संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 27 अप्रैल : कन्हैया कुमार की शक्ल में, भारतीय लोकतंत्र देख रहा है सब कुछ अभूतपूर्व, अनोखा
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 27 अप्रैल : कन्हैया कुमार की शक्ल में, भारतीय लोकतंत्र देख रहा है सब कुछ अभूतपूर्व, अनोखा
Date : 27-Apr-2019

बिहार के बेगूसराय से सीपीआई उम्मीदवार कन्हैया कुमार को देश भर की खबरों में जितनी जगह मिल रही है, उसे देखकर देश के बड़े से बड़े नेता को रश्क ही हो सकता है। एक उम्मीदवार के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी खबरों में उतनी जगह नहीं मिली, और न ही राहुल गांधी को। एक बिल्कुल ही नौजवान, फक्कड़, सड़कछाप, और नफरतजीवियों द्वारा टुकड़े-टुकड़े गैंग के सरदार की तरह बदनाम किया गया कन्हैया कुमार कई मायनों में एक बिल्कुल ही अलग किस्म की मिसाल है। वह अपनी खुद की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर भी एक अनोखा चेहरा और किरदार है क्योंकि किसी ने ऐसा कोई कम्युनिस्ट उम्मीदवार देखा नहीं था जिसके लिए इंटरनेट पर चंदा इक_ा हो, और जो चुनाव आयोग की सीमा के भीतर ही खर्च करे, और उतना पैसा जुट भी जाए।

देश के सबसे विख्यात वामपंथी तेवरों वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार को कुछ बरस पहले देश ने तब जाना जब कन्हैया पर तोहमत लगी कि वे जेएनयू में देश के खिलाफ लगने वाले नारों की भीड़ में मौजूद थे। इस बात को लेकर कन्हैया और उनके साथियों पर देश के साथ गद्दारी की रिपोर्ट लिखाई गई, उन्हें गिरफ्तार किया गया, और बाद में अदालत के सामने यह साबित हुआ कि वैसे नारों वाले वीडियो गढ़े गए थे, और हकीकत में वैसे कोई नारे लगे नहीं थे। लेकिन जिनका कारोबार नफरत की बुनियाद पर ही खड़ा है, वे आज भी अपने भाषणों में, पे्रस कांफे्रंस में, और टीवी डिबेट में कन्हैया को टुकड़े-टुकड़े गैंग ही करार देते हैं। और फिर अब तो बेगूसराय से कन्हैया के सामने भाजपा के एक ऐसे हमलावर तेवरों वाले, साम्प्रदायिकता को फैलाने वाले गिरिराज सिंह उम्मीदवार हैं जिनकी अकेली खूबी नफरत खिला-खिलाकर दानवाकार बनाए गए हिंसक-हिंदुत्व की है। ऐसे गिरिराज सिंह के सामने कल का छोकरा वामपंथी धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक तो है ही, लेकिन कन्हैया कुमार की बातें वामपंथ की परंपरागत प्राचीन डिक्शनरी से बाहर की हैं, उनकी पूरी जुबान सड़क के आम इंसानों की है, उन्हीं की जुबान में। उनके इस अंदाज से बुजुर्ग वामपंथियों का एक बड़ा तबका बेचैन हो सकता है क्योंकि बिहार के लेनिनग्राद कहा जाने वाला बेगूसराय कन्हैया के भाषणों में न माक्र्स को पाता, न लेनिन को, और न ही वे वामपंथ शब्द का इस्तेमाल करते। ऐसे में कल कन्हैया कुमार से एक सवाल यह भी किया गया कि उनके प्रचार में वामपंथ कहीं भी नहीं दिख रहा है!

दरअसल किसी सोच को सामने रखने के लिए उसकी परंपरागत और एक्सपायर हो चुकी शब्दावली का इस्तेमाल कहीं जरूरी नहीं है। भारतीय राजनीति, लोकतंत्र, और चुनाव में कन्हैया कुमार ने जनता के मुद्दों को जनता की जुबान में इतने सरल तरीके से सामने रखा है कि वह किसी और वामपंथी नेता के लिए मुमकिन नहीं लगता है। उनकी जीत-हार एक त्रिकोणीय संघर्ष का नतीजा रहेगी क्योंकि देश की नौजवान पीढ़ी के प्रतीक बनकर उभरे, भाजपा के घोर विरोधी, और धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय की वकालत कर रहे कन्हैया कुमार के लिए भी कांगे्रस-लालू ने यह एक सीट छोडऩा भी ठीक नहीं समझा। यह लालू की पार्टी और कांगे्रस, इन दोनों की एक परले दर्जे की तंगदिली भी है, और तंगनजरिए का सुबूत भी है। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी भाजपा के खिलाफ देश भर में सबसे सरल जुबान में सबसे आक्रामक बातें बोलने वाले कन्हैया कुमार के महत्व को इन दोनों पार्टियों ने जिस तरह नकारा है, वह देश के बहुत से बुनियादी मूल्यों को नकार देना है। एक सीट का मोह इन दोनों पार्टियों की बुनियादी समझ को भी उजागर करता है। आज देश भर से बिना दलीय-प्रतिबद्धता के भी जितने लोग कन्हैया कुमार के प्रचार के लिए बेगूसराय पहुंच रहे हैं, वैसा हाल के चुनावों में किसी और उम्मीदवार के लिए याद नहीं पड़ता। उत्तर भारत में चुनावी रिपोर्टिंग के लिए पहुंचे किसी भी रिपोर्टर का पेट तब तक नहीं भर सकता जब तक वे इस चुनाव में कन्हैया से बातचीत दर्ज न कर लें। वामपंथी पार्टियां देश में अपनी बुनियाद काफी कुछ खो चुकी हैं, लेकिन कन्हैया कुमार एक ऐसा प्रतीक बनकर उभर रहा है जो कि अपनी पार्टी और उसकी सोच, उसके सिद्धांतों, इन सबको एक नई ऊर्जा दे सकता है, एक नया तौर-तरीका दे सकता है। एक कम्युनिस्ट उम्मीदवार बिना इश्तहारों के, मीडिया को रिश्वत दिए बिना, महंगे चुनाव प्रचार के बिना किस तरह मुफ्त खबरों में आ सकता है, और नौजवान पीढ़ी की उम्मीद जगा सकता है, यह देखने लायक है। इस देश की संसद में अगर किसी एक आवाज की सबसे अधिक जरूरत है, तो वह कन्हैया कुमार की है क्योंकि वह न सिर्फ भारतीय लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों की वकालत कर रहा है, बल्कि वह देश के आर्थिक और सामाजिक मोर्चों पर भी इंसाफ की बात कर रहा है, एक अभूतपूर्व जुबान में, एक अभूतपूर्व तेवर के साथ, और एक अभूतपूर्व संभावना के साथ भी।
-सुनील कुमार

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