संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 7 फरवरी : आदिवासी जमीन लौटाने की नीति बाकी इलाकों में भी लागू हो...

Posted Date : 07-Feb-2019



छत्तीसगढ़ में प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने अपने चुनावी वायदे के मुताबिक बस्तर में आदिवासियों से टाटा के कारखाने के लिए ली गई जमीन वापिस कर दी है। टाटा ने यहां कारखाना न लगाने की घोषणा कर दी थी, और इस जमीन का कोई और इस्तेमाल अभी तुरंत नहीं था। अब राज्य में बाकी इलाकों में ली गई आदिवासी जमीन अगर इस्तेमाल नहीं हो रही है, तो उसकी वापिसी भी हो सकती है क्योंकि यही घोषणा राहुल गांधी ने अभी ओडिशा की आमसभा में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मौजूदगी में की है। 

लेकिन बात महज आदिवासी जमीनों की नहीं है, जिस किसी की भी जमीन सरकार ने बिना किसी जरूरत ली है, उस पर फिर से सोचने की जरूरत है। राजधानी रायपुर से लगकर बनाए गए जा रहे नया रायपुर, या अटल नगर, के लिए हजारों एकड़ जमीन लोगों से सरकार ने ले ली, जबकि उसका न इस्तेमाल था, न उसके लिए कोई योजना ही है। आज के बाजार में उसके खरीददार भी नहीं हैं। इसके अलावा नया रायपुर के योजनाबद्ध विकास के नाम पर राज्य सरकार ने उसके आसपास के दस-बीस हजार एकड़ इलाके में कुछ बनाने पर तरह-तरह की नाजायज रोक भी लगा दी है जो कि ऐसी जमीनों पर है जिन्हें न सरकार ने भुगतान करके लिया है, और न ही अपनी निजी जमीनों पर लोग अपनी मर्जी से घर भी बना पा रहे हैं। नया रायपुर विकास प्राधिकरण ने जरूरत और व्यवहारिकता से अधिक महत्वाकांक्षी योजना बनाई, और उसे लोगों की निजी संपत्ति पर थोप दिया। नतीजा यह हुआ कि लोग अपनी जमीन का ही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे, और न ही बाजार में उसका कोई वाजिब दाम मिल रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट ने एक दूसरे राज्य के मामले में यह फैसला दिया है कि जहां कहीं सरकार किसी जमीन के इस्तेमाल को सार्वजनिक उपयोग तक सीमित करना चाहती है, वहां सरकार पहले उस जमीन का अधिग्रहण करे, उसके बाद उसके इस्तेमाल पर रोक लादे। लेकिन इस आदेश की भावना के ठीक खिलाफ जाकर छत्तीसगढ़ में अभी तक नया रायपुर या कमल विहार जैसी योजनाएं चल रही हैं। पिछले दिनों नई राज्य सरकार ने पांच डिसमिल से छोटे भूखंडों की खरीद-बिक्री पर से रोक हटाई है जो कि एक बहुत ही जायज फैसला है, और उससे प्रदेश में लाखों लोगों को राहत मिलेगी। ऐसा ही व्यवहारिक नजरिया जमीन के इस्तेमाल के बारे में भी अपनाने की जरूरत है। सरकार की जमीन-इस्तेमाल की नीति के खिलाफ कुछ बड़े लोग तो अदालत जा सकते हैं, लेकिन बहुत से छोटे लोग कोई कानूनी लड़ाई लडऩे की हालत में रहते ही नहीं हैं। फिर यह भी होता है कि प्रतिबंधित भू-उपयोग की वजह से बाजार में जमीनों के दाम नीचे रहते हैं, लोग वैसे प्रतिबंध के बावजूद उसे खरीदकर इक_ा करते रहते हैं, और फिर आखिर में जाकर सत्ता तक पहुंच बनाकर भू-उपयोग बदलवा लेते हैं, और रातों-रात जमीन कई गुना दाम की हो जाती है। प्रतिबंधों की वजह से छोटे लोग न कुछ बना पाते, न बेच पाते, न सही दाम पाते। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और सरकार किसी भी भू-उपयोग को तभी लादे जब वह उसका भुगतान करने की हालत में हो। टाऊन प्लानिंग के नक्शों मे भू-उपयोग के रंग बदलना एक बहुत बड़ा दो-नंबरी कारोबार रहता है, जो कि छोटे भू-स्वामियों की कीमत पर किया जाता है। 

नया रायपुर को राज्य सरकार एक बार फिर देखे, और यह तय करे कि उसे कितनी जमीन की जरूरत है, और बाकी की जमीन लोगों को लौटाना चाहिए, ताकि कम से कम नया रायपुर बस भी सके। आज तो वह एक मुर्दा शहर की तरह हो गया है जो कि पूरी तरह सरकार पर ही बोझ है। अगर सरकार उसके रख-रखाव पर मोटा खर्च जारी न रखे, अगर भारी घाटे में पुराने रायपुर से नया रायपुर तक बसों को न चलाए, सरकारी कर्मचारियों को दुगुना आवास भत्ता न दे, तो नया रायपुर में मरघटी सन्नाटा छा जाएगा। लेकिन सरकार अपनी जिद में ऐसा गैरजरूरी और इतना बड़ा शहर बसा तो चुकी है, उसे प्रदेश की गरीब जनता के पैसों से इस तरह जिंदा रखना बड़ा महंगा सौदा है। नया रायपुर के सरकारी इलाके के अलावा बाकी इलाकों में सरकार को निजी जमीनों पर विकास की छूट देनी चाहिए, और गैरजरूरी अधिग्रहित जमीन लौटानी भी चाहिए। 
-सुनील कुमार




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