संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 9 फरवरी : खरा साबित हुआ किसानी-सिक्का फिर चला भूपेश के बजट में...

Posted Date : 09-Feb-2019



छत्तीसगढ़ की राजनीति में दो बड़े दिलचस्प शब्दों का मुकाबला पिछले कुछ हफ्तों से चल रहा है, भाजपा की कांग्रेस-सरकार पर तोहमत है कि वह प्रदेश को बदलापुर बनाकर छोड़ रही है, दूसरी तरफ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसका तुर्की-ब-तुर्की जवाब देते हुए कहा कि यह बदलापुर नहीं बदलावपुर है। कल जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वित्तमंत्री की हैसियत से अपना पहला बजट विधानसभा में पेश किया, तो यह बात साफ हो गई कि यह बदलावपुर बनाने की एक योजना का बजट है। बजट में किसी जरूरी जरूरत को अनदेखा किए बिना सरकार की गांव, गरीब, और किसान की सोच खुलकर सामने आई है। लोकतंत्र की खूबी यही रहती है कि हर कुछ बरसों में किसी नई सरकार के आने की संभावना बनती है, और उसके साथ ही एक नई सोच को मौका मिलता है कि वह सरकारी योजनाओं को अपने मुताबिक ढाल सके। 

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी ने जो चुनावी वायदे किए थे, उनके मुताबिक सरकार में आते ही किसानों का कर्ज माफ किया गया, और धान का खरीदी मूल्य एकदम से बढ़ाया गया। इसके लिए सरकार ने बड़ा कर्ज भी लिया है, और इस बार के बजट में गांव और किसान पर केन्द्रित बहुत सी योजनाएं शामिल भी की हैं। दरअसल किसानों की कर्जमाफी और धान के बढ़े हुए समर्थन मूल्य के मुद्दों पर कांग्रेस पार्टी को प्रदेश में जिस तरह छप्पर फाड़कर वोट मिले हैं, उसे देखकर भाजपा पूरे देश में हिल गई, सहम गई। इसी का नतीजा था कि केन्द्र में जब मोदी सरकार का बजट आया तो उसमें किसान के सामने सरकार दंडवत हो गई। पूरे देश में किसानों के मुद्दों को अगर एकदम से अहमियत मिली है, तो उसके पीछे छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजे रहे हैं। और ऐसा लगता है कि मंदिर के मुद्दे को राम-राम करके अब भाजपा किसान को जयश्रीराम कहने को अपनी नियति समझ चुकी है। इस नाते भूपेश बघेल का यह पहला बजट न सिर्फ इस सरकार की किसानी सोच की निरंतरता है, बल्कि देश में किसानी-मुद्दों को मजबूती से स्थापित भी करने वाला है। इस राज्य के बनने के बाद करीब बीस बरस हो रहे हैं, और यह पहला एकदम खालिस छत्तीसगढ़ी बजट आया है जिसमें गांवों की सदियों पुरानी परंपरागत संभावनाओं को आगे बढ़ाने की सोच सामने रखी है। 

बजट के मौके पर हम पहले भी कुछ बातों को लिखते आए हैं, और उनको दुहराना जरूरी है। गांव और किसान से परे भी सरकार का खासा पैसा खर्च होता है, इस बजट में भी होने जा रहा है। लेकिन दानवाकार कांक्रीट-योजनाओं में जितना बड़ा भ्रष्टाचार होता है, उसकी वक्त पर निगरानी का इंतजाम अगर सरकार न करे, तो बाद में डूबे हुए पैसों की भरपाई नहीं हो पाती है। एक दशक से ज्यादा हो गया है लेकिन सड़क बनाने में डामर के घोटाले की भरपाई नहीं हो पाई है, सिंचाई की योजनाओं में जितनी बड़ी बर्बादी हुई है, उसकी कोई भरपाई कभी नहीं हो पाएगी, जिस तरह सड़कों में भ्रष्टाचार हुआ है, उसकी जांच अब जाकर अगर होगी भी तो उससे क्या हासिल होगा? इसके अलावा राज्य सरकार का एक बड़ा वायदा उन लाखों लोगों से है जो कि चिटफंड में पैसा गंवा चुके हैं। एक अंदाज है कि यह डूबत 11 सौ करोड़ रूपए है। अब सरकार यह रकम कैसे लोगों को वापिस दिला सकेगी, यह संभावना शायद पांच बरस का कार्यकाल पूरा होने तक भी पूरी नहीं हो सकेगी। इसलिए सरकार को आज सरकारी कामकाज के भ्रष्टाचार, जनता को लूटने की योजनाओं पर निगरानी रखने के लिए आर्थिक अपराध निगरानी का एक ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए जिससे कि डूबने के पहले ही किसी बर्बादी को रोका जा सके। सरकारी कामकाज और जनता को लूटने के धंधे, इन दोनों में हमेशा ही लूट और ठगी की बड़ी संभावना बनी रहेगी। इसलिए राज्य सरकार को एक मामूली खर्च से ऐसा एक खुफिया विभाग बनाना चाहिए जो कि बाजार की हलचल को देखते हुए धोखाधड़ी के खतरों को समय रहते रोक सके। 

भूपेश सरकार का यह पहला बजट कुछ हफ्ते बाद के लोकसभा चुनावों को देखते हुए भी है, और इसीलिए मुख्यमंत्री ने उसी सिक्के को दुबारा चलाया है जो कि विधानसभा चुनाव में एकदम खरा साबित हो चुका है। लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद साढ़े चार साल सरकार को चलाना, और उसके बाद जनता के सामने फिर पेश होना बाकी रहेगा। आने वाले इन बरसों में राज्य की कमाई को बढ़ाना भी उतना ही जरूरी रहेगा, जितना जरूरी गरीब और किसानों की हालत सुधारना है। ऐसे में सरकार को खेत और बाडिय़ों की उपज को छोटी-छोटी फूड प्रोसेसिंग यूनिटों से बाजार तक पहुंचाना होगा, कुटीर उद्योग बढ़ाने होंगे, फल-सब्जी का उत्पादन और उन्हें डिब्बाबंद करके बाजार तक पहुंचाने की तकनीक का इस्तेमाल करना होगा। खदानों से बिजली और लोहा बनाने के बड़े-बड़े कारखाने अधिक आसान होते हैं, लेकिन गांव-गांव तक किसानी-उपज में वेल्यू-एडिशन करना अधिक मुश्किल होता है। इस सरकार में यह बाद वाली राह चुनी है, और मौजूदा बुरी तरह भ्रष्ट सरकारी मशीनरी के माध्यम से ही यह सफर तय करना है, इसलिए सरकार को भ्रष्टाचार की डूबत को पूरी तरह रोकना भी होगा, तभी बजट किसी काम का रहेगा। आज जिस अंदाज में किसानों को नकली और घटिया उपकरण देने का काम चल रहा है, वैसा सरकारी कामकाज बजट को दफ्तरोंं में ही लूट लेगा, खेत तक पहुंचने नहीं देगा।
-सुनील कुमार




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