विचार / लेख

नोटबंदी के फैसले पर ये तर्क

Posted Date : 10-Feb-2019



-गिरीश मालवीय

बहुत से लोग तर्क देते हैं कि मोदीजी का नोटबंदी का निर्णय इतना ही खराब होता तो क्या 4 महीने के अंदर हुए उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा दो तिहाई बहुमत से जीतकर आती?
चलिए मान लिया,  पर अब यह तर्क पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस के साथ भी अप्लाई कर लीजिए। सारदा, रोजवैली आदि चिटफण्ड घोटालों में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े लोगों को हाथ था 2011 के विधानसभा चुनाव में 34 वर्षों तक शासन में रहने के बाद माकपा तृणमूल कांग्रेस से पराजित हुई थी इस घोटाले का घटनाक्रम भी लगभग 2009 से 2014 के बीच का ही है ममता ने घोटाले की जांच के लिए एसआईटी का गठन साल 2013 में किया, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया सीबीआई इन्वॉल्व हुई और अब बकौल सीबीआई राजीव कुमार ने एसआईटी प्रमुख रहते हुए तृणमूल के नेताओं से जुड़े सारे सुबूत अपने कब्जे में लिए ओर नष्ट कर दिए।
मान लेते हैं यह सब ममता बनर्जी के इशारे पर किया गया तो उन्होंने अपने वोटरों को ऐसी कौन सी घुट्टी पिलाई जो 2016 में पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विस में ममता बनर्जी की पार्टी को 211 सीटों पर जीत हासिल हो गई? और अब बात चुनाव की निकल ही आई है तो जरा 2016 में पश्चिम बंगाल में जीती गई बीजेपी की सीटों की संख्या पर भी नजर डाल लीजिए।
 कुल 294 सीटों में बीजेपी सिर्फ 3 सीटों पर ही जीत पाई वो भी 2016 में जब मोदीजी को प्रधानमंत्री बने 2 साल पूरे हो गए थे 2014 में जब मोदी लहर अपने टॉप पर थी तब पश्चिम बंगाल की लोकसभा की 42 सीटों में भाजपा को मात्र 2 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। उसे 2009 की तुलना में सिर्फ 1 सीट का ही फायदा मिला एक ओर दिलचस्प आंकड़ा भी समझिए कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के 17 फीसदी वोट हासिल हुए थे लेकिन 2016 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा गिरकर 10 फीसदी तक पहुंच गया। 
अब आते हैं 2019 पर माया अखिलेश के गठबंधन ओर नीतीश की राज्य में बिगड़ती छवि के कारण मोदी समझ चुके हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार में जितनी सीटे उन्होंने 2014 में जीती थी उसकी आधी भी वह जीतने की पोजिशन में नहीं है अब इन सीटों की भरपाई कहा से होगी?
उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद पश्चिम बंगाल सबसे अधिक सांसद चुनकर लोकसभा में भेजता है 42 सीटों पर अमित शाह पूरा जोर लगा रहे हैं अमित शाह ने प्रदेश नेताओं को लोकसभा की 42 में से कम से कम 22 सीटें जीतने का लक्ष्य दिया है। वैसे प्रदेश भाजपा ने जो चुनावी ब्लूप्रिंट तैयार किया है उसमें कहा गया है कि पार्टी राज्य में कम से कम 26 सीटें जीत सकती है। 2014 में बीजेपी मात्र आठ सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी आंकड़ों के हिसाब से यह नामुमकिन लक्ष्य लग रहा है।
बंगाल में मजबूत सांगठनिक आधार का न होना बीजेपी के लिए सबसे बड़ी बाधा है इसलिए सारा जोर टीएमसी के नेताओं में फूट डालकर उन्हें बीजेपी में शामिल किए जाने में है मुकुल रॉय इस सिलसिले की पहली कड़ी है। 
आप ध्यान दीजिएगा फिलहाल में जो कमिश्नर वर्सेज सीबीआई का विवाद सामने आया उसमे बीजेपी के नेताओं का सारा जोर इस बात रहा कि ममता टीएमसी नेताओं के इस केस में फंसने पर कुछ नहीं बोली लेकिन कमिश्नर को बचाने आगे आई निर्मला सीतारमण का तो बयान था कि अब टीएमसी नेताओं को सोचना चाहिए कि उन्हें क्या करना है, क्या आपने कभी ध्यान दिया कि सारा मीडिया इस विवाद पर लगातार तीन दिन रिपोर्ट दिखाता रहा, जबकि इस बीच आई सारी महत्वपूर्ण खबरों को वह नजरअंदाज करता रहा वाम की महारैली भी कही गायब हो गई, गोदी मीडिया की इस मैराथन रिपोर्टिंग से पूरे देश मे यह संदेश गया कि तृणमूल के सामने बीजेपी ही असली विकल्प है वाम ओर कांग्रेस कहीं गिनती में नहीं है जिस पर सिर्फ हंसा जा सकता है। बंगाल के राजनीतिक हलकों इस तथ्य को स्टेबलिश करने की कोशिश की गई कि बीजेपी के साथ आने पर ही भ्रष्टाचार की जांच से बचा जा सकता है। इसी नैरेटिव को हालिया विवाद में स्टेबलिश करने की कोशिश की गई है यही असली खेल है।




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