ही गई है। जरूरी नहीं है कि इनमें से कोई भी नाम नामांकन के दिन कायम रहें, लेकिन पार्टी के भीतर जुबानी जमाखर्च में कई नामों पर चर्चा भी हो रही है, और उनमें से कई लोग रायपुर से दिल्ली तक पार्टी के भीतर लॉबिंग भी कर रहे हैं। 
राजधानी रायपुर में लंबे समय से भाजपा के सांसद रमेश बैस बने हुए हैं, लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि पुराने चेहरों को बदलकर भाजपा इस बार अपना खतरा कम करेगी, और ऐसे में रमेश बैस की जगह दूसरे उम्मीदवारों के नाम भी चर्चा में हैं। कुछ लोगों का मानना है कि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व हर सीट पर जीत की अधिकतम संभावना से कम पर कोई समझौता नहीं करेगा, और ऐसे में बैस की जगह कुछ और नाम भी आ सकते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि बृजमोहन अग्रवाल जैसे मजबूत विधायक को इस सीट से झोंका जा सकता है। हालांकि बृजमोहन अग्रवाल यह कह चुके हैं कि वे लोकसभा का चुनाव नहीं लडऩा चाहते। 
दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी के पास रायपुर लोकसभा सीट पर बेहतर उम्मीदवार माने जा रहे हैं। एक तरफ महापौर प्रमोद दुबे के लोग उनकी उम्मीदवारी चाह रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता उनसे इस बात को लेकर खफा बताए जा रहे हैं कि जब बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ विधानसभा चुनाव लडऩे के लिए कहा गया, तो प्रमोद दुबे पीठ दिखाकर भाग निकले थे। ऐसे में एक चर्चा पार्टी के भीतर यह भी है कि प्रमोद दुबे से विधानसभा उम्मीदवारी के समय यह कहा गया था कि वे बृजमोहन के खिलाफ चुनाव लड़ें, और वे हार भी जाते हैं तो भी उन्हें लोकसभा की टिकट दी जाएगी। लेकिन बृजमोहन के खिलाफ खड़े होने के बजाय वे कतराकर निकल गए थे। 
कांग्रेस में ही दूसरी मजबूत उम्मीदवार किरणमयी नायक मानी जा रही हैं जो कि बृजमोहन के खिलाफ दो चुनाव पहले मजबूती से विधानसभा लड़ चुकी हैं, और हारने के बाद भी उन्होंने लगातार हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट तक चुनाव याचिका लेकर लड़ाई लड़ी। बृजमोहन के खिलाफ उम्मीदवारों के रहस्यमय ढंग से कमजोर हो जाने की चर्चा हर चुनाव में रहती हैं, लेकिन किरणमयी नायक ने ऐसी चर्चाओं को अपने बारे में कभी सही साबित नहीं होने दिया, और अपनी धार कभी कम नहीं होने दी। चुनाव में टिकट में जातिगत समीकरण भी मायने रखते हैं, और इस हिसाब से किरणमयी नायक पिछड़ा वर्ग के कुर्मी समाज की उम्मीदवार हैं, जिससे कि मौजूदा भाजपा सांसद रमेश बैस भी हैं।
पड़ोस की महासमुंद सीट से वर्तमान भाजपा सांसद चन्दूलाल साहू की टिकट कटने की चर्चा है, और वहां से भाजपा कुरूद के विधायक अजय चंद्राकर को भी टिकट दे सकती है, जो कि चुनाव लडऩे में सक्षम भी हैं, और पर्याप्त संपन्न भी हैं। लेकिन अजय चंद्राकर के ही खेमे से श्वेता शर्मा भी एक दावेदार हो सकती हैं जो कि महासमुंद में पत्रकार रहे वीरेन्द्र दीपक की बेटी हैं, और महासमुंद में ही पैदा भी हुई हैं। वे इसी संसदीय सीट में आने वाले गरियाबंद जिले की पंचायत अध्यक्ष भी हैं, और भाजपा की बागी उम्मीदवार के रूप में वे राजिम से लड़कर हार भी चुकी हैं। वे राजनीतिक रूप से अजय चंद्राकर के करीब मानी जाती हैं, और ऐसा माना जाता है कि श्वेता को टिकट मिलने से महिला, छत्तीसगढ़ी ब्राम्हण, ये दो पैमाने पूरे होंगे, और महासमुंद संसदीय सीट से अजय चंद्राकर अपनी कुरूद विधानसभा सीट को तो देख ही लेंगे, इसके साथ-साथ वे एक-दो और विधानसभा सीटों को सम्हाल लेंगे। इस सीट पर कांग्रेस के जिन लोगों के नाम चर्चा में हैं, उनमें सबसे वजनदार उम्मीदवार अभनपुर के धनेन्द्र साहू को माना जा रहा है जो कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुके हैं, इस बार वे अपने आपको मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते थे, और मंत्री पद भी नहीं पा सके हैं। उनको टिकट देने से साहू कोटा पूरा होगा, और एक वरिष्ठ विधायक को सांसद बन जाने पर राज्य कांग्रेस पर से दबाव भी कम होगा। धमतरी से विधानसभा का चुनाव हारे हुए गुरूमुख सिंह होरा को कांग्रेस टिकट दिलाने की कोशिश भी हो सकती है, अगर राज्य से किसी भी दूसरी सीट से किसी अल्पसंख्यक को टिकट न मिल पाए। लेकिन कांग्रेस से अग्नि चंद्राकर कुर्मी समाज के एक उम्मीदवार हो सकते हैं। 
रायपुर से लगी हुई दूसरी संसदीय सीट, दुर्ग का गणित काफी जटिल है। पिछले चुनाव में वहां सरोज पांडेय को हराकर कांग्रेस के ताम्रध्वज साहू प्रदेश से पार्टी के अकेले लोकसभा सदस्य बने थे। वही बात उन्हें दिल्ली में राहुल गांधी के इतने करीब ले गई कि इस बार मुख्यमंत्री के लिए उनके नाम पर भी गंभीरता से विचार हुआ था। विधायक बनने के बाद उन्होंने संसदीय सीट छोड़ दी है, लेकिन ऐसी चर्चा है कि वे अपने बेटे के लिए टिकट चाह सकते हैं। दूसरी तरफ ताम्रध्वज साहू को विधायक बनाने के लिए कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में पार्टी की घोषित उम्मीदवार प्रतिमा चंद्राकर को प्रचार के बीच से बाहर खींच लिया था, और वे कुर्मी समाज की एक दमदार उम्मीदवार हो सकती हैं। उनके पिता वासुदेव चंद्राकर दुर्ग की राजनीति के एक सबसे बड़े नेता रहे हैं, और वे खुद भी विधायक रह चुकी हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल खुद वासुदेव चंद्राकर पाठशाला से निकले हुए नेता हैं, और वे प्रतिमा चंद्राकर का समर्थन कर सकते हैं। दूसरी तरफ दुर्ग जिले से ही अगर जातिगत समीकरण में कांग्रेस को किसी साहू को टिकट देनी पड़ी तो राजेन्द्र साहू को भूपेश बघेल की पसंद बताया जा रहा है। हालांकि राजेन्द्र साहू मोतीलाल वोरा का पुतला जलाने के बाद से पार्टी से बाहर थे, और हाल ही में उन्हें कांग्रेस में वापिस लिया गया था, इसलिए उनका वजन शायद अधिक न गिना जाए। इस सीट से भाजपा की एक उम्मीदवार रमशीला साहू भी हो सकती हैं जो कि विधानसभा में मंत्री रहते हुए भी टिकट नहीं पा सकी थीं। लेकिन एक अटपटी चर्चा यह भी है कि पार्टी हो सकता है कि ताम्रध्वज साहू को ही फिर से उम्मीदवार बना दे। इससे परे थानेश्वर साहू का नाम भी चर्चा में है जिनकी टिकट अंतिम क्षणों में कट गई थी और उनकी जगह बेमेतरा सीट से आशीष छाबड़ा को उम्मीदवार बनाया गया। दूसरी अटपटी चर्चा भाजपा खेमे की है कि दुर्ग संसदीय सीट से रमन सिंह को उम्मीदवार बनाया जा सकता है क्योंकि राजनांदगांव सीट से अभिषेक सिंह की तमाम कोशिशों के बावजूद विधानसभा चुनाव में भाजपा दो लाख से अधिक वोटों से हारी है।
राजनांदगांव में अभी तो रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह सांसद हैं, और रायपुर आना छोड़कर वे सीट पर ही रहकर रात-दिन मेहनत कर रहे हैं। लेकिन राजनांदगांव विधानसभा सीट पर रमन सिंह के खिलाफ खड़ी होने वाली भाजपा से कांग्रेस आई हुई करुणा शुक्ला का नाम इस बार संसदीय चुनाव के लिए भी लिया जा रहा है। नांदगांव में इस बार नजारा करुणा के सामने रमन, या करुणा के सामने अभिषेक जैसा भी हो सकता है, लेकिन अगर रमन सिंह दुर्ग से उम्मीदवार बने तो उस हालत में राजनांदगांव से वहां पहले सांसद रह चुके, सरल और लोकप्रिय मधुसूदन यादव की बारी भी आ सकती है। लेकिन इन सब अटकलों से परे जो बात सबसे ऊपर है वह यह कि वहां के दो चुनाव संचालक तय हैं, एक तो रमन-अभिषेक, और दूसरे कांग्रेस के मो. अकबर। 
 हालांकि रमन सिंह का खुद का मानना है कि उनके लोकसभा चुनाव लडऩे की कोई संभावना नहीं है क्योंकि पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है और तीन राज्यों का दौरा करने का निर्देश भी दिया है। वे 8 फरवरी के मोदी के छत्तीसगढ़ प्रवास के बाद इन राज्यों के लिए रवाना भी होने वाले हैं।
अब बिलासपुर लोकसभा सीट को देखें, तो वहां एक नाम अटल श्रीवास्तव का चल रहा है जो कि भूपेश बघेल के सबसे करीबी माने जाते हैं, और जिन्हें विधानसभा की टिकट भूपेश नहीं दिला पाए। साथ ही साथ पूर्व महापौर वाणीराव का नाम भी चर्चा में हैं। दूसरी तरफ भाजपा से अमर अग्रवाल के नाम पर जमकर चर्चा है कि विधानसभा हार जाने के बावजूद वे लोकसभा जीतने की संभावना रखते हैं, और लंबे खर्च की ताकत भाजपा में उन्हीं में है। वे दिल्ली में भाजपा के जेटली जैसे नेताओं के करीबी भी हैं, और अपने गुजर चुके पिता लखीराम अग्रवाल के नाम का फायदा उन्हें एक बार फिर मिल सकता है, भाजपा की टिकट की शक्ल में। उनके जितना खर्च करने वाला दूसरा कोई उम्मीदवार किसी पार्टी के पास नहीं है। हालांकि मौजूदा नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक यहां से मौजूदा सांसद लखनलाल साहू को ही प्रत्याशी बनाने के पक्ष में बताए जाते हैं। जबकि, जोगी पार्टी ने यहां से विधायक धर्मजीत सिंह को चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है।
कोरबा लोकसभा सीट पर एक त्रिकोणीय संघर्ष तय माना जा रहा है। कांग्रेस पार्टी के एक सबसे बड़े नेता डॉ. चरणदास महंत को ही पार्टी ने इस सीट की जिम्मेदारी दी है, और ऐसा माना जा रहा है कि जरूरत पड़ेगी तो खुद राहुल गांधी भी इस सीट से महंत को लडऩे के लिए कहेंगे। लेकिन पार्टी के भीतर यह चर्चा भी है कि महंत पहले ही मना कर चुके हैं कि वे विधानसभा के बाद अब लोकसभा लडऩे की हालत में नहीं हैं। ऐसी हालत में एक नौबत यह आ सकती है कि घेर-घारकर चरणदास महंत की पत्नी ज्योत्सना महंत को कांग्रेस उम्मीदवार बनाया जाए। फिलहाल यहां से भाजपा के बंशीलाल महतो सांसद हैं, लेकिन उनके बेटे विधानसभा चुनाव हार चुके हैं, और महतो को मुख्यमंत्री बनाने के लिए रमन सरकार के रहते हुए भी दिल्ली में जिस तरह से खर्चीली कोशिश हुई थी, उससे भी महतो की छवि पार्टी के भीतर गड़बड़ाई है। महतो का बेटा प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी निर्माण ठेकेदार भी है, और इसके चलते भी कई तरह की बातें महतो परिवार के खिलाफ चली आ रही हैं, और चुनाव तक कई तरह के और विवाद भी सामने आ सकते हैं। बंशीलाल महतो की जगह कोरबा के पूर्व महापौर जोगेश लांबा को प्रत्याशी बनाने की मांग हो रही है। कांग्रेस से इस सीट से जीत की दूसरी संभावना विधायक और मंत्री जयसिंह अग्रवाल की बताई जा रही है, लेकिन ऐसा लगता नहीं है कि मौजूदा सरकार में मंत्री बने हुए लोग लोकसभा चुनाव लडऩा चाहेंगे। इस तस्वीर में त्रिकोण का तीसरा कोण जोगी पार्टी है जिसके अमित जोगी यहां से चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। इस सीट पर जोगी पार्टी और बसपा के वोट इतने हैं कि उनका हौसला बढऩा जायज है। प्रदेश की जिन तीन सीटों पर जोगी-बसपा त्रिकोण बनाने की हालत में हैं, उनमें कोरबा के अलावा जांजगीर और बिलासपुर भी हैं। ऐसी चर्चा है कि जोगी के मुख्यमंत्री रहते हुए अमित जोगी ने उसी वक्त से लोकसभा सीटों के पुनर्सीमांकन में भारी दिलचस्पी ली थी, और कोरबा सीट को अपने हिसाब से बनवाने का काम किया था। 
रायगढ़ आदिवासी आरक्षित लोकसभा सीट से भाजपा के अकेले केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय अभी सांसद हैं, लेकिन उनको भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाने की चर्चा चल रही है। अगर ऐसा होता है तो वे लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे, और उनकी जगह कोई और उम्मीदवार पार्टी को तय करना पड़ेगा। लेकिन अगर उनको अध्यक्ष नहीं बनाया जाता है, तो फिर उनकी उम्मीदवारी हो सकती है। इस सीट से कांग्रेस पार्टी में सारंगढ़ राजपरिवार की तीन बहनों में से एक के उम्मीदवार होने की चर्चा है। 
जांजगीर-चाम्पा अनुसूचित जाति आरक्षित लोकसभा सीट से अभी भाजपा की कमला पाटले सांसद हैं, और ऐसी चर्चा है कि भाजपा छत्तीसगढ़ के अपने सभी उम्मीदवारों को बदल सकती है, ऐसे में यहां से भाजपा को भी नया चेहरा तलाशना होगा, और कांग्रेस को भी। कांग्रेस के पास इस सीट से सबसे अधिक संख्या में दावेदार हैं जिनमें एक भूतपूर्व सांसद रहे पी.आर. खुंटे भी हैं, और पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को मदद पहुंचाने वाले सतनामी समाज के गुरू बालदास भी अपने बेटे के लिए यहां से कांग्रेस टिकट चाह रहे हैं। लेकिन इस सीट से अभी से दर्जन भर से अधिक कांग्रेस नेता दावेदारी करते घूम रहे हैं। यहां बसपा का अच्छा खासा प्रभाव है और बसपा के पूर्व विधायक दाऊराम रत्नाकर का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। यहां त्रिकोणीय मुकाबला तय माना जा रहा है। 
सरगुजा संभाग में इस चुनाव में भाजपा का सूपड़ा साफ हो चुका है, और उसे एक भी विधानसभा सीट नहीं मिली है। वहां के सबसे बड़े कांग्रेस नेता टी.एस. सिंहदेव की मर्जी से ही लोकसभा उम्मीदवार तय होना माना जा रहा है, और वहां विधानसभा की एक सामान्य सीट से जीतकर आए आदिवासी नेता खेलसाय सिंह का नाम लिया जा रहा है। ऐसा भी माना जा रहा है कि वे अगर लोकसभा जीत जाते हैं तो उनकी विधानसभा सीट पर बाद में सिंहदेव परिवार से कोई उपचुनाव लड़ सकते हैं। इससे परे पूर्व विधायक रामदेव राम का नाम चर्चा में है। रामदेव राम के बड़े भाई डॉ. प्रीतम राम विधायक हैं। भाजपा के पास सरगुजा से रामविचार नेताम एक राज्यसभा सदस्य हैं, और उनकी पत्नी पुष्पा नेताम जिला पंचायत की निर्वाचित अध्यक्ष रही हैं। भाजपा टिकट तय करते समय इन चेहरों को भी देखेगी, लेकिन हो सकता है कि रामविचार नेताम को लोकसभा चुनाव में उतार दिया जाए। 
आखिर में बस्तर की दो लोकसभा सीटें बचती हैं, बस्तर और कांकेर। बस्तर से अभी कश्यप परिवार के दिनेश कश्यप सांसद हैं, और उनके छोटे भाई केदार कश्यप विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं। केदार कश्यप का कहना है कि वे लोकसभा के उम्मीदवार नहीं बनेंगे, और दिनेश कश्यप ही दावेदार रहेंगे। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी से कवासी लखमा का नाम लिया जाता है जो कि अभी विधायक और मंत्री हैं, और कई बार के विधायक रह चुके हैं, सरल स्वभाव के हैं। दूसरा नाम महेन्द्र कर्मा के परिवार से लिया जा रहा है, जहां पर देवती कर्मा विधानसभा का चुनाव हार चुकी हैं, लेकिन उनके बेटे भी राजनीति में हैं। 
कांकेर संसदीय सीट से अभी भाजपा के विक्रम उसेंडी सांसद हैं जो कि पिछले विधानसभा चुनाव में खड़े किए गए थे, और हार चुके हैं। ऐसे में उनकी लोकसभा की टिकट डांवाडोल है, और पार्टी नए चेहरों को देख रही है। कांग्रेस पार्टी की ओर से अरविंद नेताम उम्मीदवार बनना चाहते हैं, लेकिन वे कई पार्टियों से होते हुए कांग्रेस में लौटे हैं, इसलिए उनका दावा कुछ कमजोर जरूर रहेगा। जबकि कांकेर के पूर्व विधायक शंकर ध्रुवा को यह कहकर टिकट नहीं दी गई थी कि उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़ाया जाएगा। शंकर ध्रुवा के अलावा वीरेश ठाकुर और पूर्व विधायक डोमेन्द्र भेडिय़ा का नाम भी चर्चा में है। 




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