संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 अप्रैल : लाशों और धमाकों के बीच बस्तर एक मिसाल

Posted Date : 12-Apr-2019



छत्तीसगढ़ के बस्तर में मतदान के लिए सुबह से लगी बड़ी लंबी-लंबी कतारों की तस्वीरें रोंगटे खड़े कर देती हैं, अगर बस्तर के हालात को याद रखें। जहां एक बड़े इलाके में नक्सलियों ने विस्फोटक बिछा रखे हैं। जहां अभी तीन दिन पहले ही ऐसे ही एक धमाके में भाजपा के एक विधायक की चुनाव प्रचार करते मौत हुई, कई सुरक्षा कर्मचारी भी मारे गए, वहां पर वोट डालने गांव के गांव उमड़ पड़े और मृत विधायक के बूढ़े मां-बाप ने भी वोट डाला। ऐसे हालात में 57 फीसदी वोट सुरक्षित शहरों के 97 फीसदी वोटों के बराबर माने जाने चाहिए। इन्हीं बस्तर में नक्सली जगह-जगह मतदान के बहिष्कार करके पर्चे भी फेंकते आए हैं और कुछ इलाकों में उनका राज पुलिस से अधिक है। कई दिनों से वे जिन इलाकों में दीवारों पर बहिष्कार के नारे लिख रहे थे, वहां भी खूब वोट पड़े। 

सुरक्षित शहरों में वोटरों को अगर क्रिकेट मैच देखने मिल जाए तो बहुत से वोटर वोट डालने न जाएं। बहुत से वोटर ऑटोरिक्शा मुफ्त मिलने पर ही वोट डालने जाते हैं। ऐसे में जिंदगी जोखिम में डालकर नक्सली-जंगलों के जो लोग दूर-दूर तक जाकर वोट डालते हैं वे ही लोकतंत्र को जिंदा रखने की मिसाल बनते हैं। लंबे वक्त पहले, इमरजेंसी के दौर में बस्तर जैसे आदिवासी इलाकों में कोई टीवी नहीं था, वोटर-पीढ़ी की पढ़ाई नहीं के बराबर थी, अखबारों की पहुंच भी बड़ी सीमित थी और वे भी इंदिरा-संजय के अनुशासन पर्व के गीत गा रहे थे। लेकिन उस दौर में भी समूचे बस्तर ने एकमुश्त होकर नेहरू की बेटी को खारिज कर दिया था। शहरी लोकतंत्र के पैमानों पर इन आदिवासियों के पास न गोली है, न बोली है, लेकिन इनका फैसला हौसले के साथ सामने आता है। 

यह बात कुछ अजीब सी भी लगती है कि कांग्रेस और भाजपा, इन्हीं दो पार्टियों की सरकारों ने कम या अधिक समय तक बस्तर पर राज किया है। इन्हीं के अफसरों, कर्मचारियों और नेताओं ने आदिवासियों को लूटा है, बेदखल किया है। लेकिन इन्हीं दो के बीच जब चुनने की बात आती है, तो भी बस्तर के आदिवासी हौसले और उत्साह से वोट देते हैं। जिनसे पिछली आधी से अधिक सदी से महज छीना ही गया है, जिन्हें खदेड़ कर राज्य के बाहर कर दिया गया, जिनके गांव पुलिस ने जला दिए, जिनके बेकसूर लोगों को नक्सली कहकर मारा, जिनकी महिलाओं से नियमित रूप से बलात्कार किया गया, वे भी आखिर क्या पन्ने के लिए हर चुनाव में वोट देते हैं? कम बुरे को चुनने के लिए? 

बस्तर के एक हिस्से का नाम अबूझमाड़ है। अबूझ इलाका, लेकिन वोट डालने में बस्तर की दिलचस्पी को देखें तो समूचा बस्तर अबूझ लगता है। यहां इतने वोट पडऩे को कुछ बाहरी आंखों से देखने की जरूरत है। इस देश-प्रदेश के लोग तो मानो खतरों और लाशों के बीच वोट डालना इनकी जिम्मेदारी मान चुके हैं, बाहर के कोई समाजशास्त्री शायद इसे बेहतर समझ सकें।  
-सुनील कुमार




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