संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 14 अप्रैल : नेताओं को काटजू की एक बात पर सौ फीसदी भरोसा

Posted Date : 14-Apr-2019



हिन्दुस्तान के आम चुनाव के भाषणों को देखें तो लगता है कि नेताओं और पार्टियों में जो लोग जस्टिस मार्क न्डेय काटजू की बातों को सही नहीं मानते, और अक्सर उनकी आलोचना करते हैं, वे भी कम से कम उनकी एक बात पर गंभीरता से भरोसा करते हैं, और अपना सारा चुनाव अभियान, बयान और भाषण, उसी मुताबिक तय करते हैं। जस्टिस काटजू ने कुछ अरसा पहले लिखा था कि 90 फीसदी हिन्दुस्तानी बेवकूफ हैं। आज नेताओं के चुनावी बयान और भाषण देखें तो लगता है कि वे तमाम लोग काटजू की बात पर पूरा भरोसा करते हैं। भला तकरीबन पूरी जनता को पूरी तरह बेवकूफ न समझते होते तो बड़े-बड़े नेता वीडियो कैमरों के सामने रिकॉर्ड होते हुए इतनी फर्जी और इतनी फरेबी बातों को इतने-इतने जोर से, इतनी-इतनी बार कैसे बोलते होते? इसलिए जस्टिस काटजू का गणित नेताओं के बीच खासा लुभावना और लोकप्रिय दिखता है, और हिन्दुस्तानी चुनाव में नेता बाकी 10 फीसदी लोगों की परवाह नहीं करते कि वे ऐसी फरेबी बातों के लिए क्या सोचेंगे? इसलिए कि बचे 90 फीसदी लोगों में से हर किसी को वोट का उतना ही हक है जितना कि इन 10 फीसदी लोगों में से हर किसी को है। 

आज इस देश के मीडिया में एक छोटा तबका लगातार इस फरेब का पर्दाफाश करने में लगा रहता है, लेकिन यह तबका कुछ अधिक ही छोटा है। दूसरी तरफ मीडिया का एक बड़ा तबका लगातार इस फरेब को एक सच साबित करने में लगे रहता है, और इस मिलेजुले फरेब को आगे बढ़ाने के लिए मुफ्त या भुगतानप्राप्त लोगों की इतनी बड़ी फौज हासिल है कि वे बात की बात में फरेब से सार्वजनिक जीवन को, लोगों के फोन को, सोशल मीडिया को पाटकर रख देते हैं। नतीजा यह होता है कि जब चारों तरफ एक ही फरेब दिखता है, तो जाहिर है कि काटजू के पैमाने के 90 फीसदी लोग उस पर भरोसा भी कर बैठते हैं। अभी दो दिन पहले ही किसी का लिखा हुआ पढऩे में आया है कि आज का सोशल मीडिया अगर हिटलर के वक्त में होता, तो वह इस पर फिदा हो चुका होता। आज के सोशल मीडिया में लोगों के दिमाग को चारों तरफ से बंद कर देने की ऐसी ताकत विकसित कर ली है कि उसके मुकाबले लोकतंत्र एक बहुत ही कमजोर औजार बनकर रह गया है। 

भारतीय लोकतंत्र में धर्म के आधार पर, जाति के आधार पर, नोटों के आधार पर, झांसों के आधार पर, उकसावों के आधार पर, नफरत के आधार पर वोट इस कदर प्रभावित होते हैं कि यह अंदाज लगाना नामुमकिन है कि हिन्दुस्तानी वोटर किस आधार पर देश की सरकार तय करते हैं। इतने किस्म की लहरें बताई जाती हैं, इतने किस्म का रूझान गिनाया जाता है, कुछ नेताओं के इतने करिश्मे चर्चा और खबरों में रहते हैं कि वोट किस असर में पड़ा, इसे दुनिया से परे की कोई अनोखी ताकत ही सुलझा सकती है। फिलहाल इस देश के वोटरों को नेता काटजू के चश्मे से देखते हैं, और उसी मुताबिक हर दिन झूठ और फरेब का सैलाब तय करते हैं। लोग इन झूठों को ठीक उसी तरह सच मानने पर आमादा रहते हैं जिस तरह समझदार हो चुके बच्चे भी क्रिसमस पर सांताक्लॉज के आने और तोहफे लाने की बात पर भरोसा करने पर आमादा रहते हैं। 
-सुनील कुमार




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