विचार / लेख

राजनीति में कैसी महिला?

Posted Date : 10-Feb-2019



-दिव्या आर्य

हमारे चारों ओर हर वक्त सुंदर चेहरों की तारीफ, सुंदर ना होने की हीन भावना और सुंदरता निखारने के तरीकों की नुमाइश। मतलब कितनी भी पढ़ी-लिखी हो और अपने काम में तेज पर थोड़ा सुंदर भी हो जाती तो बेहतर होता। सुंदरता की इस श्रेष्ठता से मैं इत्तफाक नहीं रखती पर दुनिया रखती है और इसीलिए हैरान हो जाती हूं जब देखती हूं कि कैसे वही सुंदरता बोझ बन जाती है। चेहरे से सुंदर हैं तो दिमाग से बंदर जरूर होंगी। मौका भी इसीलिए दिया गया है क्योंकि सुंदर है। और काम कुछ खास नहीं कर पाएंगी क्योंकि काबिलियत के नाम पर सुदंरता ही तो है।
ये दोहरे मानदंड एक बार फिर देखने को मिले जब प्रियंका गांधी को कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। तब भारतीय जनता पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं की टिप्पणियां कुछ इस प्रकार थीं।
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस चॉकलेट जैसे चेहरे सामने ला रही है। इससे उत्तर प्रदेश में बस ये फायदा होगा कि कांग्रेस की चुनाव सभाओं में कुर्सियां खाली नहीं दिखेंगी। वोट चेहरों की सुंदरता के बल पर नहीं जीते जा सकते। पर ऐसा भी नहीं कि महिला नेता, सुंदर, की परिभाषा में फिट ना होती हों तो इज़्जत मिल जाएगी। बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) नेता मुलायम सिंह यादव ने कहा था, क्या मायावती इतनी सुंदर हैं कि कोई उनका बलात्कार करना चाहेगा?
राज्य सभा सांसद शरद यादव ने राजस्थान में कहा था कि पूर्व-मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया मोटी हो गई हैं, उन्हें आराम करने देना चाहिए।
यानी कोई फर्क नहीं पड़ता, बात बस इतनी सी है कि पार्टी कोई भी हो, ऐसे पुरुषों की कमी नहीं जो ये मानते हैं कि राजनीति में औरतें पुरुषों से कमतर हैं और उसके लिए वो कोई भी तर्क रख सकते हैं। किसी जगह आपको इतना बेइज़्जत किया जाए, आपके शरीर पर बेहिचक भद्दी बात हो और आपके काम को इसी बल पर नीचा दिखाया जाए तो आप वहां का रूख करेंगे क्या?
शायद नहीं। पर इन औरतों को देखो, ये उस राह पर चल ही नहीं रहीं, डटी हुई हैं। चमड़ी गोरी हो या सांवली, मोटी जरूर कर ली है। तादाद में अभी काफी कम हैं। पहली लोकसभा में 4 फीसदी से बढ़कर 16वीं लोकसभा में करीब 12 फीसदी महिला सासंद हैं। पड़ोस में झांकें तो नेपाल की संसद में 38 फीसदी, बांग्लादेश और पाकिस्तान में 20 फीसदी महिलाएं हैं। और इससे पहले आप कहें कि ख्वाब देखना छोड़ दो, ये बता दूं कि अफ्रीकी देश रवांडा ने मुमकिन की हद इतनी ऊंची कर दी है कि चाहत को और पंख मिल गए हैं।
2018 में पाकिस्तान में हुए आम चुनावों में नेशनल असेंबली की कुल 272 सीटों पर अलग अलग दलों ने 171 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिये, 2013 में यह संख्या 135 थी। रवांडा की संसद में 63 फीसदी महिलाएं हैं। साल 2018 में पाकिस्तान में हुए आम चुनावों में नेशनल असेंबली की कुल 272 सीटों पर अलग अलग दलों ने 171 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिए, 2013 में यह संख्या 135 थी।
भारत में औरतों को वोट डालने का अधिकार कई दशक पहले, आजादी के साथ मिल गया था। पर इसके साथ राजनीति के ताकतवर पदों में उनकी भागीदारी तय नहीं हुई। राजनीतिक पार्टियां पुरुष-बहुल रहीं और औरतों को टिकट देने में हिचकती रहीं, चाहे वो विधायक का पद हो या सासंद का।
2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 7,500 उम्मीदवार मैदान में थे, उनमें से सिर्फ आठ फीसदी यानी करीब 500 औरतें थी। शोध संस्था एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस के विश्लेषण के मुताबिक इन औरतों में से एक-तिहाई किसी पार्टी से नहीं लड़ीं, वो स्वतंत्र उम्मीदवार थीं। पार्टियों में आम आदमी पार्टी ने सबसे ज़्यादा 59, कांग्रेस ने 60 और बीजेपी ने 38 सीटों पर महिलाओं को टिकट दिया। सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का जिन्होंने एक-तिहाई सीटों पर महिलाओं को टिकट दिया। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि पार्टी किसी उम्मीदवार को टिकट देने से पहले उसकी जीतने की काबिलियत आंकती है। जानने वाली बात ये है कि आम समझ से बिल्कुल उलट, इसमें औरतें मर्दों से बेहतर है।
सरकार द्वारा जारी की गई जानकारी के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनाव में औरतों की जीतने की दर (नौ फीसदी) मर्दों (छह फीसदी) से कहीं बेहतर है। इसके बावजूद राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व होने की वजह से महिला उम्मीदवार के लिए चुनौती दोहरी है। इसीलिए बदलाव के लिए पार्टियों की नीयत बदलना बहुत जरूरी है। वो नहीं बदली तो लोक सभा और राज्यों की विधान सभाओं में औरतों के लिए सीटें आरक्षित करने वाला विधेयक कभी पारित नहीं होगा। और पारित हो जाए तो लागू नहीं होगा। सवाल ये भी है कि क्या आरक्षण ही सही रास्ता है?
महिलाओं के लिए पंचायत स्तर पर पहले एक-तिहाई और फिर 50 फीसदी आरक्षण लाया गया और इससे उनका प्रतिनिधित्व भी बढ़ा है। पर नीयत ना बदलने की वजह से अब भी ज़्यादातर महिला सरपंच नाम के लिए अपने पद पर हैं। काम उनके पति, ससुर, पिता या कोई और प्रभावशाली मर्द ही कर रहे हैं। वजह वही कि उनकी काबिलियत को कम आंका जाता है और क्षमता हो भी तो उसे निखारने का, सीखने का, आगे बढऩे का मौका नहीं दिया जाता है। पर कुछ महिलाएं हैं जो इन सब रुकावटों के लिए खेद व्यक्त करने की बजाय अपनी जगह बना रही हैं।
वो सुंदर भी हैं, सांवली भी, मोटी भी हैं। वो महिला होने के अलावा निचली समझी जाने वाली जाति से भी हैं, आदिवासी हैं, गरीब हैं या मध्यमवर्गीय परिवार से हैं। पर उन्होंने चुना है लीडर होना, निडर होना। वो ये जान गई हैं कि तंज भरे भद्दे कमेंट उनको नहीं, ऐसी बातें कहने वालों को नीचा दिखाते हैं। और वो जानती हैं कि नीयत के बदलने का इंतजार हाथ पर हाथ रखकर नहीं बल्कि अपनी आवाज को चुटकलों के शोर से बुलंद कर होगा। (बीबीसी)




Related Post

Comments