संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 23 अप्रैल : सुप्रीम कोर्ट में नाटकीय और सनसनीखेज आरोपों का दौर

Posted Date : 23-Apr-2019



सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ उनकी एक भूतपूर्व अस्थाई कर्मचारी द्वारा लगाए गए सेक्स-शोषण के आरोप की बात आगे बढ़ती चली जा रही है। इस पर हमने दो दिन पहले  विरोध किया था कि मुख्य न्यायाधीश को कोई हक नहीं था कि वे अपने पर लगे ऐसे आरोप के खिलाफ खुद अपनी अदालत में सुनवाई करें, और सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार से अपनी बेकसूरी का बयान जारी करवाएं, और शिकायतकर्ता महिला के खिलाफ जवाबी आरोप लगाएं। खैर, इस बारे में हम काफी खुलासे से लिख चुके हैं, और आज चूंकि कुछ नए मुद्दे हैं, इसलिए दो दिन पहले की बातों को यहां दुहराना मुमकिन नहीं है। इस आरोप के बाद सुप्रीम कोर्ट बार ऐसोसिएशन ने मुख्य न्यायाधीश का साथ देते हुए उन्हीं की जुबान में इसे एक साजिश करार दिया था। मुख्य न्यायाधीश का मानना है कि यह न्यायपालिका को अस्थिर करने की एक साजिश है। फिर अचानक एक ऐसे वकील का हलफनामा आता है जो कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ऐसी एक साजिश को बयां करते हुए बताता है कि दाऊद इब्राहीम से लेकर हिंदुस्तान के एक बहुत बड़े कारोबारी तक ऐसी साजिश में शामिल हैं, और यह बात उसे एक ऐसे आदमी ने बताई है जो कि मुख्य न्यायाधीश को इस्तीफे के लिए मजबूर करने के एवज में डेढ़ करोड़ रुपये का प्रस्ताव लेकर आया था।

यह पूरा सिलसिला बहुत भयानक रूप से नाटकीय हो चला है। मुख्य न्यायाधीश और उनकी बेंच में बैठे दो दूसरे जजों ने अब तक महिला की सेक्स-शोषण की शिकायत को किसी जांच कमेटी को नहीं भेजा है जो कि एक अनिवार्य जरूरत है। कानून के इस प्रावधान को किनारे रखकर सुप्रीम कोर्ट की यह बेंच मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में उस वकील से पूछताछ कर रही है जिसने यह सनसनीखेज आरोप लगाया है। ऐसे आरोप के सच्चे या झूठे होने के बारे में हम कोई अटकल लगाना नहीं चाहते क्योंकि दुनिया का कारोबार ऐसी कई साजिशों से भरा रहता है। दुनिया में मर्जी के फैसलों के लिए जजों को खरीदा भी जाता है, और उन्हें धमकाया भी जाता है। उन्हें ब्लैकमेल भी किया जाता है, और उन्हें लालच देकर मर्जी के फैसले लिए भी जाते हैं। इसलिए किसी भी किस्म के आरोप पर हम अपना दिमाग तय करना नहीं चाहते हैं, सिवाय इसके कि जब एक महिला ने ऐसा हलफनामा दिया है, तो उसकी शिकायत पर कानून के मुताबिक तुरंत जांच होनी चाहिए, और इस काम में इसलिए देर करना नाजायज होगा कि शिकायत सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ है, जिनके खाते में महज सात लाख रुपये से कम हैं, जिनके साथ उस महिला ने बहुत कम काम किया था, या जिसके परिवार के ऊपर कई तरह के आरोप लगे हुए हैं, या कि मामले दर्ज हैं। हमारे हिसाब से मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले में न सिर्फ अनैतिक और कानून के खिलाफ शुरूआत की है, बल्कि उन्होंने अदालत और जजों से पारदर्शिता की जो उम्मीद की जाती है, उसे भी कुचलकर रख दिया है। हो सकता है कि वे किसी साजिश के शिकार हों, लेकिन ऐसी आशंका उनको सेक्स-शोषण के बुनियादी आरोप से कोई बचाव नहीं देती है।
-सुनील कुमार




Related Post

Comments